ओडिशा के रायगड़ा जिले के द्वीति चंद्र साहू ने गरीबी और अभाव के बावजूद पढ़ाई जारी रखी। मां ने घरों में बर्तन मांजकर उनका साथ दिया, जबकि उन्होंने अखबार बेचकर शिक्षा पूरी की और राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार हासिल किया।
Success Story: ओडिशा के छोटे से गांव कोटापेटा से निकलकर द्वीति चंद्र साहू ने संघर्ष और मेहनत के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई। बचपन में पिता का निधन हो गया और परिवार आर्थिक मुश्किलों से जूझता रहा। मां ने दूसरों के घरों में बर्तन मांजकर बेटे की पढ़ाई का खर्च उठाया, जबकि द्वीति ने भी अखबार बेचकर अपनी आगे की शिक्षा जारी रखी।
गरीबी के बीच पली उम्मीद, मां के संघर्ष ने बदली द्वीति चंद्र साहू की जिंदगी
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ओडिशा के रायगड़ा जिले के छोटे से गांव कोटापेटा के द्वीति चंद्र साहू ने बेहद मुश्किल हालात में पढ़ाई की। पिता के निधन के बाद मां ने दूसरों के घरों में बर्तन मांजकर बेटे की शिक्षा का खर्च उठाया। आर्थिक तंगी के बावजूद द्वीति ने पढ़ाई नहीं छोड़ी और आगे बढ़कर राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित हुए।
मां ने मेहनत कर बेटे की पढ़ाई जारी रखी
द्वीति चंद्र साहू का बचपन आर्थिक परेशानियों के बीच बीता। परिवार की स्थिति इतनी खराब थी कि उन्हें कई बार भूखे रहना पड़ा। कम उम्र में पिता का निधन होने के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनकी मां पर आ गई।
बेटे की पढ़ाई न रुके, इसके लिए उनकी मां ने दूसरों के घरों में बर्तन मांजकर मेहनत की। द्वीति ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनकी मां ने उन्हें पढ़ाने के लिए काफी संघर्ष किया। मां के इसी त्याग ने उन्हें आगे बढ़ने की हिम्मत दी।
अखबार बेचकर जुटाया पढ़ाई का खर्च
कोटापेटा जैसे दुर्गम इलाके में शिक्षा हासिल करना भी उनके लिए आसान नहीं था। वहां बिजली और इंटरनेट जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी थी। इसके बावजूद उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की और आगे की पढ़ाई जारी रखने का फैसला किया।
आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं होने के कारण उन्होंने रोज पैदल चलकर अखबार बेचे। इससे मिलने वाली कमाई से उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई का खर्च जुटाया। उनके लिए पढ़ाई जारी रखना किसी चुनौती से कम नहीं था, लेकिन उन्होंने मुश्किल परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी।
बच्चों की शिक्षा के प्रति समर्पण ने दिलाया सम्मान
संघर्ष के दौर से निकलकर द्वीति चंद्र साहू ने शिक्षा के क्षेत्र में अपना करियर बनाया। बच्चों को बेहतर तरीके से पढ़ाने और शिक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने उन्हें अलग पहचान दिलाई।
उनकी मेहनत और समर्पण को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली और उन्हें राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी कहानी बताती है कि सीमित संसाधनों के बावजूद दृढ़ इच्छाशक्ति और लगातार मेहनत के जरिए शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की जा सकती है।











