इलेक्ट्रिक बसों की वायरलेस चार्जिंग का नया तरीका, टायरों से होगी बैटरी चार्ज

स्विट्जरलैंड की विंडक्शन ने टायर-बेस्ड वायरलेस चार्जिंग तकनीक बनाई है। बसें स्टॉप पर चार्ज हो सकेंगी और सिस्टम करीब 90% एफिशिएंसी दे सकता है।

स्विट्जरलैंड की विंडक्शन ने इलेक्ट्रिक बसों के लिए टायर-बेस्ड वायरलेस चार्जिंग तकनीक विकसित की है। इससे बसें स्टॉप पर यात्रियों के चढ़ने-उतरने के दौरान चार्ज हो सकेंगी और करीब 90% एफिशिएंसी हासिल कर सकती हैं।

Tech: इलेक्ट्रिक बसों की चार्जिंग को आसान बनाने के लिए स्विट्जरलैंड की कंपनी विंडक्शन ने एक नई तकनीक विकसित की है। इसमें बस के टायरों में चार्जिंग कॉइल लगाई जाती हैं, जो सड़क पर मौजूद चार्जिंग प्लेट से वायरलेस तरीके से ऊर्जा लेकर बैटरी तक पहुंचाती हैं। सिस्टम बस के स्टॉप पर रुकने के दौरान काम कर सकता है और इसका पैसेंजर ट्रायल 2028 में शुरू होने की संभावना है।

टायरों के जरिए कैसे होगी वायरलेस चार्जिंग?

इलेक्ट्रिक बसों की चार्जिंग के लिए अब तक बड़े चार्जिंग सिस्टम और भारी केबल का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया में काफी समय लग सकता है। इसी चुनौती को कम करने के लिए ETH ज्यूरिख के स्पिन-ऑफ विंडक्शन ने एक ऐसा सिस्टम तैयार किया है, जिसमें चार्जिंग कॉइल को बस के टायरों में लगाया गया है।

सामान्य वायरलेस चार्जिंग सिस्टम में सड़क की चार्जिंग प्लेट और वाहन के भीतर मौजूद कॉइल के बीच दूरी अधिक होती है। इससे ऊर्जा ट्रांसफर की क्षमता प्रभावित हो सकती है। विंडक्शन की तकनीक में कॉइल को टायर में फिट करने से यह दूरी काफी कम हो जाती है।

जब बस चार्जिंग प्लेट के ऊपर रुकती है, तो सड़क में लगी प्लेट ग्रिड से जुड़कर चुंबकीय क्षेत्र बनाती है। इसके बाद टायर के अंदर मौजूद कॉइल इस ऊर्जा को हासिल करके बस की बैटरी तक पहुंचाती हैं। इस तरह बिना किसी केबल को जोड़े चार्जिंग संभव होती है।

90% तक एफिशिएंसी और कम एनर्जी लॉस

इस सिस्टम की खासियत यह है कि चार्जिंग कॉइल और सड़क पर मौजूद प्लेट के बीच दूरी बहुत कम रहती है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इससे ऊर्जा का नुकसान 10% से कम रह सकता है और सिस्टम करीब 90% की एफिशिएंसी दे सकता है।

बस के स्टॉप पर यात्रियों के चढ़ने और उतरने के दौरान भी चार्जिंग सिस्टम सक्रिय किया जा सकता है। इसका मतलब है कि बस को केवल डिपो में लंबे समय तक खड़ा करके चार्ज करने पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। रास्ते में छोटे-छोटे चार्जिंग सेशन मिलते रहने पर बैटरी को लगातार ऊर्जा मिल सकती है।

इस तकनीक के लिए कंपनी को टायर डिजाइन में भी बदलाव करना पड़ा। सामान्य टायरों में मजबूती के लिए स्टील बेल्ट का इस्तेमाल किया जाता है, जो इस तरह की वायरलेस चार्जिंग तकनीक के लिए अनुकूल नहीं था। इसलिए विंडक्शन ने स्टील-मुक्त विशेष टायर तैयार किए, जिनमें चार्जिंग कॉइल का इस्तेमाल किया जा सके।

छोटी बैटरी से कम हो सकता है बस का वजन

रास्ते में बार-बार चार्जिंग उपलब्ध होने से बसों में बड़ी बैटरी लगाने की जरूरत कम हो सकती है। छोटी बैटरी के इस्तेमाल से बस का वजन घटाने के साथ उसकी खरीद लागत कम करने में भी मदद मिल सकती है। इसके अलावा बस के अंदर यात्रियों के लिए अतिरिक्त जगह उपलब्ध होने की संभावना है।

इस तकनीक का परीक्षण ज्यूरिख एयरपोर्ट और ज्यूरिख ओएर्लिकॉन के बीच 24 स्टॉप वाले रूट पर किया गया। टेस्ट के दौरान बस को पूरे रूट पर केवल दो बार चार्ज करने की जरूरत पड़ी।

दिनभर 16 घंटे चलने के दौरान बसें अलग-अलग हिस्सों में कुल तीन घंटे तक चार्ज हो सकती हैं। इससे डिपो में रात के समय करीब पांच घंटे तक लगातार चार्जिंग करने का दबाव कम किया जा सकता है। चार्जिंग को अलग-अलग समय पर बांटने से ग्रिड पर एक साथ पड़ने वाला लोड भी कम हो सकता है।

अगर आगे के परीक्षण सफल रहते हैं, तो इस तकनीक का पैसेंजर ट्रायल 2028 में शुरू हो सकता है। बड़े स्तर पर इस्तेमाल होने पर यह इलेक्ट्रिक बसों के चार्जिंग मॉडल और पब्लिक ट्रांसपोर्ट के संचालन में अहम बदलाव ला सकती है।

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