गल्फ की राजनीति में बड़ा बदलाव, सऊदी-UAE रिश्तों में आई दरार

सऊदी अरब और यूएई के रिश्ते यमन युद्ध, नेतृत्व की होड़ और आर्थिक प्रतिस्पर्धा के कारण बिगड़ते जा रहे हैं। कभी करीबी सहयोगी रहे दोनों देश अब आमने-सामने हैं।

सऊदी अरब और यूएई के बीच रिश्तों में यमन युद्ध, सैन्य मतभेद और गल्फ नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा के कारण दरार गहरी हो गई है। कभी रणनीतिक साझेदार रहे दोनों देश अब राजनीतिक और आर्थिक टकराव की ओर बढ़ते दिख रहे हैं।

Saudi And UAE Relations: मिडिल ईस्ट की राजनीति में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE लंबे समय तक एक-दूसरे के सबसे भरोसेमंद सहयोगी रहे हैं। खाड़ी क्षेत्र में इन दोनों सुन्नी मुस्लिम देशों का दबदबा हमेशा से मजबूत माना जाता रहा है। तेल आधारित अर्थव्यवस्था, राजशाही व्यवस्था और ईरान के बढ़ते प्रभाव को लेकर साझा चिंता ने दोनों देशों को दशकों तक एक साथ बांधे रखा। लेकिन अब हालात पूरी तरह बदलते दिख रहे हैं। यमन के मसले पर सऊदी अरब और यूएई आमने-सामने खड़े नजर आ रहे हैं।

कभी अजीज थे एमबीएस और एमबीजेड

सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) और यूएई के शासक मोहम्मद बिन जायद (MBZ) को कभी मिडिल ईस्ट की राजनीति की सबसे मजबूत जोड़ी माना जाता था। दोनों नेताओं ने इस्लामी कट्टरवाद और ईरान के प्रभाव के खिलाफ मिलकर रणनीति बनाई। 2010 के दशक की शुरुआत में दोनों देशों की दोस्ती अपने चरम पर थी।

2011 के अरब स्प्रिंग के दौरान सऊदी अरब और यूएई ने इस्लामी आंदोलनों के खिलाफ साझा मोर्चा बनाया। बहरीन में विद्रोह को दबाने के लिए संयुक्त सेना भेजी गई। 2013 में मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड की सरकार को हटाने में भी दोनों देशों की भूमिका अहम रही। उस दौर में माना जाता था कि गल्फ की राजनीति सऊदी और यूएई की जोड़ी तय कर रही है।

यमन बना टकराव का सबसे बड़ा मैदान

दोनों देशों के रिश्तों में दरार यमन युद्ध के दौरान गहरी होती चली गई। शुरुआत में सऊदी अरब और यूएई यमन में एक ही गठबंधन का हिस्सा थे। दोनों का उद्देश्य हूती विद्रोहियों को कमजोर करना और यमन में अपनी पसंद की सरकार को मजबूत करना था।

लेकिन समय के साथ दोनों की प्राथमिकताएं अलग होती गईं। सऊदी अरब यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता रहा, जबकि यूएई ने दक्षिणी यमन में अलगाववादी गुटों को खुला समर्थन देना शुरू कर दिया। यही मतभेद धीरे-धीरे टकराव में बदल गया।

ताजा घटना ने बढ़ाई तनातनी

30 दिसंबर को हालात तब और बिगड़ गए जब सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन के दक्षिणी बंदरगाह शहर मुकल्ला पर हवाई हमला किया। सऊदी अरब का दावा था कि इस हमले में यूएई से जुड़ी हथियारों की खेप को निशाना बनाया गया। सऊदी सेना के अनुसार यह खेप यूएई समर्थित अलगाववादी गुटों को विदेशी सैन्य सहायता पहुंचाने के लिए इस्तेमाल की जा रही थी।

यूएई ने सऊदी अरब के इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया। यूएई का कहना था कि जिस खेप पर हमला किया गया, वह हथियार नहीं बल्कि उसकी सेना के लिए रसद और जरूरी सामान थी। इस हमले के बाद हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि यमन की सऊदी समर्थित सरकार ने यूएई की सेना को 24 घंटे के भीतर देश छोड़ने का अल्टीमेटम दे दिया।

इसके जवाब में यूएई ने भी यमन से अपनी सेना को वापस बुलाने का ऐलान कर दिया। यूएई के रक्षा मंत्रालय ने साफ कहा कि वह यमन में अपनी बची हुई सैन्य मौजूदगी भी खत्म करेगा।

दोस्ती से दुश्मनी तक का सफर

यूएई के गठन के बाद से ही सऊदी अरब उसका सबसे बड़ा समर्थक रहा है। दोनों देशों की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा नीतियों में गहरी समानता रही है। तेल पर निर्भर अर्थव्यवस्था और राजशाही व्यवस्था ने इन्हें स्वाभाविक सहयोगी बनाया।

ईरान को लेकर साझा चिंता ने भी दोनों को करीब रखा। गल्फ क्षेत्र में ईरान के प्रभाव को रोकने के लिए सऊदी और यूएई ने कई मौकों पर मिलकर रणनीति बनाई। लेकिन जैसे-जैसे दोनों देशों की वैश्विक महत्वाकांक्षाएं बढ़ीं, प्रतिस्पर्धा भी बढ़ती चली गई।

असली वजह क्या है

विशेषज्ञ मानते हैं कि सऊदी अरब और यूएई की दुश्मनी की जड़ सिर्फ यमन नहीं है। असल वजह है गल्फ क्षेत्र में नेतृत्व की होड़। दोनों देश अब तेल आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर खुद को global hub के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। यूएई ने यह प्रक्रिया काफी पहले शुरू कर दी थी। Vision 2021 के तहत दुबई को इंटरनेशनल बिजनेस और टूरिज्म का बड़ा केंद्र बनाया गया। दुबई आज ग्लोबल फाइनेंस, एविएशन और ट्रेड का बड़ा नाम है।

सऊदी अरब अब Vision 2030 के जरिए यूएई को सीधी चुनौती दे रहा है। नियोम सिटी, रियाद एयर और जेद्दाह पोर्ट जैसी मेगा परियोजनाएं सऊदी की नई पहचान गढ़ने की कोशिश हैं। यही वजह है कि दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा खुलकर सामने आ रही है।

आर्थिक फैसलों से भी बढ़ा तनाव

साल 2021 से सऊदी अरब ने यूएई के फ्री जोन से आने वाले कुछ इंपोर्ट पर प्रतिबंध लगाए। इसे भी दोनों देशों के रिश्तों में आई खटास की बड़ी वजह माना जाता है। सऊदी अरब चाहता है कि मल्टीनेशनल कंपनियां अपना रीजनल हेडक्वार्टर रियाद में बनाएं, जबकि यूएई लंबे समय से इस क्षेत्र का बिजनेस हब रहा है।

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