आजादी की लड़ाई सिर्फ मैदान में नहीं लड़ी गई थी। कुछ उद्योगपतियों और व्यापारियों ने अपनी संपत्ति, कारोबार और संसाधन देश के नाम कर दिए।
सर दोराबजी टाटा ने राष्ट्रवादी आंदोलनों और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को आर्थिक सहयोग दिया। विदेश में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों के लिए स्कॉलरशिप में भी उनका अहम योगदान रहा।
गांधीवादी जमनालाल बजाज ने आजादी की लड़ाई में अपनी संपत्ति तक लगा दी। दांडी मार्च और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई।
हाजी उस्मान सईत कांग्रेस को लगातार आर्थिक मदद देने के लिए मशहूर थे। उनकी उदार वित्तीय सहायता ने स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई।
घनश्याम दास बिड़ला ने गांधीजी और उनके आंदोलनों को खुलकर आर्थिक समर्थन दिया। असहयोग आंदोलन से लेकर सविनय अवज्ञा तक, उन्होंने हर संभव मदद पहुंचाई।
प्रमुख उद्योगपति और फाइनेंसर सेठ हुकुमचंद गांधीजी की विचारधारा से प्रभावित थे। आजादी के लक्ष्य वाले आंदोलनों को उनके आर्थिक सहयोग से भी मजबूती मिली।