CJP नेता सौरव दास और आशुतोष रांका के मामले की जांच क्राइम ब्रांच को, हिरासत दो दिन बढ़ी

फ्रांस, इटली और अल्बानिया में महंगाई, ईंधन की कीमतों, कमजोर सार्वजनिक सेवाओं और शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज हैं। स्पेन और पुर्तगाल में आवास संकट

दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका के खिलाफ दर्ज मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंपी गई है। अदालत ने दोनों की हिरासत दो दिन बढ़ाते हुए जमानतदारों की पहचान संबंधी खामियों पर सवाल उठाए।\

नई दिल्ली: दिल्ली पुलिस ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका के खिलाफ दर्ज मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंप दी है। दोनों नेताओं पर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से संबंधित प्रतिबंधों का उल्लंघन करने का आरोप है। मामले में सोमवार को उनकी न्यायिक हिरासत दो दिन बढ़ा दी गई। विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट रितु राज ने जमानतदारों की पहचान से जुड़ी खामियों और दोनों नेताओं के भविष्य में कानून का पालन करने संबंधी आश्वासन पर सवाल उठाए।

यह मामला दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों के लिए निर्धारित स्थलों, पुलिस के प्रतिबंधात्मक आदेशों और राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ा है। CJP ने आरोप लगाया है कि उसके नेताओं की रिहाई में जानबूझकर देरी की जा रही है। हालांकि, पुलिस और मजिस्ट्रेट की ओर से उठाए गए सवालों के बीच मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।

कोर्ट ने कानून के पालन को लेकर जताई चिंता

सोमवार देर रात सामने आई विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के आदेश की प्रति के अनुसार, मजिस्ट्रेट रितु राज ने सौरव दास और आशुतोष रांका के आचरण पर चिंता व्यक्त की। आदेश में कहा गया कि उनके व्यवहार से यह आशंका पैदा होती है कि वे कानून का सम्मान नहीं कर रहे हैं।

मजिस्ट्रेट ने यह भी कहा कि प्रतिबंधित स्थानों पर या अनुमति नहीं मिलने के बावजूद बार-बार प्रदर्शन करने की अपील करना उनके आचरण को दर्शाता है। ऐसे व्यवहार से सार्वजनिक शांति और कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका जताई गई।

आदेश में दोनों नेताओं के इस आश्वासन पर भी संदेह व्यक्त किया गया कि वे भविष्य में इस तरह की गतिविधियों को दोहराएंगे नहीं। हालांकि, ये टिप्पणियां मजिस्ट्रेट के आदेश का हिस्सा हैं और इन्हें आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

जमानतदारों के दस्तावेजों में मिलीं खामियां

सौरव दास और आशुतोष रांका की रिहाई की प्रक्रिया के दौरान पेश किए गए जमानतदारों की पहचान और दस्तावेजों को लेकर भी सवाल उठे। मजिस्ट्रेट ने दोनों जमानतदारों की जांच में सामने आई कमियों का उल्लेख किया।

आदेश के मुताबिक, एक जमानतदार के जमानती बांड और पहचान पत्र पर मौजूद तस्वीरों में अंतर पाया गया। संबंधित व्यक्ति दूसरा पहचान पत्र भी प्रस्तुत नहीं कर सका। इससे उसकी पहचान की पुष्टि करने में कठिनाई हुई।

दूसरा जमानतदार उस व्यक्ति के बारे में बुनियादी जानकारी देने में असमर्थ रहा, जिसके लिए वह जमानत लेने आया था। इन कमियों को जमानत की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण माना गया।

जमानतदारों की पहचान और दस्तावेजों की पुष्टि जमानत प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। इस मामले में सामने आई आपत्तियों के कारण दोनों नेताओं की रिहाई का रास्ता तत्काल साफ नहीं हो सका।

10 अक्टूबर से शुरू हुआ हिरासत और प्रदर्शन का विवाद

CJP ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के विरोध और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन आयोजित करने की घोषणा की थी। पार्टी ने 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का कार्यक्रम तय किया था।

रिपोर्ट के मुताबिक, 10 अक्टूबर की सुबह CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को दिल्ली हवाई अड्डे पर विमान से ही पुलिस ने हिरासत में ले लिया। इसके बाद 11 अक्टूबर को तीनों को दिल्ली कैंट स्थित विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया गया।

