Aditya Birla: एक मिल से शुरू हुआ सफर, 41 देशों तक पहुंचा कारोबार

आदित्य बिड़ला ग्रुप ने एक मिल से शुरुआत कर 41 देशों तक अपना कारोबार फैलाया। जानें इस बड़े कारोबारी साम्राज्य का इतिहास, विस्तार और सफलता की कहानी, जिसने

एक समय था जब भारतीय उद्योगपतियों के लिए विदेशों में कारोबार करना बेहद मुश्किल माना जाता था। पूंजी की कमी, सख्त विदेशी मुद्रा नियम और सरकारी पाबंदियां बड़ी चुनौतियां थीं।

Aditya Birla Success Story: आज भारतीय कंपनियों की मौजूदगी दुनिया के कई देशों में दिखाई देती है, लेकिन कुछ दशक पहले विदेशों में कारोबार खड़ा करना आसान नहीं था। विदेशी मुद्रा पर नियंत्रण, निवेश संबंधी सख्त नियम और सीमित पूंजी भारतीय उद्योगपतियों के लिए बड़ी चुनौतियां थीं। ऐसे दौर में आदित्य विक्रम बिड़ला ने भारत से बाहर कारोबार विस्तार की ऐसी रणनीति अपनाई, जिसने आगे चलकर उनके समूह को वैश्विक पहचान दिलाई।

थाईलैंड से शुरू हुई ग्लोबल बिजनेस जर्नी

1960 के दशक के अंत और 1970 के शुरुआती वर्षों में थाईलैंड विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए कई प्रोत्साहन दे रहा था। कर छूट और पूंजीगत उपकरणों के आयात पर रियायत जैसी सुविधाओं ने आदित्य बिड़ला का ध्यान खींचा। उन्होंने इस अवसर को पहचाना और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपना पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय निवेश किया।

उनका शुरुआती प्रोजेक्ट करीब 1 करोड़ रुपये की लागत वाली टेक्सटाइल मिल था। इसे इंडो-थाई सिंथेटिक्स के नाम से स्थापित किया गया था। शुरुआत के बाद कंपनी को थाई एयरवेज से एक महत्वपूर्ण ऑर्डर भी मिला। एयरलाइन की एयर होस्टेस यूनिफॉर्म के लिए कपड़े की आपूर्ति ने नए कारोबार को शुरुआती मजबूती दी। इसके बाद बिड़ला समूह ने थाईलैंड से आगे बढ़ते हुए इंडोनेशिया और फिलीपींस में भी अपनी औद्योगिक मौजूदगी स्थापित की।

एक दशक में 10 कंपनियां खड़ी कीं

1970 से 1980 के बीच आदित्य बिड़ला ने दक्षिण-पूर्व एशिया में करीब 10 कंपनियां स्थापित कीं। इन कारोबारों की कुल बिक्री लगभग 10 करोड़ डॉलर तक पहुंच गई थी। समय के साथ थाईलैंड समूह का सबसे महत्वपूर्ण विदेशी निवेश केंद्र बन गया। मलेशिया में पाम ऑयल कारोबार और क्षेत्र के अन्य औद्योगिक निवेशों ने भी समूह के अंतरराष्ट्रीय पोर्टफोलियो को मजबूत किया। बिड़ला ने अपनी रणनीति में उन्हीं क्षेत्रों को प्राथमिकता दी, जिनमें उन्हें भारत में पहले से विशेषज्ञता हासिल थी।

फिलीपींस में झटका, फिर भी नहीं रुके

विदेशी विस्तार का सफर हमेशा आसान नहीं रहा। 1986 में फिलीपींस में राजनीतिक सत्ता परिवर्तन के बाद बिड़ला समूह की एक नारियल तेल रिफाइनरी का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। इसके बावजूद समूह ने देश से अपना कारोबार पूरी तरह नहीं हटाया। बाद में आर्थिक परिस्थितियां बेहतर होने पर बिड़ला ने फिलीपींस में दोबारा निवेश किया। 

1987 में करीब 5.5 करोड़ डॉलर के एक प्रोजेक्ट की घोषणा की गई, जिसमें रेयॉन फाइबर के उत्पादन की योजना थी। इसके बाद 1991 में समूह ने इंडो-फिल कॉर्न केमिकल्स की शुरुआत की।

1990 तक विदेशी कारोबार पहुंचा 1,200 करोड़ रुपये

1990 तक बिड़ला समूह की थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस में करीब 12 कंपनियां थीं। इनका कुल कारोबार लगभग 1,200 करोड़ रुपये बताया गया। सिर्फ पांच साल बाद, 1995 तक समूह की मौजूदगी 14 देशों में 17 कंपनियों तक पहुंच चुकी थी और बिक्री करीब 5,200 करोड़ रुपये हो गई थी।

उस दौर में भारत में समूह के विदेशी कारोबार के वास्तविक आकार की जानकारी बहुत सीमित लोगों को थी। विदेशी निवेश पर लागू नियमों और नियामकीय पाबंदियों के कारण कई विदेशी कंपनियां निजी तौर पर नियंत्रित थीं।

कार्बन ब्लैक ने बदली वैश्विक पहचान

बिड़ला समूह ने टेक्सटाइल के अलावा कार्बन ब्लैक जैसे औद्योगिक क्षेत्र में भी विस्तार किया। 1988 में इस कारोबार में प्रवेश के बाद भारत में उत्पादन क्षमता बढ़ाई गई और फिर थाईलैंड तथा मिस्र में संयंत्र स्थापित किए गए। इस विस्तार के साथ समूह कार्बन ब्लैक के वैश्विक बाजार में एक महत्वपूर्ण निर्माता बन गया। बाद में यूरोप के अन्य देशों में भी निवेश के अवसर सामने आए। इस रणनीति ने साबित किया कि समूह केवल भारतीय बाजार पर निर्भर रहने के बजाय वैश्विक औद्योगिक मांग को भी लक्ष्य बना रहा था।

सरकारें खुद निवेश के लिए देने लगीं न्योता

विदेशों में बिड़ला समूह की सफलता का असर ऐसा रहा कि कई देशों की सरकारों ने समूह को अपने यहां निवेश करने के लिए आमंत्रित करना शुरू किया। भूटान में सीमेंट उद्योग में निवेश की संभावनाओं पर भी बिड़ला समूह से बातचीत हुई। थाईलैंड के तत्कालीन प्रधानमंत्री चुआन लीकपाई ने भी समूह की वहां लंबी मौजूदगी के दौरान उसके निवेश की सराहना की थी। इसके बाद रूस से भी एक बड़े पल्प प्लांट को लेकर निवेश प्रस्ताव सामने आया। 1994 में बिड़ला समूह ने रूस में प्रवेश की योजना की घोषणा की।

एक मिल से शुरू होकर वैश्विक साम्राज्य तक

आदित्य विक्रम बिड़ला की कारोबारी रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि उन्होंने विदेशी बाजारों में विस्तार के लिए अपने परिचित औद्योगिक क्षेत्रों का इस्तेमाल किया। टेक्सटाइल से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे मेटल, केमिकल, कार्बन ब्लैक और अन्य क्षेत्रों तक पहुंचा। आज आदित्य बिड़ला समूह की कंपनियां 40 से अधिक देशों में कारोबार करती हैं। 

समूह की वैश्विक मौजूदगी एशिया, यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका तक फैली है। इसका कारोबार कई अरब डॉलर के स्तर पर है और राजस्व का एक बड़ा हिस्सा भारत के बाहर के बाजारों से आता है।

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