सम्राट चौधरी नीतीश कुमार की व्यवस्था को बर्बाद कर रहे बिहार के 38 जिलों से पटना आए 5000 Gen-Z बोले- स्कूलों को भगवा रंगने से फैसिलिटी नहीं मिलती

बिहार के 38 जिलों से करीब 5000 छात्र-युवा पटना पहुंचे। Gen-Z संसद में शिक्षा, रोजगार, भर्ती परीक्षाओं और स्कूलों की सुविधाओं को लेकर सरकार पर सवाल उठाए गए।
सम्राट चौधरी नीतीश कुमार की व्यवस्था को बर्बाद कर रहे बिहार के 38 जिलों से पटना आए 5000 Gen-Z बोले- स्कूलों को भगवा रंगने से फैसिलिटी नहीं मिलती
Photo Credit / Attribution: Google

बिहार की राजधानी पटना में रविवार को शिक्षा और रोजगार के मुद्दे पर बड़ी छात्र-युवा संसद का आयोजन हुआ, जिसमें राज्य के अलग-अलग जिलों से करीब 5000 छात्र और युवा पहुंचे। कार्यक्रम में युवाओं ने शिक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, स्कूलों की सुविधाओं और युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर सरकार पर सवाल उठाए। कार्यक्रम को ‘बिहार में गूंजेगी Gen-Z की आवाज’ नाम दिया गया था। इसमें राज्य के 38 जिलों से युवाओं के पहुंचने का दावा किया गया।

पटना के एसके मेमोरियल हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम में छात्र संगठनों और युवा आंदोलनों से जुड़े कई प्रतिनिधि शामिल हुए। युवाओं का कहना था कि बिहार में शिक्षा और रोजगार उनके सबसे बड़े मुद्दे हैं और इन सवालों पर सरकार को स्पष्ट जवाब देना चाहिए। कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि केवल स्कूलों की इमारत का रंग बदलने या किसी संस्थान को नया नाम देने से शिक्षा व्यवस्था बेहतर नहीं होती। स्कूलों में शिक्षक, पर्याप्त कमरे, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, शौचालय, पीने का पानी और दूसरी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

कार्यक्रम में CPI(ML) के विधायक संदीप सौरभ ने बिहार की शिक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने स्कूलों को भगवा रंग में रंगे जाने और उन्हें आदर्श विद्यालय के नाम से प्रचारित किए जाने का मुद्दा उठाया। उनका आरोप था कि स्कूलों की वास्तविक समस्याओं का समाधान करने के बजाय बाहरी बदलाव पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि स्कूल में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, जरूरी संसाधन नहीं हैं और बच्चों को पढ़ाई के बाद रोजगार की निश्चित राह नहीं मिलती तो केवल रंग-रोगन से शिक्षा की गुणवत्ता कैसे सुधरेगी। ये आरोप कार्यक्रम में विपक्षी नेता की ओर से लगाए गए हैं।

युवाओं की नाराजगी का एक बड़ा कारण रोजगार का मुद्दा भी रहा। छात्र-युवा संसद में वक्ताओं ने कहा कि बिहार में बड़ी संख्या में युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। सरकारी नौकरी की तैयारी में वर्षों लगाने के बाद भी परीक्षा प्रक्रिया, परिणाम और नियुक्ति को लेकर अनिश्चितता युवाओं के सामने बड़ी चुनौती बनती जा रही है। कार्यक्रम में प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों और पारदर्शिता को लेकर भी सवाल उठाए गए। युवाओं ने मांग की कि भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो और परीक्षा से लेकर नियुक्ति तक की प्रक्रिया तय समयसीमा में पूरी की जाए।

कार्यक्रम में सरकार की शिक्षा नीति और बजट को लेकर भी सवाल उठे। संदीप सौरभ ने दावा किया कि सदन में शिक्षा पर बजट का बड़ा हिस्सा खर्च करने की बात कही जाती है, लेकिन जमीन पर स्कूलों की स्थिति अलग दिखाई देती है। उन्होंने शिक्षकों की बहाली, स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं और बच्चों की पढ़ाई से जुड़े मुद्दों को उठाया। युवाओं की ओर से भी यह सवाल सामने आया कि यदि शिक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं होगी तो राज्य के छात्रों को उच्च शिक्षा और रोजगार के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर रहना पड़ेगा।

