अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘थर्ड कंट्री’ डिपोर्टेशन नीति को संघीय अदालत ने असंवैधानिक करार दिया है। कोर्ट ने कहा कि प्रवासियों को उचित कानूनी प्रक्रिया का अधिकार है। प्रशासन को अपील के लिए 15 दिन का समय मिला है।
वाशिंगटन: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अदालत से लगातार झटके मिल रहे हैं। पहले उनके टैरिफ फैसले को अवैध करार दिया गया और अब संघीय अदालत ने उनकी ‘थर्ड कंट्री’ डिपोर्टेशन पॉलिसी को भी गैरकानूनी घोषित कर दिया है। वाशिंगटन में दिए गए इस फैसले ने ट्रंप प्रशासन के लिए नई कानूनी चुनौती खड़ी कर दी है।
फेडरल जज ने स्पष्ट आदेश दिया कि इस नीति को रद्द किया जाए, क्योंकि यह अमेरिकी कानून और संविधान में दिए गए उचित प्रक्रिया के अधिकार का उल्लंघन करती है। इस फैसले के बाद ट्रंप प्रशासन में हलचल तेज हो गई है।
क्या है ‘थर्ड कंट्री’ डिपोर्टेशन पॉलिसी
‘थर्ड कंट्री’ डिपोर्टेशन पॉलिसी के तहत उन प्रवासियों को, जिन्हें उनके मूल देश में खतरा होने के कारण वापस नहीं भेजा जा सकता था, किसी तीसरे देश में भेजा जा सकता था। उदाहरण के तौर पर, कुछ प्रवासियों को दक्षिण सूडान जैसे देशों में भेजे जाने की कोशिश की गई, जहां उनका कोई सीधा संबंध नहीं था।
आलोचकों का कहना था कि यह नीति प्रवासियों को बिना पर्याप्त नोटिस और कानूनी अवसर दिए देश से बाहर भेजने का रास्ता खोलती है। अदालत ने भी इसी बिंदु पर आपत्ति जताई है।
जज ब्रायन ई. मर्फी का फैसला
मैसाचुसेट्स के यूएस डिस्ट्रिक्ट जज ब्रायन ई. मर्फी ने बुधवार को यह फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि होमलैंड सिक्योरिटी विभाग यानी DHS की नीति के तहत प्रवासियों को तीसरे देश में भेजने से पहले उन्हें “अर्थपूर्ण नोटिस” और आपत्ति दर्ज कराने का अवसर मिलना चाहिए।
जज मर्फी ने कहा कि वर्तमान नीति वैध कानूनी चुनौतियों को खत्म कर देती है, क्योंकि निर्वासन पहले लागू कर दिया जाता है और बाद में कानूनी प्रक्रिया की बात होती है। उन्होंने संविधान के मूल सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका में किसी भी व्यक्ति को उचित प्रक्रिया के बिना जीवन, स्वतंत्रता या संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।

15 दिनों की राहत, सुप्रीम कोर्ट में अंतिम फैसला
हालांकि जज मर्फी ने अपने फैसले को 15 दिनों के लिए स्थगित करने पर सहमति जताई है, ताकि सरकार अपील कर सके। यह मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है और अब देश की सर्वोच्च अदालत इसमें अंतिम फैसला करेगी।
पिछले वर्ष यूएस सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासन के पक्ष में फैसला दिया था, जिससे मर्फी के पुराने आदेश पर रोक लग गई थी। उस समय कुछ प्रवासियों को दक्षिण सूडान भेजने वाली उड़ान को पूरा करने की अनुमति मिल गई थी।
अब एक बार फिर यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के सामने है और कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि यह फैसला अमेरिका की इमिग्रेशन पॉलिसी पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।
ट्रंप प्रशासन पर आदेश उल्लंघन का आरोप
जज मर्फी ने अपने आदेश में यह भी कहा कि ट्रंप प्रशासन ने पहले भी अदालत के निर्देशों का उल्लंघन किया है या करने की कोशिश की है। उन्होंने उल्लेख किया कि पिछले मार्च में कुछ लोगों को अस्थायी रोक आदेश के बावजूद अल सल्वाडोर और मैक्सिको भेज दिया गया।
जज के अनुसार, इन मामलों में पर्याप्त कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि कई मामलों में प्रशासन ने मूल तथ्यों को सार्वजनिक नहीं किया, जिससे व्यक्तिगत दावों की सच्चाई स्पष्ट नहीं हो पाई।
कौन थे नीति के लक्ष्य
मर्फी ने कहा कि DHS की थर्ड कंट्री निर्वासन नीति उन प्रवासियों को निशाना बनाती थी, जिन्हें उनके मूल देश में उत्पीड़न या यातना का डर था और इसलिए उन्हें सुरक्षा दी गई थी।
इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट यानी ICE के अधिकारियों का कहना है कि मई में दक्षिण सूडान भेजे गए आठ पुरुष अमेरिका में अपराधों के दोषी थे और उनके पास अंतिम निर्वासन आदेश थे।
हालांकि अदालत का मानना है कि अपराध का दोषी होना भी किसी व्यक्ति के उचित कानूनी अधिकारों को खत्म नहीं करता। हर व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई और अपील का अधिकार है।










