डेनमार्क, जर्मनी, नीदरलैंड्स, ऑस्ट्रिया और ग्रीस ने अस्वीकृत शरण आवेदकों के लिए गैर-EU देशों में ‘रिटर्न हब’ बनाने की योजना पर सहमति जताई है। पांचों देश 2027 तक पहला समझौता करने और केंद्र शुरू करने की तैयारी में हैं।
कोपेनहेगन: डेनमार्क, जर्मनी, नीदरलैंड्स, ऑस्ट्रिया और ग्रीस ने गैर-EU देशों में ऐसे “रिटर्न हब” स्थापित करने के मॉडल पर सहमति जताई है, जहां उन प्रवासियों को भेजा जा सकेगा जिनके शरण आवेदन यूरोपीय देशों में खारिज हो चुके हैं। पांचों देशों ने शुक्रवार को कोपेनहेगन में हुई एक बैठक के बाद इस योजना को आगे बढ़ाने की घोषणा की। यूरोपीय देशों का लक्ष्य इस पहल के तहत 2027 की शुरुआत तक किसी तीसरे देश के साथ पहला समझौता करना है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इन केंद्रों के लिए किन देशों को चुना जा रहा है। यूरोपीय अधिकारी मुख्य रूप से अफ्रीकी देशों की सरकारों के साथ संभावित स्थानों को लेकर बातचीत कर रहे हैं।
कोपेनहेगन बैठक में बनी सहमति
यह फैसला कोपेनहेगन में हुई एक दिवसीय बैठक के बाद सामने आया। बैठक में डेनमार्क के आव्रजन एवं एकीकरण मंत्री मोर्टेन बोद्सकोव के साथ जर्मनी, नीदरलैंड्स, ऑस्ट्रिया और ग्रीस के संबंधित मंत्री शामिल हुए।
बोद्सकोव ने कहा कि यह पहल यूरोप की साझा प्रवासन और शरण प्रणाली में एक महत्वपूर्ण बदलाव की दिशा में कदम है। उनके मुताबिक, पांच देश इस मॉडल को विकसित करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं और इसे व्यापक यूरोपीय व्यवस्था का हिस्सा बनाने की कोशिश की जा रही है।
नीदरलैंड्स के शरण और प्रवासन मंत्री बार्ट वान डेन ब्रिंक ने इसे नया और महत्वपूर्ण कदम बताया। उनका कहना है कि प्रस्तावित व्यवस्था यूरोपीय मूल्यों, अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों के अनुरूप होनी चाहिए।
क्या हैं ‘रिटर्न हब’?
यूरोपीय देशों के अनुसार, “रिटर्न हब” ऐसे केंद्र होंगे जहां उन अनियमित प्रवासियों को रखा या उनकी सहायता की जा सकेगी, जिनके पास यूरोप में रहने का कानूनी आधार नहीं है और जिन्हें तत्काल अपने मूल देश वापस भेजना संभव नहीं है।
डेनमार्क के मंत्री बोद्सकोव ने इस धारणा को खारिज किया कि ये केंद्र केवल हिरासत या निर्वासन केंद्र होंगे। उन्होंने कहा कि इन्हें ऐसे लोगों के लिए एक अवसर के तौर पर देखा जाना चाहिए जिन्हें अपने देश लौटने में फिलहाल कठिनाई है।
योजना के समर्थकों के मुताबिक, इन केंद्रों में प्रवासियों को चिकित्सा सहायता, प्रशिक्षण और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं। कुछ परिस्थितियों में वहां मौजूद लोगों को उनके मूल देश वापस भेजा जा सकता है, यदि वहां लौटना सुरक्षित हो। अन्य मामलों में उन्हें किसी तीसरे देश में पुनर्वास का विकल्प मिल सकता है।
अफ्रीकी देशों से बातचीत जारी
पांच यूरोपीय देशों ने संभावित “रिटर्न हब” के लिए कई गैर-EU देशों के साथ बातचीत शुरू की है। अधिकारियों ने अभी तक किसी देश का आधिकारिक नाम घोषित नहीं किया है।
हालांकि, अफ्रीका में संभावित साझेदार देशों को लेकर बातचीत की जा रही है। यूरोपीय पक्ष का कहना है कि तकनीकी वार्ताओं और संभावित साझेदार देशों के दौरे के जरिए वहां की मानवाधिकार स्थिति तथा रहने की परिस्थितियों का आकलन किया जाएगा।
यूरोपीय मंत्रियों के अनुसार, किसी भी समझौते में यूरोपीय और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन सुनिश्चित करना जरूरी होगा।
रवांडा का नाम भी चर्चा में
रवांडा उन देशों में शामिल है, जिसका नाम इस तरह की व्यवस्था को लेकर सामने आया है। अगस्त की शुरुआत में रवांडा सरकार की प्रवक्ता योलांडे माकोलो ने कहा था कि यूरोपीय देशों और अन्य सरकारों के साथ ऐसे प्रस्तावों पर बातचीत करना उनके लिए स्वाभाविक है।
माकोलो ने किगाली के रॉयल एफएम से बातचीत में गाशोरा में मौजूद एक आपातकालीन ट्रांजिट व्यवस्था का उदाहरण दिया। यह व्यवस्था 2018 में लीबिया से निकाले गए लोगों के लिए बनाई गई थी। वहां लोगों को तब तक रहने की अनुमति दी जा सकती थी, जब तक उनका किसी तीसरे देश में पुनर्वास नहीं हो जाता।
उन्होंने बताया कि चर्चा में ऐसे सुरक्षित स्थान की अवधारणा भी शामिल रही है, जहां उन लोगों को चिकित्सा सुविधा, प्रशिक्षण और आराम की व्यवस्था मिल सके जिनके पास जाने के लिए तत्काल कोई जगह नहीं है।