Gen-Z की इस सभा में केवल स्कूलों की स्थिति ही चर्चा का विषय नहीं रही। कॉलेज और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, फीस में बढ़ोतरी, प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यवस्था और छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर भी चर्चा हुई। छात्र प्रतिनिधियों ने कहा कि युवा केवल परीक्षा देने और नौकरी की तैयारी करने वाली आबादी नहीं हैं, बल्कि उन्हें शिक्षा नीति और रोजगार नीति से जुड़े फैसलों में अपनी बात रखने का अधिकार भी होना चाहिए।

कार्यक्रम में CPI(ML) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य भी शामिल हुए। उन्होंने बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर सरकार को घेरा और उत्क्रमित विद्यालयों की स्थिति को लेकर तीखी टिप्पणी की। उनका कहना था कि कई स्कूलों में विद्यार्थियों और शिक्षकों को पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार की जरूरत पर जोर दिया।

कार्यक्रम का राजनीतिक स्वर भी काफी तीखा रहा। युवाओं और विपक्षी नेताओं की ओर से मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए गए। कार्यक्रम में यह आरोप लगाया गया कि सरकार शिक्षा और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों से ध्यान हटाकर ऐसे मुद्दों पर ज्यादा जोर दे रही है, जिनका सीधा संबंध छात्रों की रोजमर्रा की जरूरतों से नहीं है। इसी क्रम में स्कूलों को भगवा रंग में रंगने का मुद्दा भी उठाया गया। युवाओं का कहना था कि स्कूल का रंग नहीं बल्कि वहां उपलब्ध शिक्षा और सुविधाएं उसकी गुणवत्ता तय करती हैं।

हालांकि सरकार की ओर से इन आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया दी गई है, यह अलग-अलग मुद्दों पर आधिकारिक स्पष्टीकरण पर निर्भर करेगा। समाचार रिपोर्ट में कार्यक्रम के दौरान विपक्षी नेताओं और छात्र प्रतिनिधियों के बयान प्रमुखता से सामने आए हैं। इसलिए इन राजनीतिक आरोपों को अंतिम तथ्य के बजाय कार्यक्रम में लगाए गए आरोप और उठाए गए सवाल के तौर पर देखना जरूरी है।

छात्र-युवा संसद में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर भी युवाओं की चिंता सामने आई। बिहार में बड़ी संख्या में युवा BPSC, शिक्षक भर्ती, पुलिस भर्ती, रेलवे, SSC और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। परीक्षा की तारीख में बदलाव, परिणाम में देरी, नियुक्ति प्रक्रिया में लंबा समय और कथित अनियमितताओं को लेकर छात्रों के बीच असंतोष लगातार सामने आता रहा है। कार्यक्रम में युवाओं ने मांग की कि सरकार ऐसी व्यवस्था तैयार करे जिसमें परीक्षा कैलेंडर पहले से तय हो और भर्ती प्रक्रिया समय पर पूरी हो।

कार्यक्रम में छह साल के आदित्य की मौजूदगी भी चर्चा में रही। वह पहले BPSC TRE-4 उम्मीदवारों के प्रदर्शन के दौरान चर्चा में आया था। कार्यक्रम में उसने भी सरकार के खिलाफ अपनी बात रखी और रोजगार के सवाल पर सरकार से जवाब मांगने की बात कही। उसकी मौजूदगी ने कार्यक्रम को भावनात्मक और प्रतीकात्मक दोनों रूपों में खास बना दिया।

युवाओं की ओर से यह सवाल भी उठाया गया कि बिहार के बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के बाद उनके लिए रोजगार के पर्याप्त अवसर क्यों नहीं बन रहे हैं। राज्य से बड़ी संख्या में युवा पढ़ाई और नौकरी के लिए दूसरे राज्यों का रुख करते हैं। अगर स्थानीय स्तर पर उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा और पर्याप्त रोजगार उपलब्ध हों तो पलायन को कम किया जा सकता है। छात्र नेताओं ने सरकार से ऐसी नीतियां बनाने की मांग की, जिनमें शिक्षा के साथ रोजगार को भी प्राथमिकता मिले।

