देव स्नान पूर्णिमा २०२६ 108 कलशों से होगा भगवान जगन्नाथ का दिव्य अभिषेक स्नान के बाद चढ़ेगा उबली सब्जियों का विशेष भोग

देव स्नान पूर्णिमा पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का 108 कलशों से महाभिषेक होगा। स्नान के बाद उबली सब्जियों का विशेष भोग लगेगा।
देव स्नान पूर्णिमा २०२६ 108 कलशों से होगा भगवान जगन्नाथ का दिव्य अभिषेक स्नान के बाद चढ़ेगा उबली सब्जियों का विशेष भोग
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देव स्नान पूर्णिमा के पावन अवसर पर भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का भव्य एवं वैदिक विधि-विधान से महाभिषेक किया जाएगा। इस दिन को जगन्नाथ परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि वर्ष में केवल इसी अवसर पर भगवान का सार्वजनिक स्नान उत्सव आयोजित होता है। श्रद्धालु बड़ी संख्या में मंदिरों में पहुंचकर इस दिव्य अनुष्ठान के साक्षी बनते हैं और भगवान के दर्शन कर सुख-समृद्धि तथा उत्तम स्वास्थ्य की कामना करते हैं।

Dev Snana Purnima के अवसर पर भगवान का अभिषेक 108 पवित्र कलशों के जल से किया जाएगा। इन कलशों में विभिन्न पवित्र स्रोतों से लाया गया जल, सुगंधित द्रव्य, चंदन, पुष्प और औषधीय तत्व मिलाए जाते हैं। वैदिक मंत्रोच्चार और शंखध्वनि के बीच भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा का स्नान कराया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिव्य स्नान से संपूर्ण सृष्टि में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

स्नान उत्सव के बाद भगवान को विशेष वस्त्र और अलंकरण से सजाया जाता है। परंपरा के अनुसार स्नान के पश्चात भगवान को ज्वर आने की मान्यता है। इसी कारण उन्हें कुछ दिनों के लिए विश्राम कराया जाता है। इस अवधि को 'अनवसर' या 'अनासरा' कहा जाता है। इस दौरान मंदिर के गर्भगृह में भगवान के दर्शन सामान्य श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं और विशेष सेवायत उनकी सेवा एवं उपचार की परंपरा निभाते हैं।

धार्मिक परंपरा के अनुसार इस दिन भगवान को उबली हुई सब्जियों का विशेष भोग अर्पित किया जाता है। बिना प्याज-लहसुन और सात्विक विधि से तैयार यह भोग भगवान को समर्पित करने के बाद श्रद्धालुओं में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। मान्यता है कि स्नान के बाद भगवान के स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए उन्हें हल्का और सात्विक भोजन अर्पित किया जाता है।

Jagannath Temple सहित देशभर के जगन्नाथ मंदिरों में इस अवसर पर विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। मंदिरों को आकर्षक फूलों, रंग-बिरंगी रोशनी और पारंपरिक सजावट से सजाया जाता है। सुबह मंगला आरती से लेकर रात्रि आरती तक विशेष पूजा, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन होता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए पहुंचते हैं और पूरे वातावरण में भक्तिमय उल्लास देखने को मिलता है।

धर्माचार्यों के अनुसार देव स्नान पूर्णिमा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भगवान और भक्त के बीच प्रेम, श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक भी है। मान्यता है कि इस दिन भगवान का स्नान दर्शन करने से जीवन में सुख, शांति, आरोग्य और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। कई श्रद्धालु इस दिन व्रत रखते हैं, दान-पुण्य करते हैं और जरूरतमंदों को भोजन एवं वस्त्र वितरित करते हैं।

स्नान पूर्णिमा के बाद जगन्नाथ परंपरा में रथ यात्रा की तैयारियां और तेज हो जाती हैं। अनवसर अवधि समाप्त होने के बाद भगवान नवयौवन रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं और फिर भव्य रथ यात्रा में नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं। यही कारण है कि देव स्नान पूर्णिमा को रथ यात्रा की शुरुआत का आध्यात्मिक आधार भी माना जाता है।

मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि दर्शन के दौरान अनुशासन बनाए रखें, निर्धारित कतारों का पालन करें और प्रशासन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का अनुपालन करें। सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए अतिरिक्त पुलिस बल और स्वयंसेवकों की भी तैनाती की गई है, ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देव स्नान पूर्णिमा पर भगवान जगन्नाथ के अभिषेक का दर्शन अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस दिन सच्चे मन से भगवान की आराधना करने और उनके स्नान महोत्सव के दर्शन करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और भगवान जगन्नाथ की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

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