मानवाधिकार संगठनों ने उठाए सवाल
यूरोपीय देशों की इस योजना को मानवाधिकार संगठनों की कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। अधिकार समूहों का कहना है कि प्रवासियों को गैर-EU देशों में भेजने के बाद उनके अधिकारों की प्रभावी निगरानी और सुरक्षा सुनिश्चित करना मुश्किल हो सकता है।
मानवाधिकार संगठनों की मुख्य चिंता यह है कि यूरोपीय देश तीसरे देशों में मौजूद केंद्रों में रहने वाले प्रवासियों के अधिकारों की पूरी तरह गारंटी कैसे देंगे।
काउंसिल ऑफ यूरोप के मानवाधिकार आयुक्त माइकल ओ’फ्लाहर्टी ने कहा कि केवल मानवाधिकार कानूनों का पालन करने के अस्पष्ट आश्वासन पर्याप्त नहीं हैं। उनके अनुसार, देशों को ऐसी सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी, जिससे मानवाधिकारों की निगरानी से बाहर के क्षेत्र न बनें।
UNHCR ने कहा- प्रस्ताव की जानकारी नहीं मिली
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी यानी UNHCR ने भी इस योजना को लेकर सावधानी बरती है। एजेंसी ने कहा कि उसे इस प्रस्ताव के बारे में विस्तृत जानकारी के साथ औपचारिक रूप से संपर्क नहीं किया गया है।
UNHCR के मुताबिक, जब तक प्रस्तावित व्यवस्था और उसमें उसकी संभावित भूमिका से जुड़ी विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं होती, तब तक वह इस योजना के विशेष प्रबंधों पर टिप्पणी नहीं कर सकती।
यह बयान ऐसे समय आया है जब यूरोपीय देश प्रवासन नीति को अधिक सख्त बनाने के लिए नए विकल्प तलाश रहे हैं।
EU की प्रवासन नीति में बदलाव
यूरोप में अनियमित प्रवासन को लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक दबाव लगातार बढ़ा है। इसी पृष्ठभूमि में यूरोपीय कानूनों और नीतियों में भी बदलाव किए गए हैं।
जून में यूरोपीय सांसदों ने सदस्य देशों को EU के बाहर अपने स्तर पर या छोटे समूहों में केंद्र स्थापित करने की अनुमति देने वाले प्रस्ताव का समर्थन किया था। इसके तहत कुछ अस्वीकृत शरण आवेदकों को उनके मूल देशों के बजाय तीसरे देशों में भेजने की व्यवस्था की जा सकती है।
पांच देशों की मौजूदा पहल इसी व्यापक नीति बदलाव से जुड़ी मानी जा रही है। इन देशों ने अब इस मॉडल को व्यवहार में लागू करने की दिशा में आगे बढ़ने का संकेत दिया है।
अधिकार समूहों ने बताया पुरानी रणनीति
ब्रसेल्स स्थित प्रवासी अधिकार संगठन PICUM ने कोपेनहेगन बैठक की आलोचना की है। संगठन की निदेशक मिशेल लेवॉय ने कहा कि यूरोपीय नेता इन केंद्रों को नया समाधान बता सकते हैं, लेकिन प्रवासन नियंत्रण को दूसरे देशों में स्थानांतरित करना पहले से इस्तेमाल की जाने वाली रणनीति है।
उनका आरोप है कि ऐसी व्यवस्था से प्रवासियों को यूरोप से दूर रखा जा सकता है और मानवाधिकार संबंधी जिम्मेदारियों की निगरानी कठिन हो सकती है।
मानवाधिकार समूहों का कहना है कि किसी भी नई व्यवस्था में यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि प्रवासियों को हिरासत, निर्वासन या असुरक्षित परिस्थितियों का सामना न करना पड़े।
2027 तक पहला समझौता करने का लक्ष्य
डेनमार्क के मंत्री बोद्सकोव के अनुसार, पांचों देश 2027 की शुरुआत तक किसी संभावित साझेदार देश के साथ पहला समझौता करने की उम्मीद कर रहे हैं। हालांकि, इस प्रक्रिया में अभी कई सवालों का जवाब मिलना बाकी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि कौन-से देश इन केंद्रों की मेजबानी करेंगे और बदले में उन्हें यूरोपीय देशों से क्या मिलेगा। फिलहाल इस संबंध में कोई स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।
यूरोपीय देशों का कहना है कि प्रस्तावित “रिटर्न हब” यूरोपीय और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप संचालित किए जाएंगे। दूसरी ओर, मानवाधिकार संगठन यह सुनिश्चित करने की मांग कर रहे हैं कि किसी भी समझौते में प्रवासियों के मौलिक अधिकारों और सुरक्षा से समझौता न हो।
इस तरह पांच EU देशों की यह पहल यूरोप की बदलती प्रवासन नीति में एक महत्वपूर्ण प्रयोग के रूप में सामने आ रही है। यदि 2027 तक पहला समझौता होता है, तो इससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि गैर-EU देशों में अस्वीकृत शरण आवेदकों के लिए ऐसे केंद्र किस तरह काम करेंगे और यूरोपीय कानून तथा मानवाधिकार मानकों के साथ उनका तालमेल कैसे सुनिश्चित किया जाएगा।









