शिमला: हिमाचल प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र में 2035 सरकारी संस्थानों को डिनोटिफाई किए जाने का मुद्दा गरमा गया है। इस मामले को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने सरकार पर संस्थानों को बंद करने और रोजगार के अवसर कम करने का आरोप लगाया, जबकि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने सरकार के फैसले का बचाव करते हुए पूर्व भाजपा सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।
विधानसभा में यह मुद्दा ऐसे समय उठा है जब हिमाचल सरकार के सामने वित्तीय स्थिति सुधारने और सरकारी संस्थानों को लेकर लिए गए पुराने फैसलों की समीक्षा करने की चुनौती है। सरकार की ओर से कई ऐसे संस्थानों को डिनोटिफाई किया गया है, जिन्हें पिछली सरकार के कार्यकाल में खोला या अपग्रेड किया गया था। विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आने के बाद कई संस्थान बंद कर दिए, जिससे कर्मचारियों और स्थानीय लोगों में नाराजगी पैदा हुई।
जयराम ठाकुर ने विधानसभा में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि संस्थानों को बंद करने से प्रदेश के युवाओं और आम लोगों को नुकसान हुआ है। भाजपा का तर्क है कि पिछली सरकार के दौरान खोले गए संस्थानों से लोगों को उनके घर के नजदीक सरकारी सेवाएं मिल रही थीं। कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद इन संस्थानों को डिनोटिफाई करने से कई क्षेत्रों में लोगों को पहले की सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं।
वहीं मुख्यमंत्री सुक्खू ने विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए सरकार के फैसलों को उचित बताया। उनका कहना है कि केवल राजनीतिक लाभ के लिए बिना पर्याप्त बजट और स्टाफ के संस्थान खोलने से सरकारी व्यवस्था पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। सरकार का फोकस ऐसे संस्थानों को संचालित करने पर है, जहां आवश्यक संसाधन और कर्मचारियों की व्यवस्था हो सके।
2035 संस्थानों का डिनोटिफिकेशन विधानसभा में सबसे ज्यादा चर्चा वाले मुद्दों में शामिल रहा। इस संख्या को लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश की, जबकि सरकार ने पूर्व सरकार के कार्यकाल में संस्थानों को खोलने के फैसलों पर सवाल उठाए। दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप के कारण सदन का माहौल भी गरम रहा।
इस विवाद का सीधा संबंध प्रदेश में रोजगार के मुद्दे से भी जुड़ गया है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस ने सत्ता में आने से पहले युवाओं को रोजगार देने के बड़े वादे किए थे, लेकिन सरकार बनने के बाद सरकारी संस्थानों को बंद करने और पदों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं की गई। इससे बेरोजगार युवाओं में निराशा बढ़ी है।
दूसरी ओर सरकार का कहना है कि पिछली सरकार ने बड़ी संख्या में संस्थान तो खोल दिए, लेकिन उनके लिए पर्याप्त बजट, भवन और कर्मचारियों की व्यवस्था नहीं की गई। ऐसे संस्थानों को चलाने के लिए हर साल सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। सुक्खू सरकार का तर्क है कि वित्तीय संसाधनों का इस्तेमाल प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में किया जाना चाहिए।
हिमाचल विधानसभा का मानसून सत्र 21 अगस्त से 3 सितंबर 2026 तक चल रहा है। सत्र के दौरान सरकार और विपक्ष के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस हो रही है।
संस्थानों की तालाबंदी का मुद्दा राजनीतिक रूप से भी बेहद संवेदनशील है। पहाड़ी राज्य में किसी स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, कार्यालय या अन्य सरकारी संस्थान का खुलना स्थानीय लोगों के लिए बड़ी सुविधा माना जाता है। कई बार ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को छोटी-सी सरकारी सेवा के लिए भी लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। ऐसे में किसी संस्थान को बंद किए जाने का स्थानीय स्तर पर सीधा असर दिखाई देता है।
विपक्ष इसी मुद्दे को लेकर सरकार पर हमला कर रहा है। जयराम ठाकुर का कहना है कि सरकार को संस्थान बंद करने के बजाय उनकी कमियों को दूर करना चाहिए। वहीं सरकार का कहना है कि जिन संस्थानों में पर्याप्त काम या संसाधन नहीं हैं, उन्हें केवल राजनीतिक कारणों से चलाते रहना राज्य के हित में नहीं है।
यह विवाद केवल पुराने और नए संस्थानों तक सीमित नहीं है। इसके साथ यह सवाल भी जुड़ा हुआ है कि हिमाचल जैसे सीमित संसाधनों वाले राज्य में सरकारी संस्थानों का विस्तार किस तरह किया जाए। एक तरफ दूरदराज के क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशासनिक सुविधाओं की जरूरत है, तो दूसरी तरफ राज्य के वित्तीय संसाधनों पर भी दबाव है।
सुक्खू सरकार और भाजपा के बीच यह टकराव पहले भी कई मुद्दों पर सामने आता रहा है। फरवरी 2026 के बजट सत्र के दौरान भी सुक्खू और जयराम ठाकुर के बीच राजस्व घाटा अनुदान और राज्य की वित्तीय स्थिति को लेकर तीखी राजनीतिक बहस हुई थी।
विधानसभा में इस बार संस्थानों के डिनोटिफिकेशन के साथ बेरोजगारी का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा है। विपक्ष सरकार से रोजगार के आंकड़ों और युवाओं के लिए किए गए वादों पर जवाब मांग रहा है। सरकार की ओर से भी रोजगार और वित्तीय प्रबंधन को लेकर अपना पक्ष रखा जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों के लिए भी यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हिमाचल में सरकारी नौकरी और सरकारी संस्थान दोनों ही चुनावी राजनीति के प्रमुख विषय रहे हैं। प्रदेश में बड़ी संख्या में परिवार सरकारी सेवाओं और संस्थानों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। ऐसे में संस्थान खोलने या बंद करने का फैसला स्थानीय राजनीति को प्रभावित करता है।
फिलहाल विधानसभा में सरकार और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर टकराव जारी है। जयराम ठाकुर जहां संस्थानों को डिनोटिफाई करने के फैसले को लेकर सरकार को घेर रहे हैं, वहीं मुख्यमंत्री सुक्खू इसे वित्तीय अनुशासन और पिछली सरकार के फैसलों की समीक्षा से जोड़कर देख रहे हैं। आने वाले दिनों में विधानसभा की कार्यवाही के दौरान इस मुद्दे पर और चर्चा तथा राजनीतिक बयानबाजी होने की संभावना है।







