वाराणसी के रथयात्रा स्थित थिओसोफिकल सोसाइटी परिसर में दयाल ग्रुप के होटल निर्माण को लेकर विवाद गहरा गया है। होटल का नक्शा निरस्त किए जाने के बाद शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026 को वाराणसी विकास प्राधिकरण (वीडीए) की टीम ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करने पहुंची। हालांकि, निर्माण पक्ष ने मौके पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का स्थगन आदेश दिखा दिया, जिसके बाद टीम को कार्रवाई रोककर वापस लौटना पड़ा। जमीन के स्वामित्व, लीज और निर्माण की वैधता से जुड़े सवालों के कारण यह मामला चर्चा में है
थिओसोफिकल सोसाइटी परिसर में होटल निर्माण को लेकर विवाद केवल नक्शे की स्वीकृति तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीन के स्वामित्व और उसे लीज पर देने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। संबंधित परिसर की जमीन दयाल ग्रुप को 30 साल की लीज पर दिए जाने की बात सामने आई है। इस मामले में जमीन के अभिलेखों और सोसाइटी की ओर से किए गए समझौते को लेकर आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं। इसी वजह से होटल निर्माण की वैधता और भूमि हस्तांतरण से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जांच का मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो गया है।
शुक्रवार को वीडीए की टीम जब होटल को गिराने के लिए परिसर में पहुंची, तो वहां कार्रवाई को लेकर स्थिति तनावपूर्ण हो गई। प्राधिकरण की ओर से नक्शा निरस्त किए जाने के बाद निर्माण के खिलाफ कदम उठाने की तैयारी की गई थी। टीम मौके पर पहुंचकर आगे की प्रक्रिया पूरी करना चाहती थी, लेकिन निर्माण पक्ष ने अदालत के आदेश का हवाला देते हुए ध्वस्तीकरण रोकने की मांग की। इसके बाद हाईकोर्ट का स्थगन आदेश अधिकारियों के सामने प्रस्तुत किया गया। न्यायालय के आदेश को देखते हुए तत्काल कार्रवाई आगे नहीं बढ़ाई गई और टीम को वापस लौटना पड़ा।
इस मामले में वाराणसी विकास प्राधिकरण की ओर से होटल के नक्शे को निरस्त करने की कार्रवाई की गई है। प्राधिकरण को निर्माण से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों और स्वीकृति प्रक्रिया को लेकर आपत्तियां मिली थीं। अधिकारियों के अनुसार, निर्माण की वैधता से जुड़े पहलुओं की जांच के बाद विभागीय स्तर पर कार्रवाई का निर्णय लिया गया। हालांकि, अब ध्वस्तीकरण की आगे की प्रक्रिया अदालत के आदेश और संबंधित दस्तावेजों के परीक्षण के आधार पर तय होगी।
जमीन की लीज को लेकर भी पहले से विवाद चल रहा है। अप्रैल 2026 में इस प्रकरण में थिओसोफिकल सोसाइटी के प्रबंधन को नोटिस भेजकर स्पष्टीकरण मांगे जाने की खबर सामने आई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि होटल निर्माण के लिए जमीन 30 साल की अवधि पर लीज पर देने से पहले आवश्यक न्यायालयीन अनुमति नहीं ली गई। जमीन के राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज किए जाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए थे। ये आरोप और आपत्तियां जांच का विषय हैं; इनका अंतिम निपटारा संबंधित अधिकारियों और न्यायालय की प्रक्रिया के अनुसार होगा।
इस प्रकरण में जमीन के स्वामित्व से जुड़े राजस्व अभिलेख भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। मई 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में थिओसोफिकल सोसाइटी और भूमि अभिलेखों से जुड़े विवाद पर सुनवाई हुई थी। न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत विवरण के मुताबिक, जमीन के राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज किए जाने के आदेशों को चुनौती दी गई थी और संबंधित पक्षों के बीच विवाद जारी था। इससे स्पष्ट है कि होटल निर्माण का मामला कई कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं से जुड़ा हुआ है। हालांकि, इस पुराने राजस्व विवाद और शुक्रवार को होटल ध्वस्तीकरण पर रोक लगाने वाले स्थगन आदेश के दायरे को एक जैसा नहीं माना जाना चाहिए।
वीडीए के सामने अब यह चुनौती है कि वह अदालत के आदेश का पालन करते हुए निर्माण से संबंधित अभिलेखों की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया पूरी करे। दूसरी ओर, निर्माण पक्ष को भी होटल से संबंधित स्वीकृतियों, जमीन की लीज और न्यायालय के आदेश से जुड़े दस्तावेजों के आधार पर अपना पक्ष रखना होगा। स्थगन आदेश के चलते तत्काल ध्वस्तीकरण की कार्रवाई रुक गई है, लेकिन इससे जमीन के स्वामित्व या निर्माण की वैधता से जुड़े सभी विवादों का अंतिम समाधान हो गया है, ऐसा नहीं कहा जा सकता।
वाराणसी में होटल निर्माण और भूमि उपयोग से जुड़े मामलों पर विकास प्राधिकरण की कार्रवाई पहले भी चर्चा में रही है। शहर में होटल, गेस्ट हाउस और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के मानचित्र, भूमि उपयोग और सुरक्षा मानकों की जांच की जाती रही है। ऐसे मामलों में यह देखना जरूरी होता है कि भवन का निर्माण स्वीकृत मानचित्र के अनुसार हुआ है या नहीं और संबंधित भूमि पर प्रस्तावित गतिविधि की अनुमति है या नहीं। थिओसोफिकल सोसाइटी परिसर का मामला भी इन्हीं प्रशासनिक और कानूनी सवालों के कारण महत्वपूर्ण बन गया है।
फिलहाल होटल को गिराने पहुंची वीडीए की टीम को हाईकोर्ट के स्थगन आदेश के कारण वापस लौटना पड़ा है। आगे की कार्रवाई न्यायालय के आदेश की शर्तों, जमीन से जुड़े दस्तावेजों और प्राधिकरण की विभागीय प्रक्रिया के आधार पर तय होगी। इस मामले में अगला महत्वपूर्ण कदम यह होगा कि संबंधित पक्षों के दावों और दस्तावेजों की जांच के बाद कानूनी स्थिति स्पष्ट हो। तब तक होटल के ध्वस्तीकरण को लेकर किसी अंतिम निर्णय पर पहुंचना उचित नहीं होगा।









