पटना के रावण दहन की कहानी में लाहौर से लालू प्रसाद तक का कनेक्शन, कभी 300 रुपये से हुई थी शुरुआत

पटना के रावण दहन की शुरुआत 1955 में विभाजन के बाद आए पंजाबी परिवारों ने की थी। जानिए 300 रुपये, लाहौर और लालू प्रसाद यादव से जुड़ी कहानी।
पटना के रावण दहन की कहानी में लाहौर से लालू प्रसाद तक का कनेक्शन, कभी 300 रुपये से हुई थी शुरुआत
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पटना के गांधी मैदान में होने वाला रावण दहन आज दशहरा के सबसे चर्चित आयोजनों में गिना जाता है, लेकिन इस भव्य परंपरा की शुरुआत देश के विभाजन के बाद अपना घर छोड़कर आए लोगों की पहल से जुड़ी है। वर्ष 1955 में शुरू हुए इस आयोजन के पीछे लाहौर के पास से पटना आए पंजाबी परिवारों की कहानी है। समय के साथ यह कार्यक्रम राजधानी की सांस्कृतिक पहचान बन गया। इसकी कहानी में वर्ष 1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के शामिल होने का प्रसंग भी जुड़ता है। कभी सीमित संसाधनों और लोगों के सहयोग से शुरू हुआ यह आयोजन आगे चलकर हजारों लोगों की आस्था और उत्साह का हिस्सा बन गया।

देश के विभाजन के बाद वर्ष 1947 में बड़ी संख्या में परिवारों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा था। लाहौर और पंजाब के दूसरे हिस्सों से आए कई परिवारों ने पटना में नई जिंदगी शुरू की। इन परिवारों के साथ उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराएं भी बिहार पहुंचीं। इन्हीं में बक्शी राम गांधी और उनके भाई मोहन लाल गांधी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। लाहौर के पास से पटना आए इन लोगों ने यहां दशहरा के अवसर पर रावण दहन का आयोजन शुरू करने की पहल की। उस समय यह केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि अपने पुराने परिवेश से दूर बसे लोगों के लिए अपनी संस्कृति और परंपरा से जुड़े रहने का एक माध्यम भी था

इस आयोजन को व्यवस्थित रूप देने के लिए वर्ष 1954 में श्री दशहरा कमेटी का गठन किया गया। बक्शी राम गांधी की पहल पर वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन के तत्कालीन मालिक दुर्गा प्रसाद शर्मा को कमेटी का पहला अध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद वर्ष 1955 में पहली बार रावण दहन का आयोजन किया गया। शुरुआत में इसमें सीमित संख्या में लोग शामिल हुए थे। आयोजन को लेकर स्थानीय पंजाबी समुदाय के लोगों में उत्साह था और धीरे-धीरे दूसरे लोग भी इससे जुड़ने लगे। शुरुआती दौर में कार्यक्रम का स्वरूप आज की तरह विशाल नहीं था, लेकिन इसकी नींव ने आगे चलकर पटना की दशहरा परंपरा को एक नई पहचान दी।

इस ऐतिहासिक शुरुआत से जुड़ी एक खास बात यह है कि पहले आयोजन के लिए महज 300 रुपये जुटाए गए थे। आज जब गांधी मैदान में रावण दहन के लिए बड़े-बड़े पुतले, आतिशबाजी और सुरक्षा व्यवस्था की तैयारियां होती हैं, तब शुरुआती दौर की यह छोटी रकम आयोजन के सफर को समझने में मदद करती है। उस समय संसाधन सीमित थे और कार्यक्रम के लिए समुदाय के लोगों को आपस में सहयोग करना पड़ता था। विभिन्न समाचार रिपोर्टों के अनुसार, शुरुआती आयोजन के लिए पाकिस्तान से आए परिवारों ने मिलकर रकम जुटाई थी। बाद में किसानों और दूसरे सहयोगियों से मिलने वाले चंदे ने भी आयोजन को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई

आयोजन के लिए आर्थिक मदद जुटाने का तरीका भी उस दौर की सामुदायिक भागीदारी को दर्शाता है। दशहरा कमेटी से जुड़े लोगों के अनुसार, पटना में संचालित एक कोल्ड स्टोरेज में आलू रखने आने वाले किसानों से चंदे के रूप में एक रुपये तक लिया जाता था। इस तरह किसानों और अन्य सहयोगियों के योगदान से आयोजन का खर्च जुटाने में मदद मिलती थी। वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन के मालिक दुर्गा प्रसाद शर्मा और कमेटी के अन्य सदस्यों ने भी आयोजन को आगे बढ़ाने में सहयोग किया। धीरे-धीरे दशहरा समारोह को अधिक व्यवस्थित रूप मिला और लोगों की भागीदारी बढ़ने लगी

