Freebies Row: चुनाव से पहले मुफ्त योजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, राजनीतिक दलों से मांगा जवाब

चुनाव से पहले मुफ्त योजनाओं (फ्रीबीज़) के ऐलान पर Supreme Court of India ने कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने राजनीतिक दलों से जवाब तलब करते हुए कहा कि लोकलुभावन

सुप्रीम कोर्ट ने वीरवार को राज्य सरकारों द्वारा चुनाव से ठीक पहले ‘फ्रीबीज’ (मुफ्त सुविधाओं) की घोषणाओं की प्रवृत्ति पर मौखिक टिप्पणी करते हुए इस रुझान की आलोचना की।

नई दिल्ली: भारत में चुनावी मौसम के दौरान ‘फ्रीबीज’ यानी मुफ्त सुविधाओं और नकद लाभ की घोषणाओं को लेकर बहस तेज होती जा रही है। इसी बीच Supreme Court of India ने राज्य सरकारों द्वारा चुनाव से ठीक पहले मुफ्त योजनाएं घोषित करने की प्रवृत्ति पर सख्त मौखिक टिप्पणी की है। अदालत ने सवाल उठाया कि आखिर यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा और चुनाव आते ही नई योजनाओं की घोषणाएं क्यों की जाती हैं?

यह मामला 2022 में दायर एक याचिका से जुड़ा है, जिसमें चुनावी ‘फ्रीबीज’ पर रोक लगाने की मांग की गई थी। हालांकि अब तक इस पर अंतिम सुनवाई नहीं हो सकी है। हाल ही में मामले को फिर से उठाया गया, जिस पर अदालत ने संकेत दिया कि इस पर विस्तृत सुनवाई मार्च में की जाएगी।

अदालत की हालिया टिप्पणियां

19 फरवरी 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि किसी राज्य का राजस्व अधिशेष (सरप्लस) है, तो क्या उसका दायित्व नहीं बनता कि वह धनराशि का उपयोग बुनियादी ढांचे—जैसे सड़क, अस्पताल और स्कूल—के विकास पर करे? अदालत ने सभी राजनीतिक दलों और नेताओं से इस प्रवृत्ति पर पुनर्विचार करने की अपील की।

इससे पहले 12 फरवरी 2025 को भी शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की थी कि लगातार मुफ्त राशन और नकद सहायता मिलने से लोगों की काम करने की इच्छा पर असर पड़ सकता है। अदालत की इन टिप्पणियों ने चुनावी वादों और कल्याणकारी योजनाओं के बीच संतुलन पर नई बहस को जन्म दिया है।

Freebies Row: चुनाव से पहले मुफ्त योजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, राजनीतिक दलों से मांगा जवाब

2022 से जारी है बहस

3 अगस्त 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया था कि वह इस मुद्दे पर सुझाव देने के लिए एक विशेषज्ञ समिति (एक्सपर्ट बॉडी) गठित करने पर विचार कर रहा है। अदालत ने तब कहा था कि कोई भी राजनीतिक दल इस विषय पर खुलकर चर्चा नहीं करना चाहता, क्योंकि लगभग सभी दल चुनाव के दौरान मुफ्त उपहारों का वादा करते हैं।

11 अगस्त 2022 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि यह एक गंभीर विषय है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग मुफ्त योजनाओं का विरोध करते हैं, उन्हें भी अपनी बात रखने का अधिकार है, क्योंकि वे करदाता हैं। अदालत के अनुसार, इस विषय पर व्यापक और संतुलित बहस आवश्यक है।

‘फ्रीबीज’ बनाम कल्याणकारी योजनाएं

भारत जैसे विकासशील देश में सामाजिक सुरक्षा योजनाएं और कल्याणकारी कार्यक्रम सरकारों की नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। लेकिन चुनाव से ठीक पहले घोषित मुफ्त योजनाओं को लेकर यह सवाल उठता रहा है कि क्या वे वित्तीय अनुशासन और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता के अनुरूप हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर निवेश स्थायी विकास का आधार बन सकता है, जबकि अल्पकालिक मुफ्त घोषणाएं राजकोषीय दबाव बढ़ा सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां इसी व्यापक संदर्भ में देखी जा रही हैं।

इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी प्रक्रिया से जुड़े एक अन्य मामले में भी सख्त रुख अपनाया। अदालत ने राजनीतिक रणनीतिकार Prashant Kishor की पार्टी Jan Suraaj Party द्वारा दायर उस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को दोबारा कराने की मांग की गई थी।

6 फरवरी को मौखिक टिप्पणी में अदालत ने पूछा कि पार्टी को कितने वोट मिले। यदि जनता ने समर्थन नहीं दिया, तो क्या लोकप्रियता पाने के लिए न्यायिक मंच का सहारा लिया जा रहा है? अदालत की यह टिप्पणी भी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बनी रही।

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