अदालत में पेशी के बाद तीनों को 50-50 हजार रुपये के जमानती मुचलके पर रिहा कर दिया गया था। हिरासत से बाहर आने के बाद CJP नेताओं की तस्वीरें भी सामने आई थीं।

हालांकि, शुरुआती रिहाई के कुछ दिन बाद सौरव दास और आशुतोष रांका एक बार फिर पुलिस की कार्रवाई के दायरे में आ गए।

13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पहुंचे थे सौरव और आशुतोष

रिपोर्ट के अनुसार, जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने के एक दिन बाद, 13 अक्टूबर को सौरव दास और आशुतोष रांका तिरंगा लेकर वहां पहुंचे थे। उनके साथ कुछ अन्य प्रदर्शनकारी भी मौजूद थे।

पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया। दोनों नेताओं पर आरोप है कि उन्होंने प्रतिबंधों के बावजूद प्रदर्शन किया। इसी मामले में उनकी हिरासत बढ़ाए जाने की कार्रवाई हुई।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दोनों नेता 14 अक्टूबर से तिहाड़ जेल में बंद हैं। सोमवार को उनकी हिरासत दो दिन और बढ़ा दी गई। उन्हें बुधवार को दोबारा पेश किया जाना था। मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंपे जाने के बाद आगे की जांच और कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

अभिजीत दीपके को 17 अक्टूबर को मिली थी जमानत

सौरव दास और आशुतोष रांका की गिरफ्तारी के विरोध में CJP ने 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में 'लहरा दो तिरंगा' रैली आयोजित करने का आह्वान किया था।

रिपोर्ट के मुताबिक, रैली से पहले पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके को हिरासत में लिया गया। उन्हें 17 अक्टूबर को 50 हजार रुपये के बेल बॉन्ड पर जमानत मिली। उनकी रिहाई के बाद सामने आई तस्वीरों में वह वाहन में विक्ट्री साइन दिखाते नजर आए।

CJP ने इन घटनाओं को अपने नेताओं की रिहाई में देरी से जोड़ते हुए पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, पार्टी के आरोपों और पुलिस की कार्रवाई से जुड़े सभी पहलुओं का अंतिम निर्धारण संबंधित कानूनी प्रक्रिया के तहत होना है।

तिरंगा मार्च को लेकर दिल्ली पुलिस ने दर्ज कीं तीन FIR

CJP के तिरंगा मार्च से जुड़े घटनाक्रम में दिल्ली पुलिस ने शनिवार को कम से कम तीन प्राथमिकी (FIR) दर्ज कीं। रिपोर्ट के मुताबिक, इन मामलों में CJP संस्थापक अभिजीत दीपके, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा और आम आदमी पार्टी (AAP) के नेताओं समेत कई लोगों के नाम शामिल हैं।

प्राथमिकी कनॉट प्लेस और मंडी हाउस पुलिस थानों में दर्ज की गईं। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर प्रतिबंधात्मक आदेशों का उल्लंघन करने, सड़क के बीच मार्च निकालने और पुलिस के काम में बाधा डालने के आरोप लगाए हैं।

इन आरोपों पर संबंधित व्यक्तियों का पक्ष और कानूनी प्रक्रिया के अंतिम निष्कर्ष सार्वजनिक रूप से सामने आना महत्वपूर्ण होगा। प्राथमिकी दर्ज होना अपने आप में आरोपों के साबित होने का प्रमाण नहीं है।

अब आगे क्या होगा?

सौरव दास और आशुतोष रांका से जुड़े मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंपे जाने के बाद जांच एजेंसी की भूमिका अहम हो गई है। हिरासत बढ़ाने के आदेश, जमानतदारों के दस्तावेजों पर उठी आपत्तियां और प्रदर्शन से संबंधित प्रतिबंधों के उल्लंघन के आरोप आगे की कानूनी कार्यवाही को प्रभावित कर सकते हैं।

फिलहाल, CJP नेताओं की रिहाई और उनके खिलाफ दर्ज मामलों की स्थिति पर नजर बनी हुई है। इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस के आरोपों, मजिस्ट्रेट के आदेश और संबंधित पक्षों के जवाब को अलग-अलग समझना जरूरी है। मामले का अंतिम परिणाम आगे की जांच और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

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