बिहार में 852 करोड़ से रैयाम-सकरी में बनेंगी नई चीनी मिलें, 27,980 किसानों ने दिखाई रुचि; नवंबर में शिलान्यास

बिहार के रैयाम और सकरी में 852.43 करोड़ की लागत से नई सहकारी चीनी मिलें बनेंगी। 27,980 किसानों ने समितियों की सदस्यता के लिए आवेदन किया है।
बिहार में 852 करोड़ से रैयाम-सकरी में बनेंगी नई चीनी मिलें, 27,980 किसानों ने दिखाई रुचि; नवंबर में शिलान्यास
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पटना: बिहार में लंबे समय से बंद पड़ी चीनी मिलों को फिर से सक्रिय करने की दिशा में सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। दरभंगा के रैयाम और मधुबनी के सकरी में नई सहकारी चीनी मिलों की स्थापना की तैयारी तेज कर दी गई है। दोनों परियोजनाओं की कुल अनुमानित लागत 852.43 करोड़ रुपये है। सरकार की इस पहल को गन्ना किसानों, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि आधारित उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। परियोजनाओं की समीक्षा के दौरान यह भी सामने आया कि दोनों मिलों से जुड़ने के लिए अब तक 27,980 किसानों ने ऑनलाइन आवेदन किया है। 

प्रस्तावित परियोजना के तहत रैयाम चीनी मिल के लिए करीब 504.67 करोड़ रुपये और सकरी चीनी मिल के लिए लगभग 347.76 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। सरकार का उद्देश्य केवल चीनी उत्पादन शुरू करना नहीं है, बल्कि इन परियोजनाओं के जरिए गन्ने की खेती को बढ़ावा देने के साथ-साथ कृषि सेवाओं, परिवहन, रोजगार और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को भी गति देना है। 

सरकार की ओर से दोनों चीनी मिलों के शिलान्यास की तैयारी नवंबर में करने की बात कही गई है। परियोजनाओं को तय समय सीमा में आगे बढ़ाने के लिए सहकारिता विभाग लगातार अधिकारियों के साथ समीक्षा कर रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में किसानों की भागीदारी को सबसे अहम आधार माना जा रहा है, क्योंकि मिलों की सफलता के लिए पर्याप्त मात्रा में गन्ने की उपलब्धता जरूरी होगी।

इसी उद्देश्य से रैयाम और सकरी के कमांड एरिया में प्राथमिक चीनी मिल सहकारी समितियों के गठन की प्रक्रिया शुरू की गई है। अब तक रैयाम कमांड एरिया से 12,264 किसानों और सकरी कमांड एरिया से 15,716 किसानों ने ऑनलाइन आवेदन किया है। दोनों क्षेत्रों को मिलाकर कुल आवेदन की संख्या 27,980 पहुंच गई है। इन आवेदनों का सत्यापन अभी किया जा रहा है। 

सहकारी मॉडल की खास बात यह होगी कि इसमें किसानों की भागीदारी सीधे तौर पर सुनिश्चित की जाएगी। प्राथमिक चीनी मिल सहकारी समितियों के माध्यम से किसानों को मिलों से जोड़ा जाएगा। समितियां किसानों को केवल गन्ना आपूर्ति की सुविधा देने तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि उन्हें उन्नत गन्ना बीज, कृषि आदान, तकनीकी सलाह, मिट्टी जांच, प्रशिक्षण और जागरूकता जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने की योजना है। 

गन्ने की खेती का क्षेत्र बढ़ाने के लिए गांववार सर्वे और क्षेत्र विस्तार की योजना पर भी काम किया जा रहा है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में दोनों चीनी मिलों को पर्याप्त मात्रा में गन्ना मिल सके। किसानों को खेती के लिए संस्थागत ऋण उपलब्ध कराने के लिए सहकारी बैंकों के साथ समन्वय करने की योजना भी बनाई गई है।

रैयाम और सकरी चीनी मिलों के दोबारा सक्रिय होने की खबर से आसपास के किसानों में भी उम्मीद बढ़ी है। दोनों मिलें लंबे समय से बंद हैं और इनके बंद रहने का असर स्थानीय किसानों, मजदूरों और कारोबार से जुड़े लोगों पर पड़ा है। चीनी मिल के दोबारा संचालन से किसानों को गन्ने की फसल बेचने के लिए नजदीकी बाजार मिलने की उम्मीद है, जिससे परिवहन लागत और फसल बिक्री से जुड़ी परेशानियां कम हो सकती हैं।

