झारखंड के आंदोलनकारी नेता और JMM संस्थापक शिबू सोरेन की आज 82वीं जयंती है। उनके निधन के बाद यह पहली जयंती है। रांची से गांवों तक लोग दिशोम गुरु को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं।
Shibu Soren: झारखंड अलग राज्य आंदोलन के नायक, झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन की आज 82वीं जयंती है। यह जयंती झारखंड के लिए भावनात्मक रूप से बेहद खास है, क्योंकि 4 अगस्त 2025 को उनके निधन के बाद यह उनकी पहली जन्मतिथि है, जब पूरा राज्य उन्हें बिना शारीरिक उपस्थिति के याद कर रहा है। रांची से लेकर धनबाद, दुमका और दूर दराज के गांवों तक, शिबू सोरेन का नाम, उनका संघर्ष और उनका सपना आज भी लोगों की जुबान पर है।
पूरे राज्य में श्रद्धा और स्मरण के कार्यक्रम
राजधानी रांची में मुख्य कार्यक्रम आयोजित किया गया है, जहां मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपने पिता और झारखंड आंदोलन के महानायक को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। इसके अलावा झामुमो के वरिष्ठ नेता, कार्यकर्ता और समर्थक राज्य के सभी जिलों में स्मृति सभाएं आयोजित कर रहे हैं। पार्टी कार्यालयों, गांव टोला और आंदोलन की जमीन रहे इलाकों में लोग दिशोम गुरु के संघर्ष को याद कर रहे हैं।
धनबाद में भी विशेष कार्यक्रम रखे गए हैं, क्योंकि यही वह भूमि है जहां शिबू सोरेन की राजनीतिक पहचान मजबूत हुई। कार्यकर्ता उनके जीवन से जुड़े संघर्षों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।
नेमरा गांव से शुरू हुआ संघर्ष
शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को झारखंड के रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था। उनका परिवार साधारण था, लेकिन विचार असाधारण। उनके पिता सोबरन मांझी एक शिक्षक थे और आदिवासियों के अधिकारों के लिए खुलकर आवाज उठाते थे। उस दौर में महाजन कर्ज के नाम पर आदिवासियों की जमीन हड़प लिया करते थे।
सोबरन मांझी ने इस शोषण के खिलाफ आवाज उठाई, जिसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। जब उनके पिता की हत्या हुई, तब शिबू सोरेन केवल 13 वर्ष के थे। यही घटना उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बनी। अन्याय और शोषण के खिलाफ लड़ने का संकल्प उन्होंने उसी दिन ले लिया।
धनकटनी आंदोलन से बनी पहचान
पिता की हत्या के बाद शिबू सोरेन ने महाजनी व्यवस्था के खिलाफ धनकटनी आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन का उद्देश्य आदिवासियों को उनकी मेहनत की फसल वापस दिलाना था। आंदोलन के दौरान आदिवासी महाजनों के खेतों से अपनी फसल काटकर ले जाते थे।

यह आंदोलन सिर्फ विरोध नहीं था, बल्कि स्वाभिमान की लड़ाई थी। तीर धनुष से लैस आदिवासी युवाओं की भागीदारी ने इस आंदोलन को नई पहचान दी। एक घटना में जब पुलिस उन्हें पकड़ने गांव पहुंची, तो शिबू सोरेन ने खुद पुलिस को रास्ता दिखाया। गांव पहुंचते ही महिलाओं और ग्रामीणों ने पुलिस को घेर लिया। इस घटना के बाद वे आदिवासी समाज के निर्विवाद नेता बन गए। इसी दौर में उन्हें ‘दिशोम गुरु’ की उपाधि मिली, जिसका अर्थ है देश का गुरु।
झारखंड आंदोलन के मजबूत स्तंभ
झारखंड को अलग राज्य बनाने के आंदोलन में शिबू सोरेन की भूमिका केंद्रीय रही। उन्होंने बिनोद बिहारी महतो और कॉमरेड ए के राय जैसे नेताओं के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। यह संगठन जल्द ही झारखंडी अस्मिता और अधिकारों की सबसे मजबूत आवाज बन गया।
शिबू सोरेन ने सड़क से संसद तक संघर्ष किया। उन्होंने आदिवासी, मूलवासी और वंचित समाज को राजनीति की मुख्यधारा से जोड़ा। उनका मानना था कि जब तक झारखंड को अलग पहचान नहीं मिलेगी, तब तक यहां के लोगों को उनका हक नहीं मिल सकता।
संसद से लेकर केंद्र सरकार तक का सफर
शिबू सोरेन ने 1980 में दुमका लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसदीय राजनीति में कदम रखा। इसके बाद वे आठ बार दुमका का प्रतिनिधित्व करते रहे। संसद में उन्होंने झारखंड के मुद्दों को मजबूती से उठाया।
वे केंद्र की नरसिम्हा राव सरकार और मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री भी रहे। केंद्रीय मंत्री के रूप में उन्होंने आदिवासी कल्याण, श्रमिक अधिकार और क्षेत्रीय असमानताओं पर लगातार आवाज उठाई। सत्ता में रहते हुए भी वे खुद को जमीन से जुड़ा नेता मानते रहे।
मुख्यमंत्री बने, लेकिन अधूरा रहा सपना
शिबू सोरेन का राजनीतिक जीवन उपलब्धियों के साथ साथ विडंबनाओं से भी भरा रहा। 2005 में खंडित जनादेश के बाद वे झारखंड के मुख्यमंत्री बने, लेकिन विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर सके। इसके बाद 2008 और 2009 में भी वे मुख्यमंत्री बने, लेकिन कभी विधायकी के संकट तो कभी राजनीतिक परिस्थितियों के कारण उन्हें पद छोड़ना पड़ा।
यह झारखंड के इतिहास की एक बड़ी विडंबना मानी जाती है कि जिस नेता ने अलग राज्य की नींव रखी, वह कभी अपना पूरा कार्यकाल मुख्यमंत्री के रूप में पूरा नहीं कर सका। इसके बावजूद उनकी लोकप्रियता और जनसमर्थन में कभी कमी नहीं आई।











