भागलपुर में आस्था और श्रद्धा का प्रतीक चैती छठ महापर्व पूरे विधि-विधान और उत्साह के साथ संपन्न हो गया। चार दिनों तक चले इस पर्व के अंतिम दिन व्रतियों ने उदीयमान भगवान सूर्य को अर्घ्य देकर अपनी तपस्या पूर्ण की। जैसे ही सूरज की पहली किरणें जल पर पड़ीं, घाटों पर मौजूद हजारों श्रद्धालुओं ने एक साथ अर्घ्य अर्पित किया, जिससे पूरा वातावरण भक्ति और आस्था से सराबोर हो उठा।
सुबह-सुबह घाटों पर छठ गीतों की मधुर ध्वनि गूंजती रही। “कांचे ही बांस के बहंगिया” और अन्य पारंपरिक गीतों ने माहौल को पूरी तरह भक्तिमय बना दिया। व्रतियों के साथ उनके परिवार और स्थानीय लोग भी बड़ी संख्या में घाटों पर मौजूद रहे। हर तरफ श्रद्धा, अनुशासन और परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिला।
इस बार कई स्थानों पर प्रशासन और स्थानीय लोगों की पहल से कृत्रिम तालाब बनाए गए, ताकि भीड़ को नियंत्रित किया जा सके और सभी व्रतियों को सुरक्षित तरीके से पूजा करने का अवसर मिले। इन कृत्रिम घाटों पर भी पूरी व्यवस्था की गई थी, जिससे लोगों को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।
प्रशासन ने भी इस पर्व को सकुशल संपन्न कराने के लिए व्यापक इंतजाम किए थे। सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध, साफ-सफाई और रोशनी की बेहतर व्यवस्था के कारण श्रद्धालुओं को किसी तरह की परेशानी नहीं हुई। स्वयंसेवकों और पुलिस बल ने मिलकर भीड़ को नियंत्रित किया और व्यवस्था बनाए रखी।
चैती छठ न केवल एक धार्मिक पर्व है, बल्कि यह प्रकृति, सूर्य और जल के प्रति आभार व्यक्त करने का भी प्रतीक है। इस पर्व में व्रती कठोर नियमों का पालन करते हुए 36 घंटे का निर्जला उपवास रखते हैं, जो उनकी आस्था और समर्पण को दर्शाता है।
भागलपुर में इस बार का छठ पर्व एक बार फिर यह साबित कर गया कि परंपरा और आस्था की जड़ें कितनी गहरी हैं। घाटों पर उमड़ी भीड़, गूंजते छठ गीत और व्रतियों की श्रद्धा ने इस महापर्व को और भी भव्य और यादगार बना दिया।










