स्क्रीन की लत, सेहत पर आफत: दुमका में आधी रात तक रील देखने से उड़ रही नींद, एकाग्रता पर भी असर

दुमका में देर रात तक मोबाइल पर रील देखने की आदत चिंता बढ़ा रही है। स्क्रीन टाइम बढ़ने से नींद, एकाग्रता और दिनचर्या प्रभावित होने का खतरा है।
स्क्रीन की लत, सेहत पर आफत: दुमका में आधी रात तक रील देखने से उड़ रही नींद, एकाग्रता पर भी असर
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झारखंड के दुमका में स्मार्टफोन और सोशल मीडिया का बढ़ता इस्तेमाल लोगों की दिनचर्या का अहम हिस्सा बनता जा रहा है। मोबाइल फोन अब केवल बातचीत या जरूरी जानकारी हासिल करने का साधन नहीं रह गया है, बल्कि मनोरंजन, वीडियो देखने, ऑनलाइन खरीदारी, पढ़ाई और दोस्तों से जुड़े रहने का प्रमुख माध्यम बन चुका है। खासकर इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स और दूसरे छोटे वीडियो प्लेटफॉर्म लोगों को लंबे समय तक स्क्रीन से जोड़े रखते हैं। कई बार लोग कुछ मिनट के लिए मोबाइल उठाते हैं, लेकिन एक के बाद एक वीडियो देखते हुए उन्हें समय का अंदाजा ही नहीं रहता। यही आदत धीरे-धीरे देर रात तक जागने, सुबह देर से उठने, दिनभर थकान महसूस करने और जरूरी कामों में ध्यान नहीं लगा पाने जैसी समस्याओं का कारण बन सकती है। दुमका में भी मोबाइल स्क्रीन के बढ़ते इस्तेमाल और आधी रात तक रील देखने की आदत को लेकर चिंता सामने आ रही है। सवाल केवल इतना नहीं है कि लोग कितने घंटे मोबाइल इस्तेमाल कर रहे हैं, बल्कि यह भी है कि स्क्रीन के सामने बिताया गया समय उनकी नींद, पढ़ाई, कामकाज, पारिवारिक बातचीत और मानसिक सुकून को किस हद तक प्रभावित कर रहा है।

आज मोबाइल फोन की स्क्रीन पर उपलब्ध सामग्री इतनी विविध और लगातार बदलती रहती है कि उपयोगकर्ता का ध्यान बार-बार नए वीडियो की ओर खिंचता है। एक वीडियो खत्म होते ही अगला वीडियो अपने आप चलने लगता है। उपयोगकर्ता को हर बार कुछ नया देखने के लिए अलग से खोजने की जरूरत नहीं पड़ती। किसी वीडियो में हास्य होता है, तो किसी में मनोरंजन, खबर, खेल, फैशन, फिल्मी दृश्य या जीवनशैली से जुड़ी जानकारी। इसी तरह की लगातार बदलती सामग्री के कारण कई लोग मोबाइल पर जरूरत से ज्यादा समय बिता देते हैं। वे शुरुआत में केवल कुछ वीडियो देखने का इरादा रखते हैं, लेकिन धीरे-धीरे आधा घंटा, एक घंटा या उससे भी ज्यादा समय निकल जाता है। रात के समय जब घर का कामकाज पूरा हो जाता है और आसपास शांति होती है, तब मोबाइल चलाने की इच्छा और बढ़ सकती है। कई लोगों के लिए बिस्तर पर लेटकर रील देखना सोने से पहले की आदत बन जाता है। यही आदत जब रोजाना दोहराई जाती है, तो सोने का समय पीछे खिसकने लगता है और शरीर की सामान्य दिनचर्या प्रभावित हो सकती है।

देर रात तक मोबाइल चलाने का सबसे बड़ा असर नींद की अवधि और उसकी गुणवत्ता पर पड़ सकता है। शरीर को पर्याप्त आराम देने के लिए नियमित समय पर सोना और जागना महत्वपूर्ण है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति रात में लंबे समय तक वीडियो देखता रहता है, तो वह अपने सोने के समय को लगातार टाल सकता है। कभी वह सोचता है कि बस एक आखिरी वीडियो देखेगा, लेकिन फिर दूसरा वीडियो सामने आ जाता है। इस तरह रात काफी बीत जाती है और नींद के लिए मिलने वाला समय कम हो जाता है। सुबह जल्दी उठने की मजबूरी होने पर व्यक्ति की नींद पूरी नहीं हो पाती। इसके बाद दिन में सुस्ती, थकान, चिड़चिड़ापन और काम करने में मन नहीं लगने जैसी परेशानियां महसूस हो सकती हैं। यदि यह सिलसिला लंबे समय तक चलता रहे, तो व्यक्ति की दिनचर्या असंतुलित हो सकती है। हालांकि, नींद पर असर केवल मोबाइल से ही नहीं पड़ता; तनाव, काम का दबाव, अनियमित दिनचर्या और अन्य कारण भी इसकी वजह हो सकते हैं। इसलिए समस्या को समझते समय व्यक्ति की पूरी जीवनशैली पर ध्यान देना जरूरी है।

