Punjab and Haryana High Court ने 24 साल पुराने Ram Chander Chhatrapati हत्याकांड में Gurmeet Ram Rahim Singh को बरी कर दिया। अदालत ने साक्ष्यों को पर्याप्त नहीं माना, जबकि तीन अन्य दोषियों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी।
Haryana: बहुचर्चित पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को बड़ी राहत मिली है। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने इस मामले में अहम फैसला सुनाते हुए राम रहीम को बरी कर दिया है। अदालत ने सीबीआई की विशेष अदालत के पहले दिए गए फैसले को आंशिक रूप से संशोधित किया और कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर राम रहीम के खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित नहीं होते।
हालांकि अदालत ने इस मामले में दोषी ठहराए गए अन्य तीन आरोपियों कुलदीप, निर्मल और किशन लाल की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। हाई कोर्ट का यह फैसला आरोपियों द्वारा सीबीआई की विशेष अदालत के निर्णय के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनवाई के बाद सामने आया है। इस फैसले के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है।
हाई कोर्ट ने क्या कहा
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य इतने मजबूत नहीं हैं कि उनके आधार पर गुरमीत राम रहीम की भूमिका को आपराधिक साजिश में स्पष्ट रूप से साबित किया जा सके। अदालत ने कहा कि आपराधिक मामलों में आरोप सिद्ध करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य होना जरूरी होता है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने रिकॉर्ड में मौजूद सभी दस्तावेजों, गवाहों के बयान और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का विस्तार से अध्ययन किया। इसके बाद अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि राम रहीम के खिलाफ पेश किए गए साक्ष्य पर्याप्त नहीं हैं। इसी आधार पर उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले के अन्य आरोपियों के खिलाफ मौजूद साक्ष्य मजबूत हैं और उनकी भूमिका स्पष्ट रूप से स्थापित होती है। इसलिए उनकी सजा को बरकरार रखा गया है।
अन्य तीन दोषियों की सजा बरकरार
हाई कोर्ट ने कुलदीप, निर्मल और किशन लाल के खिलाफ दिए गए सीबीआई अदालत के फैसले को सही माना। अदालत ने कहा कि इन तीनों आरोपियों के खिलाफ जो साक्ष्य और गवाहियां पेश की गई हैं, उनसे उनकी संलिप्तता स्पष्ट रूप से साबित होती है।

इसी आधार पर अदालत ने इन तीनों की दोषसिद्धि को कायम रखते हुए उम्रकैद की सजा को बरकरार रखने का आदेश दिया। इसका मतलब यह है कि इन तीनों आरोपियों को पहले की तरह ही सजा भुगतनी होगी।
पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड
यह मामला वर्ष 2002 में हुई पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या से जुड़ा है। रामचंद्र छत्रपति एक स्थानीय अखबार के संपादक थे और उन्होंने अपने अखबार में डेरा सच्चा सौदा से जुड़े कुछ गंभीर आरोपों को प्रकाशित किया था।
इन खबरों के प्रकाशित होने के कुछ समय बाद ही उन पर गोली से हमला किया गया था। गंभीर रूप से घायल होने के बाद उनकी मौत हो गई थी। इस घटना ने पूरे क्षेत्र में काफी सनसनी फैला दी थी और मामले को लेकर व्यापक विरोध और चर्चा हुई थी। पत्रकार की हत्या के बाद यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गया था और इसकी निष्पक्ष जांच की मांग उठने लगी थी।
सीबीआई को सौंपी गई थी जांच
इस हत्याकांड की गंभीरता को देखते हुए बाद में मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई को सौंप दी गई थी। सीबीआई ने लंबी जांच के बाद इस मामले में कई आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया था।
इसके बाद सीबीआई की विशेष अदालत में इस मामले की सुनवाई शुरू हुई। कई वर्षों तक चली सुनवाई और गवाहियों के बाद विशेष अदालत ने गुरमीत राम रहीम सहित अन्य आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
इस फैसले के खिलाफ सभी दोषियों ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। उसी अपील पर सुनवाई के बाद अब हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है।
अदालत में हुई लंबी बहस
हाई कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष और सीबीआई दोनों की ओर से विस्तृत बहस की गई। बचाव पक्ष ने अदालत के सामने कई कानूनी तर्क रखते हुए कहा कि राम रहीम के खिलाफ सीधे तौर पर कोई ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं हैं।
वहीं सीबीआई ने अपने पक्ष में गवाहों के बयान और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का हवाला दिया। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद पूरे मामले का गहराई से अध्ययन किया। अंततः अदालत ने यह फैसला दिया कि राम रहीम के खिलाफ प्रस्तुत साक्ष्य आपराधिक साजिश में उनकी भूमिका को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।












