बिहार में आरक्षण विवाद के बीच रोहिणी आचार्य ने समीक्षा का किया विरोध, बोलीं- सामाजिक गैर-बराबरी तक जरूरी

बिहार में आरक्षण विवाद के बीच रोहिणी आचार्य ने समीक्षा का विरोध किया। कहा, सामाजिक और आर्थिक गैर-बराबरी खत्म होने तक बदलाव उचित नहीं।

बिहार में आरक्षण को लेकर जारी राजनीतिक बयानबाजी के बीच रोहिणी आचार्य ने आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि सामाजिक और आर्थिक गैर-बराबरी खत्म होने तक मौजूदा व्यवस्था में बदलाव उचित नहीं है।

पटना: बिहार में आरक्षण को लेकर NDA नेताओं के बीच चल रही बयानबाजी के बीच अब RJD प्रमुख लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए आरक्षण की समीक्षा पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब तक सामाजिक और आर्थिक असमानता बनी हुई है, तब तक मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा करना उचित नहीं होगा।

आरक्षण की समीक्षा को लेकर रोहिणी आचार्य का विरोध

बिहार में आरक्षण के मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी के बीच रोहिणी आचार्य ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। NDA के सहयोगी दलों के नेताओं जीतन राम मांझी, संतोष सुमन और चिराग पासवान के बीच आरक्षण को लेकर जारी चर्चा के बाद अब रोहिणी आचार्य भी इस बहस में शामिल हो गई हैं।

बिहार में आरक्षण विवाद के बीच रोहिणी आचार्य ने समीक्षा का किया विरोध, बोलीं- सामाजिक गैर-बराबरी तक जरूरी

रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए आरक्षण की समीक्षा के विचार का विरोध किया। उन्होंने कहा कि जब तक समाज में सामाजिक और आर्थिक गैर-बराबरी बनी हुई है, तब तक आरक्षण व्यवस्था की किसी भी तरह की समीक्षा उचित नहीं है।

उन्होंने आरक्षण को केवल सरकारी कल्याण योजना के तौर पर देखने के बजाय सामाजिक न्याय से जुड़ा संवैधानिक माध्यम बताया। उनके अनुसार, भारत में लंबे समय से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव और असमानता को कम करने में आरक्षण की महत्वपूर्ण भूमिका है।

सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व का दिया तर्क

रोहिणी आचार्य ने अपने बयान में आरक्षण के उद्देश्य को प्रतिनिधित्व से जोड़ते हुए कहा कि इसका मकसद सिर्फ आर्थिक स्थिति में सुधार करना नहीं है। उनके मुताबिक, वंचित समुदायों की शासन, प्रशासन, शिक्षा और लोकतांत्रिक संस्थाओं में भागीदारी सुनिश्चित करना भी आरक्षण का प्रमुख उद्देश्य है।

उन्होंने कहा कि जिन समुदायों को लंबे समय तक सामाजिक व्यवस्था की मुख्यधारा से दूर रखा गया, उन्हें संस्थागत स्तर पर प्रतिनिधित्व उपलब्ध कराना जरूरी है। इसी आधार पर उन्होंने मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में बदलाव या समीक्षा के विचार पर आपत्ति जताई।

उनका कहना है कि जब तक सभी वर्गों को उनके अनुपात के अनुरूप प्रतिनिधित्व हासिल नहीं हो जाता और सामाजिक तथा आर्थिक असमानता की खाई कम नहीं होती, तब तक आरक्षण के स्वरूप में बदलाव करना उचित नहीं होगा।

जातिगत भेदभाव का भी किया जिक्र

रोहिणी आचार्य ने अपने पोस्ट में यह भी कहा कि देश में कागजों पर हुई प्रगति के बावजूद जमीनी स्तर पर जातिगत भेदभाव और सामाजिक-आर्थिक असमानता अभी मौजूद है।

उन्होंने आरक्षण को वंचित वर्गों के लिए सुरक्षा कवच बताते हुए कहा कि इससे उन्हें बिना भेदभाव और सामाजिक बाधाओं के आगे बढ़ने का अवसर मिलता है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 का भी उल्लेख किया, जो समान अवसर और सामाजिक न्याय से जुड़े प्रावधानों को आधार देते हैं।

संविधान और डॉ. आंबेडकर के दृष्टिकोण का हवाला

रोहिणी आचार्य ने आरक्षण व्यवस्था को संविधान सभा और डॉ. बी.आर. आंबेडकर के सामाजिक न्याय से जुड़े दृष्टिकोण से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि वंचित वर्गों का सशक्तिकरण राष्ट्र निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है।

उनके अनुसार, आरक्षण की समीक्षा से वंचित समुदायों की सामाजिक सुरक्षा और अधिकारों पर असर पड़ने की आशंका रहती है। इसलिए उन्होंने मौजूदा प्रावधानों को बनाए रखने की वकालत की।

बिहार में आरक्षण को लेकर NDA के भीतर नेताओं के अलग-अलग बयानों के बीच रोहिणी आचार्य की यह प्रतिक्रिया राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उनका बयान इस बहस को सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के व्यापक मुद्दे से जोड़ता है। फिलहाल आरक्षण की समीक्षा को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों और नेताओं की राय सामने आ रही है, जिससे बिहार की राजनीति में यह मुद्दा चर्चा के केंद्र में बना हुआ है।

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