मोबाइल स्क्रीन का अत्यधिक इस्तेमाल एकाग्रता को भी प्रभावित कर सकता है। लगातार छोटे-छोटे वीडियो देखने की आदत में व्यक्ति का ध्यान तेजी से एक सामग्री से दूसरी सामग्री की ओर जाता रहता है। कुछ समय बाद पढ़ाई, किताब पढ़ने, किसी लंबे लेख को समझने या बिना व्यवधान के काम पूरा करने में कठिनाई महसूस हो सकती है। पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के लिए यह समस्या विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्हें लंबे समय तक किसी विषय पर ध्यान केंद्रित करना पड़ता है। यदि पढ़ाई के बीच-बीच में बार-बार फोन की स्क्रीन देखने की आदत बन जाए, तो काम में रुकावट आती है और दोबारा ध्यान लगाने में समय लग सकता है। इसी तरह नौकरी करने वाले लोगों को भी कार्यालय के काम, जरूरी दस्तावेज पढ़ने या किसी समस्या पर विचार करने के दौरान बार-बार मोबाइल देखने से परेशानी हो सकती है। हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि रील देखने वाला हर व्यक्ति एकाग्रता की समस्या से जरूर जूझेगा। असर इस बात पर निर्भर करता है कि स्क्रीन का इस्तेमाल कितना, कब और किस उद्देश्य से किया जा रहा है तथा उससे व्यक्ति की बाकी गतिविधियां कितनी प्रभावित हो रही हैं।

दुमका जैसे शहरों में विद्यार्थियों, युवाओं और कामकाजी लोगों के जीवन में स्मार्टफोन की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऑनलाइन पढ़ाई, डिजिटल भुगतान, सरकारी सेवाओं की जानकारी, नौकरी से संबंधित आवेदन और संपर्क के लिए मोबाइल उपयोगी साधन है। ऐसे में फोन से पूरी तरह दूरी बना लेना न तो हमेशा व्यावहारिक है और न ही जरूरी। चुनौती यह है कि उपयोगी इस्तेमाल और बिना जरूरत लगातार स्क्रीन देखते रहने के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। यदि मोबाइल पढ़ाई या काम के लिए खोला गया है, तो उससे संबंधित काम पूरा करने के बाद सोशल मीडिया पर भटकने से बचना मददगार हो सकता है। इसी तरह मनोरंजन के लिए समय तय करने से मोबाइल इस्तेमाल पर नियंत्रण बनाए रखना आसान हो सकता है। समस्या तब बढ़ने लगती है जब व्यक्ति को खुद पता नहीं चलता कि वह कितनी देर से स्क्रीन देख रहा है या मोबाइल बंद करने का फैसला करने के बाद भी बार-बार उसे खोल लेता है। ऐसी स्थिति में अपनी आदतों पर ध्यान देना और रोजाना स्क्रीन टाइम की समीक्षा करना उपयोगी कदम हो सकता है।

रील देखने की आदत का एक दूसरा पहलू यह है कि मोबाइल पर बिताया गया समय कई बार दूसरी जरूरी गतिविधियों की जगह ले लेता है। रात में देर तक स्क्रीन देखने के कारण नींद का समय कम हो सकता है, जबकि दिन में मोबाइल के इस्तेमाल के कारण व्यायाम, खेलकूद, परिवार के साथ बातचीत या पढ़ाई के लिए समय घट सकता है। लंबे समय तक बैठे रहने और शारीरिक गतिविधि कम होने से भी दिनचर्या पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। यदि कोई व्यक्ति अपने खाली समय का बड़ा हिस्सा स्क्रीन पर बिताने लगे, तो वास्तविक सामाजिक संपर्क और बाहरी गतिविधियों के लिए समय कम रह सकता है। परिवार के सदस्य साथ बैठकर भी अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त रहें, तो बातचीत का समय घट सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि सोशल मीडिया का हर इस्तेमाल नुकसानदायक है। मोबाइल के माध्यम से लोग दोस्तों से जुड़े रहते हैं, नई चीजें सीखते हैं और मनोरंजन भी प्राप्त करते हैं। जरूरी यह है कि ऑनलाइन गतिविधियां जीवन के दूसरे महत्वपूर्ण हिस्सों पर हावी न हो जाएं।