Gen-Z संसद में देश के दूसरे छात्र आंदोलनों से जुड़े प्रतिनिधि भी पहुंचे। AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा सहित कई छात्र आंदोलन प्रतिनिधियों ने युवाओं के मुद्दों पर अपनी बात रखी। कार्यक्रम में झारखंड के JSSC आंदोलन, जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलनों और अन्य छात्र संगठनों से जुड़े प्रतिनिधियों की भागीदारी भी रही। इससे कार्यक्रम का दायरा केवल बिहार की शिक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देशभर में युवाओं के सामने मौजूद शिक्षा और रोजगार से जुड़े सवालों तक पहुंचा।

बिहार में Gen-Z की इस जुटान को राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 38 जिलों से युवाओं के पटना पहुंचने और शिक्षा-रोजगार के सवालों पर सामूहिक आवाज उठाने से यह संकेत मिलता है कि छात्र और युवा अब अपनी मांगों को संगठित तरीके से उठाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि किसी भी आंदोलन की वास्तविक राजनीतिक ताकत उसके आगे के कार्यक्रम, लगातार भागीदारी और सरकार की प्रतिक्रिया पर निर्भर करती है।

स्कूलों को लेकर उठाए गए सवाल भी सीधे छात्रों और अभिभावकों से जुड़े हैं। सरकारी स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक, अच्छी इमारत, डिजिटल संसाधन, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, खेल सुविधाएं और स्वच्छता जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं शिक्षा की गुणवत्ता के लिए जरूरी हैं। युवाओं का तर्क है कि इन सुविधाओं को बेहतर किए बिना सिर्फ स्कूलों के स्वरूप या नाम में बदलाव से बच्चों की पढ़ाई की समस्याएं खत्म नहीं होंगी।

कार्यक्रम में शिक्षा के साथ बेरोजगारी को जोड़कर देखने पर भी जोर दिया गया। युवाओं का कहना है कि स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी की तलाश में उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं पर निर्भर रहना पड़ता है। निजी क्षेत्र में भी पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं होने पर सरकारी नौकरी ही बड़ी संख्या में युवाओं का लक्ष्य बन जाती है। इससे प्रतियोगी परीक्षाओं पर दबाव बढ़ता है और परीक्षा प्रक्रिया में छोटी सी देरी भी हजारों-लाखों युवाओं के भविष्य को प्रभावित करती है।

युवाओं ने यह भी कहा कि शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं होना चाहिए। पढ़ाई के साथ कौशल विकास, रोजगारपरक प्रशिक्षण, तकनीकी शिक्षा और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी जरूरी हैं। बिहार में यदि युवाओं को राज्य के भीतर ही बेहतर अवसर मिलते हैं तो उन्हें रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में जाने की जरूरत कम होगी। यही वजह है कि छात्र संगठनों की ओर से शिक्षा और रोजगार को एक साथ जोड़कर देखने की मांग की जा रही है।

इस छात्र-युवा संसद में सरकार की आलोचना के साथ आंदोलन को आगे बढ़ाने के संकेत भी दिए गए। वक्ताओं ने कहा कि छात्रों और युवाओं के सवालों को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर शिक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दों पर सरकार की ओर से ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को और व्यापक बनाने की कोशिश की जाएगी।

बिहार की राजनीति में युवा मतदाताओं की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में शिक्षा, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दे राजनीतिक बहस का बड़ा हिस्सा बन सकते हैं। पटना में 5000 युवाओं की जुटान इसी व्यापक असंतोष और सवालों को सामने लाने का प्रयास है। युवाओं की ओर से उठाई गई मांगों पर सरकार की प्रतिक्रिया और आने वाले दिनों में छात्र संगठनों के अगले कदम से यह स्पष्ट होगा कि यह कार्यक्रम एक दिन की सभा तक सीमित रहता है या बड़े आंदोलन का रूप लेता है।

फिलहाल पटना में हुई Gen-Z छात्र-युवा संसद ने बिहार की शिक्षा और रोजगार व्यवस्था को लेकर बहस तेज कर दी है। युवाओं ने सरकार से स्कूलों की वास्तविक सुविधाओं, शिक्षकों की उपलब्धता, प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता, समय पर नियुक्ति और रोजगार के अवसर बढ़ाने की मांग की है। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की व्यवस्था को लेकर भी तीखे राजनीतिक आरोप लगाए गए। वहीं स्कूलों को भगवा रंग से रंगने के मुद्दे पर युवाओं ने सवाल उठाते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार का पैमाना रंग-रोगन नहीं, बल्कि बच्चों को मिलने वाली वास्तविक सुविधाएं और गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई होनी चाहिए।

Leave a comment