दरअसल, इन दोनों मिलों को पुनर्जीवित करने की प्रक्रिया पिछले कई महीनों से चल रही है। फरवरी 2026 में बिहार सरकार के सहकारिता विभाग और राष्ट्रीय सहकारी शक्कर कारखाना संघ (NFCSF) के बीच समझौता हुआ था। इसके तहत रैयाम और सकरी में नई सहकारी चीनी मिलों की स्थापना के लिए संभाव्यता रिपोर्ट और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने की जिम्मेदारी तय की गई थी। प्रस्तावित गन्ना कॉम्प्लेक्स में चीनी उत्पादन के साथ पावर जनरेशन, इथेनॉल और कंप्रेस्ड बायोगैस जैसे क्षेत्रों को भी शामिल करने की योजना बताई गई थी। 

रैयाम चीनी मिल के कमांड क्षेत्र में बड़ी संख्या में गांवों को शामिल किया गया है। पहले की तैयारियों के अनुसार दरभंगा के 580 गांव और मधुबनी के 438 गांव, यानी कुल 1,018 गांवों को रैयाम मिल के लिए गन्ना आपूर्ति क्षेत्र में रखा गया था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस परियोजना का असर केवल मिल परिसर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आसपास के बड़े ग्रामीण क्षेत्र की कृषि अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। 

सरकार की योजना है कि किसानों को सहकारी व्यवस्था से जोड़कर उन्हें चीनी मिल की गतिविधियों में भागीदार बनाया जाए। इससे गन्ना उत्पादन बढ़ाने के साथ किसानों और मिल के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की कोशिश होगी। गन्ने की खेती के लिए बेहतर बीज और तकनीकी सहायता उपलब्ध होने पर उत्पादन और उत्पादकता बढ़ने की उम्मीद भी है।

रैयाम और सकरी की परियोजनाओं को बिहार में गन्ना आधारित उद्योग को मजबूत करने की व्यापक योजना से भी जोड़कर देखा जा रहा है। राज्य में बंद पड़ी चीनी मिलों को फिर से सक्रिय करने और नई मिलों में निवेश बढ़ाने की कोशिशें चल रही हैं। जुलाई में सरकार ने बिहार गन्ना उद्योग निवेश प्रोत्साहन नीति-2026 को भी मंजूरी दी थी, जिसके तहत राज्य में नई चीनी मिलों की स्थापना और गन्ना उद्योग में निवेश को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखा गया है। 

इन परियोजनाओं का सीधा फायदा किसानों के अलावा ग्रामीण क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों और छोटे कारोबारियों को भी मिलने की उम्मीद है। चीनी मिल के आसपास परिवहन, कृषि उपकरण, खाद-बीज, मरम्मत, मजदूरी और अन्य सेवाओं से जुड़े कारोबार में गतिविधियां बढ़ सकती हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पैसा घूमने और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावना है।

हालांकि नई चीनी मिलों को सफलतापूर्वक चलाने के लिए केवल भवन और मशीनरी तैयार करना पर्याप्त नहीं होगा। पर्याप्त गन्ना उत्पादन, किसानों को समय पर भुगतान, मिल की तकनीकी क्षमता, कुशल प्रबंधन और बाजार की स्थिति जैसे कई कारक इसकी सफलता तय करेंगे। यही वजह है कि सरकार शुरुआत से ही किसानों को सहकारी समितियों से जोड़ने और गन्ने का क्षेत्र बढ़ाने पर जोर दे रही है।

27,980 किसानों का आवेदन इस परियोजना को लेकर किसानों की शुरुआती रुचि को दिखाता है। रैयाम और सकरी दोनों क्षेत्रों में किसानों की इतनी बड़ी भागीदारी से यह संकेत मिलता है कि गन्ना उत्पादन को लेकर ग्रामीण इलाकों में फिर से उम्मीद पैदा हुई है। अब इन आवेदनों के सत्यापन और सहकारी समितियों के गठन के बाद परियोजना को जमीन पर उतारने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। 

सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती दोनों परियोजनाओं को तय समय में पूरा करना और किसानों की उम्मीदों पर खरा उतरना है। यदि मिलें समय पर तैयार होती हैं और उन्हें पर्याप्त गन्ना उपलब्ध होता है, तो दरभंगा और मधुबनी के साथ आसपास के इलाकों में गन्ना आधारित अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिल सकती है।

कुल मिलाकर रैयाम और सकरी में 852.43 करोड़ रुपये की लागत से प्रस्तावित नई सहकारी चीनी मिलें बिहार के गन्ना किसानों के लिए बड़ी उम्मीद बनकर सामने आई हैं। 27,980 किसानों की शुरुआती भागीदारी, सहकारी समितियों का गठन, गन्ना क्षेत्र विस्तार और नवंबर में शिलान्यास की तैयारी इस परियोजना को लेकर सरकार की गंभीरता दिखाती है। अब किसानों की नजर इस बात पर है कि दोनों मिलों का निर्माण कब शुरू होता है और वर्षों से बंद पड़ी चीनी मिलों की जगह नई औद्योगिक गतिविधियां कितनी तेजी से आकार लेती हैं। 

 

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