नींद और एकाग्रता के साथ-साथ लगातार स्क्रीन देखने से आंखों में थकान, सूखापन, जलन, सिरदर्द या गर्दन में दर्द जैसी परेशानियां भी हो सकती हैं। लंबे समय तक बिना ब्रेक लिए स्क्रीन पर ध्यान केंद्रित करने से आंखों पर दबाव महसूस हो सकता है। मोबाइल को बहुत नीचे रखकर देखने या गलत मुद्रा में लंबे समय तक बैठे रहने से गर्दन और कंधों में असहजता बढ़ सकती है। इन समस्याओं से बचने के लिए बीच-बीच में स्क्रीन से नजर हटाना, कुछ देर चलना-फिरना, सही मुद्रा में बैठना और आंखों को आराम देना उपयोगी है। रात में मोबाइल का इस्तेमाल कम करना भी नींद की तैयारी में मदद कर सकता है। यदि आंखों में लगातार दर्द, सिरदर्द या नींद की गंभीर परेशानी बनी रहती है, तो केवल मोबाइल को दोष देने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना उचित होगा। समस्या की वास्तविक वजह समझने के लिए जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए।

मोबाइल की आदत पर नियंत्रण रखने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि फोन पर समय कहां खर्च हो रहा है। कई स्मार्टफोन में स्क्रीन टाइम या डिजिटल वेलबीइंग का विकल्प उपलब्ध होता है, जहां यह देखा जा सकता है कि किस ऐप पर कितनी देर बिताई गई। यदि कोई व्यक्ति पाता है कि वह रोजाना लंबे समय तक रील देखने में व्यस्त रहता है, तो वह धीरे-धीरे उस समय को कम करने का लक्ष्य तय कर सकता है। शुरुआत में बहुत कठोर नियम बनाने के बजाय छोटे और व्यावहारिक बदलाव ज्यादा मददगार हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, सोने से पहले मोबाइल चलाने का समय सीमित करना, भोजन के दौरान फोन दूर रखना और पढ़ाई या काम के समय अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद करना उपयोगी आदतें हो सकती हैं। यदि मोबाइल की घंटी या नोटिफिकेशन बार-बार ध्यान भटकाते हैं, तो जरूरी संपर्कों को छोड़कर बाकी अलर्ट सीमित किए जा सकते हैं। इस तरह फोन का इस्तेमाल पूरी तरह बंद किए बिना भी उस पर नियंत्रण बढ़ाया जा सकता है।

रात में मोबाइल चलाने की आदत कम करने के लिए सोने का एक निश्चित समय तय करना महत्वपूर्ण है। यदि कोई व्यक्ति रोजाना अलग-अलग समय पर सोता है, तो उसे नियमित दिनचर्या बनाने में कठिनाई हो सकती है। सोने से कुछ समय पहले स्क्रीन से दूरी बनाकर किताब पढ़ना, हल्का संगीत सुनना, अगले दिन की तैयारी करना या शांत गतिविधियों में समय बिताना मददगार हो सकता है। मोबाइल को बिस्तर पर साथ रखने के बजाय कुछ दूरी पर चार्ज करने से बार-बार फोन देखने की इच्छा कम की जा सकती है। अलार्म के लिए मोबाइल इस्तेमाल करना जरूरी हो, तो भी सोने के बाद सोशल मीडिया ऐप खोलने से बचने का नियम बनाया जा सकता है। रात में नोटिफिकेशन बंद करना या डू नॉट डिस्टर्ब मोड का उपयोग करना भी मदद कर सकता है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि व्यक्ति अपने लिए ऐसा नियम चुने जिसे वह लगातार निभा सके। एक-दो दिन मोबाइल कम चलाने के बाद फिर पुरानी आदत पर लौटने के बजाय धीरे-धीरे नियमित बदलाव करना अधिक व्यावहारिक हो सकता है।

अभिभावकों के लिए भी बच्चों और किशोरों के स्क्रीन टाइम पर ध्यान देना जरूरी है। आज कई बच्चे कम उम्र से ही स्मार्टफोन और वीडियो प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने लगते हैं। मोबाइल से उन्हें शैक्षणिक सामग्री और उपयोगी जानकारी मिल सकती है, लेकिन बिना सीमा के स्क्रीन इस्तेमाल करने से उनकी नींद, शारीरिक गतिविधियों और पढ़ाई की दिनचर्या प्रभावित होने का जोखिम रहता है। बच्चों को केवल डांटकर या अचानक फोन छीनकर रोकने के बजाय उनके साथ बातचीत करना ज्यादा उपयोगी हो सकता है। परिवार में स्क्रीन इस्तेमाल के कुछ साझा नियम बनाए जा सकते हैं, जैसे भोजन के दौरान फोन दूर रखना, सोने से पहले शांत समय रखना और रोजाना खेलकूद या बाहरी गतिविधियों के लिए समय निकालना। अभिभावक खुद भी यदि हर समय मोबाइल में व्यस्त रहें, तो बच्चों के लिए संतुलित व्यवहार सीखना कठिन हो सकता है। इसलिए परिवार के सभी सदस्यों का सहयोग जरूरी है। उम्र, पढ़ाई और व्यक्तिगत जरूरतों के हिसाब से नियम अलग हो सकते हैं, लेकिन नींद और शारीरिक गतिविधियों के लिए पर्याप्त समय बचाए रखना महत्वपूर्ण है।

