भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कहा है कि कानूनी पेशा कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है। उन्होंने कहा कि कानूनी शिक्षा की असली नींव उन लोगों से मिलने वाले प्रेरक अनुभवों में है, जो दुनिया को हमसे अलग नजरिए से देखते हैं।
नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले विद्यार्थियों से कहा है कि कानूनी पेशा केवल डिग्री हासिल करने या कानून की धाराओं को समझने तक सीमित नहीं है। इसमें न्याय के लिए खड़े होने का साहस, ईमानदारी और समाज के अलग-अलग वर्गों की समस्याओं को समझने की संवेदनशीलता भी जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि पेशेवर जीवन में आगे बढ़ने के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए और न ही सफलता पाने के लिए शॉर्टकट अपनाने चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश बेंगलुरु स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) के 34वें वार्षिक दीक्षांत समारोह में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने नए कानून स्नातकों को संबोधित करते हुए कानूनी पेशे की जिम्मेदारियों, संवैधानिक मूल्यों और समाज के प्रति उनकी भूमिका पर जोर दिया।
‘कानूनी पेशा कमजोर दिल वालों के लिए नहीं’
CJI सूर्यकांत ने अपने संबोधन में कहा कि कानून का क्षेत्र चुनने वाले युवाओं को कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। कानूनी पेशे में कई बार ऐसे मामलों और परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है, जहां सही बात के पक्ष में खड़े होने के लिए साहस और दृढ़ता की जरूरत होती है। उन्होंने विद्यार्थियों को समझाया कि एक अच्छा वकील बनने के लिए केवल कानूनों और पुराने न्यायिक फैसलों का ज्ञान पर्याप्त नहीं है। न्याय की रक्षा करने के लिए नैतिक प्रतिबद्धता और उन लोगों की बात सुनने की क्षमता भी जरूरी है, जिनकी आवाज समाज में अक्सर दब जाती है।
उनके संदेश का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को यह याद दिलाना था कि कानून का पेशा व्यक्तिगत उपलब्धियों से आगे बढ़कर समाज और न्याय व्यवस्था के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है।
कानून की शिक्षा सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कानूनी शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल आपराधिक कानून, संवैधानिक कानून या दूसरे कानूनी सिद्धांतों को याद करना नहीं है। इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा ऐसे लोगों से संवाद करना भी है, जिनका जीवन और दुनिया को देखने का नजरिया विद्यार्थियों से अलग हो सकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अलग-अलग सामाजिक परिस्थितियों और अनुभवों को समझने से कानून के विद्यार्थियों की सोच व्यापक होती है। इससे उन्हें भविष्य में मामलों का विश्लेषण करने और न्याय से जुड़े प्रश्नों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिल सकती है।
उनके अनुसार, कानून की पढ़ाई विद्यार्थियों को केवल पेशेवर दक्षता नहीं देती, बल्कि उन्हें समाज की विविधता को समझने और सार्वजनिक हित में योगदान देने के लिए भी तैयार करती है।
संवैधानिक मूल्यों और स्वतंत्रता की रक्षा करने की अपील
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CJI सूर्यकांत ने नए स्नातकों से न्याय बनाए रखने, स्वतंत्रता की रक्षा करने और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहने का आह्वान किया। उन्होंने संकेत दिया कि कानून के क्षेत्र में काम करने वालों की भूमिका केवल अदालतों में दलीलें पेश करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि वे नागरिकों के अधिकारों और न्याय व्यवस्था में विश्वास बनाए रखने में भी योगदान देते हैं।
उन्होंने विद्यार्थियों को याद दिलाया कि कानूनी पेशे में ईमानदारी और निष्पक्षता का विशेष महत्व है। वकीलों को ऐसे लोगों की बात भी गंभीरता से सुननी चाहिए, जिनके पास अपने पक्ष को प्रभावी तरीके से रखने के साधन या अवसर सीमित हैं। इस तरह, उनका संबोधन कानूनी ज्ञान के साथ संवेदनशीलता और संवैधानिक जिम्मेदारी को जोड़ने पर केंद्रित रहा।
‘मैं आपको बधाई देता हूं, लेकिन आपसे उम्मीद भी रखता हूं’
दीक्षांत समारोह में CJI सूर्यकांत ने विद्यार्थियों को उनकी शैक्षणिक उपलब्धि के लिए बधाई दी। साथ ही उन्होंने कहा कि वह उनसे भविष्य में बड़ी उम्मीदें भी रखते हैं। उन्होंने स्नातकों को सलाह दी कि वे अपने संस्थान में सीखे गए मूल्यों को पेशेवर जीवन में भी बनाए रखें। उनके मुताबिक, सुविधाजनक रास्ता चुनने या जल्द सफलता हासिल करने के लिए सिद्धांतों को छोड़ देना सही दृष्टिकोण नहीं है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कानून के क्षेत्र में विश्वसनीयता और चरित्र लंबे समय तक व्यक्ति की पहचान बनते हैं। इसलिए युवाओं को अपने फैसलों में नैतिकता और जिम्मेदारी को प्राथमिकता देनी चाहिए।









