राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने विजयादशमी के अवसर पर नागपुर में शस्त्र पूजन किया। इस दौरान उन्होंने संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
Mohan Bhagwat Speech 2026: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने विजयादशमी के अवसर पर नागपुर में आयोजित कार्यक्रम में सामाजिक एकता, राष्ट्रीय पहचान और लोकतांत्रिक आंदोलनों को लेकर अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि आपसी विभाजन ने भारत को कमजोर किया और देश की मजबूती के लिए भावनात्मक एकता तथा सामाजिक समरसता जरूरी है।
फ्रांस और अल्बानिया में हो रही घटनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में भी ऐसे प्रयासों पर ध्यान देने की जरूरत है। भागवत ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में आंदोलन करना स्वाभाविक है, लेकिन उनका मकसद समाधान निकालना होना चाहिए, न कि राजनीतिक लाभ के लिए लोगों को उकसाना।
विजयादशमी पर मोहन भागवत ने किया शस्त्र पूजन
विजयादशमी के मौके पर मोहन भागवत ने नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पारंपरिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया और शस्त्र पूजन किया। उन्होंने संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की समाधि पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि भी दी। अपने संबोधन में भागवत ने पिछले एक वर्ष के दौरान संघ की शताब्दी से जुड़े कार्यक्रमों का जिक्र किया।
उन्होंने संत रविदास की 650वीं जयंती का उल्लेख करते हुए उनके सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश को याद किया। भागवत के अनुसार, संत रविदास ने कठिन ऐतिहासिक परिस्थितियों में स्वधर्म के प्रति निष्ठा, भक्ति और सामाजिक समरसता का संदेश दिया। उनके विचारों ने समाज का मनोबल बढ़ाने और लोगों को अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़े रहने की प्रेरणा दी।
'आपसी विभाजन ने भारत को कमजोर किया'
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मोहन भागवत ने अपने भाषण में कहा कि भारत की विविधता के बावजूद लोगों के बीच भावनात्मक जुड़ाव देश की एक बड़ी ताकत रहा है। उनके अनुसार, जब समाज में भाषा, जाति, संप्रदाय और समुदाय से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता दी गई, तब भारत ने अपनी विशिष्ट पहचान कायम रखी।उन्होंने कहा कि जब लोगों के बीच आपसी जुड़ाव और अपनत्व की भावना कमजोर हुई, तो समाज में विभाजन बढ़ा। भागवत के मुताबिक, इस विभाजन ने देश की सामूहिक शक्ति को प्रभावित किया और लोगों के भीतर असुरक्षा की भावना पैदा की।
उन्होंने सामाजिक एकता को मजबूत करने और भारतीय पहचान के व्यापक स्वरूप को समझने पर जोर दिया। उनके संदेश का मुख्य बिंदु यह था कि देश की मजबूती केवल आर्थिक या भौतिक प्रगति से नहीं, बल्कि नागरिकों के बीच विश्वास, सहयोग और एकजुटता से भी तय होती है।
भारत की ओर क्यों बढ़ रहा है दुनिया का ध्यान?
RSS प्रमुख ने कहा कि भारत की बढ़ती प्रगति और वैश्विक स्तर पर उसकी मजबूत होती स्थिति के कारण दुनिया की दिलचस्पी देश की ओर बढ़ी है। उन्होंने तर्क दिया कि आधुनिक जीवनशैली में भौतिकवाद, व्यक्तिवाद और अत्यधिक उपभोग को प्राथमिकता देने से कई सामाजिक चुनौतियां पैदा हुई हैं। भागवत ने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन, विविध समुदायों के साथ सामंजस्य, पारिवारिक संबंधों में बदलाव और नई पीढ़ी में मूल्यों के संरक्षण जैसे विषयों का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों का समाधान खोजने के लिए भारतीय जीवन-दृष्टि और सामाजिक अनुभवों पर भी विचार किया जा सकता है। उनके अनुसार, विविधता को स्वीकार करते हुए लोगों के बीच अपनत्व विकसित करना किसी भी समाज के लिए महत्वपूर्ण है।
फ्रांस और अल्बानिया का जिक्र कर आंदोलनों पर कही बात
अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने फ्रांस और अल्बानिया में हो रही घटनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत में भी इस तरह के प्रयास देखने को मिल रहे हैं और ऐसे मामलों में सतर्क रहने की आवश्यकता है। उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंदोलनों को स्वाभाविक बताते हुए कहा कि विरोध का उद्देश्य समस्याओं का समाधान तलाशना होना चाहिए। उनके अनुसार, यदि आंदोलन केवल राजनीतिक लाभ, सस्ती लोकप्रियता या लोगों को भड़काने के लिए किए जाते हैं, तो इससे समाज में तनाव बढ़ सकता है।
भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि लोकतंत्र में असहमति और विरोध के लिए जगह होनी चाहिए, लेकिन किसी भी आंदोलन को समाधान की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। हालांकि, उन्होंने अपने संबोधन में फ्रांस और अल्बानिया के संदर्भ में जिन घटनाओं का उल्लेख किया, उनका विस्तृत विवरण नहीं दिया।