युवाओं के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कई बार दोस्तों के साथ जुड़ने, मनोरंजन पाने और अपनी पसंद की सामग्री देखने का माध्यम होता है। कुछ लोगों को लगता है कि वे यदि लगातार ऑनलाइन नहीं रहे, तो कोई जरूरी संदेश, नया ट्रेंड या दोस्तों की बातचीत छूट जाएगी। इस भावना के कारण वे बार-बार फोन चेक कर सकते हैं। लेकिन हर नोटिफिकेशन का तुरंत जवाब देना जरूरी नहीं होता। कुछ समय के लिए मोबाइल से दूर रहने और अपनी प्राथमिकताओं पर ध्यान देने से रोजमर्रा के काम अधिक व्यवस्थित हो सकते हैं। यदि कोई विद्यार्थी पढ़ाई के समय फोन को दूसरे कमरे में रखता है या सोशल मीडिया के लिए एक निश्चित समय तय करता है, तो उसे ध्यान केंद्रित करने में मदद मिल सकती है। इसी तरह कामकाजी लोग जरूरी कार्यों के दौरान फोन को साइलेंट रखकर केवल तय अंतराल पर संदेश देख सकते हैं। उद्देश्य तकनीक से दूरी बनाना नहीं, बल्कि उसे अपनी जरूरत के अनुसार इस्तेमाल करना है।

मोबाइल की लत और सामान्य इस्तेमाल के बीच अंतर समझना भी जरूरी है। किसी व्यक्ति का फोन अधिक इस्तेमाल करना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसे कोई मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या है। लेकिन यदि बार-बार कोशिश करने के बाद भी वह स्क्रीन टाइम कम नहीं कर पा रहा, मोबाइल बंद करने पर अत्यधिक बेचैनी महसूस करता है, नींद और पढ़ाई या काम लगातार प्रभावित हो रहे हैं या रिश्तों में तनाव बढ़ रहा है, तो इस व्यवहार को गंभीरता से देखना चाहिए। ऐसी स्थिति में किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना, दिनचर्या में बदलाव करना और जरूरत पड़ने पर योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना मददगार हो सकता है। समस्या को शर्म या अपराधबोध से जोड़ने के बजाय इसे व्यवहार में सुधार की जरूरत के रूप में समझना चाहिए। समय पर ध्यान देने से व्यक्ति अपनी आदतों को बेहतर ढंग से समझ सकता है और जरूरत के मुताबिक सहायता ले सकता है।

दुमका में देर रात तक रील देखने की बढ़ती आदत पर चर्चा का व्यापक संदेश यही है कि स्मार्टफोन के फायदे तभी अधिक मिल सकते हैं, जब उसका इस्तेमाल संतुलित तरीके से किया जाए। मोबाइल आज की जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इससे पढ़ाई, रोजगार, संपर्क तथा मनोरंजन के अनेक अवसर मिलते हैं। लेकिन जब स्क्रीन पर बिताया गया समय नींद कम करने लगे, काम में ध्यान भटकने लगे या परिवार और दूसरी गतिविधियों के लिए समय न बचे, तो अपनी आदतों की समीक्षा करना जरूरी हो जाता है। सोने का समय तय करना, स्क्रीन टाइम देखना, अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद करना और रोजाना कुछ समय मोबाइल से दूर रहना ऐसे छोटे कदम हैं, जिनसे शुरुआत की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर परिवार और विशेषज्ञों की मदद लेना भी उचित है।

कुल मिलाकर, मोबाइल पर लगातार रील देखने की आदत को केवल मनोरंजन का मामला मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। देर रात तक स्क्रीन पर बने रहने से सोने का समय पीछे खिसक सकता है और पर्याप्त आराम न मिलने पर अगले दिन सुस्ती, चिड़चिड़ापन तथा ध्यान केंद्रित करने में परेशानी हो सकती है। हालांकि, हर व्यक्ति पर इसका असर एक जैसा नहीं होता और नींद या एकाग्रता की समस्याओं के अन्य कारण भी हो सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि लोग अपने स्क्रीन टाइम, सोने-जागने की दिनचर्या और रोजमर्रा के कामों पर पड़ने वाले असर को समझें। तकनीक का सही उपयोग जीवन को आसान बना सकता है, लेकिन उस पर नियंत्रण बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

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