शुरुआत में रावण दहन का आयोजन छोटे स्तर पर हुआ था। पहली बार बनाए गए पुतलों की ऊंचाई भी सीमित थी। उपलब्ध ऐतिहासिक रिपोर्टों में 50 फीट के रावण, 40 फीट के कुंभकर्ण और 30 फीट के मेघनाद के पुतलों का उल्लेख मिलता है। समय के साथ पुतलों के आकार, सजावट और आतिशबाजी में बदलाव आया। आयोजन का दायरा भी बढ़ता गया और गांधी मैदान इस परंपरा का प्रमुख केंद्र बन गया। अब दशहरा के अवसर पर यहां होने वाला रावण वध धार्मिक आयोजन के साथ पटना की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुका है

पटना के रावण दहन की कहानी में वर्ष 1990 एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। उस वर्ष तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव पहली बार इस समारोह में शामिल हुए थे। इससे पहले यह आयोजन मुख्य रूप से उन परिवारों और समुदायों की पहल से चलता था, जिन्होंने विभाजन के बाद पटना में इसकी शुरुआत की थी। मुख्यमंत्री के शामिल होने के बाद समारोह को अधिक व्यापक सार्वजनिक पहचान मिलने लगी। दर्शकों की संख्या बढ़ने लगी और पटना तथा आसपास के इलाकों से लोग इसे देखने पहुंचने लगे। आयोजन की लोकप्रियता बढ़ने के साथ इसकी व्यवस्थाओं और भव्यता में भी विस्तार हुआ।

लालू प्रसाद यादव के समारोह में शामिल होने का प्रसंग इस आयोजन के सामाजिक और सार्वजनिक स्वरूप में आए बदलाव को भी दिखाता है। किसी मुख्यमंत्री की मौजूदगी से ऐसे कार्यक्रम को प्रशासनिक और सार्वजनिक स्तर पर अधिक ध्यान मिलता है। हालांकि, आयोजन की शुरुआत उनसे कई दशक पहले हो चुकी थी और इसकी मूल पहल विभाजन के बाद पटना आए पंजाबी परिवारों ने की थी। इसलिए इस परंपरा की कहानी में बक्शी राम गांधी, मोहन लाल गांधी, दुर्गा प्रसाद शर्मा और दशहरा कमेटी से जुड़े शुरुआती लोगों की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितना बाद के वर्षों में इसका विस्तार।

वर्षों के दौरान गांधी मैदान का रावण दहन पटना के प्रमुख सार्वजनिक आयोजनों में शामिल हो गया। दशहरा के दिन यहां बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं। रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन, रामलीला और आतिशबाजी इस आयोजन के आकर्षण का हिस्सा रहे हैं। कार्यक्रम को लेकर प्रशासन, आयोजन समिति और सुरक्षा एजेंसियों को भी तैयारियां करनी पड़ती हैं, ताकि बड़ी संख्या में आने वाले लोगों की आवाजाही और सुरक्षा का प्रबंध किया जा सके। बदलते समय के साथ तकनीक और मंचीय प्रस्तुति में भी नए प्रयोग देखने को मिलते रहे हैं।

इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यह पटना की सांस्कृतिक पहचान में अलग-अलग समुदायों के योगदान को सामने लाती है। देश के विभाजन के कारण अपना घर छोड़ने वाले लोगों ने नई जगह पर बसने के साथ अपनी धार्मिक परंपराओं को भी जीवित रखा। रावण दहन का आयोजन उसी प्रयास का उदाहरण है। समय के साथ यह एक समुदाय के कार्यक्रम से आगे बढ़कर व्यापक जनभागीदारी वाला समारोह बन गया। आज इसमें शामिल होने वाले बहुत से लोगों के लिए यह बचपन की यादों, परिवार के साथ उत्सव मनाने और दशहरा की परंपरा से जुड़ने का अवसर है।

पटना के रावण दहन की कहानी इसलिए भी उल्लेखनीय है, क्योंकि इसकी शुरुआत किसी बड़े सरकारी आयोजन या विशाल बजट से नहीं हुई थी। कुछ परिवारों की पहल, कमेटी का गठन और शुरुआती 300 रुपये की व्यवस्था से शुरू हुआ यह सफर दशकों में विकसित हुआ। वर्ष 1990 में लालू प्रसाद यादव की भागीदारी के बाद इसे व्यापक पहचान मिली, जबकि इसकी ऐतिहासिक जड़ें विभाजन के बाद लाहौर और पंजाब से आए लोगों के अनुभवों से जुड़ी रहीं। गांधी मैदान में हर साल होने वाला यह आयोजन आज उस इतिहास, सामुदायिक सहयोग और सांस्कृतिक निरंतरता की याद दिलाता है, जिसने पटना की दशहरा परंपरा को आकार दिया।

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