बांग्लादेश में हिंदू महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों की खबरों ने चिंता बढ़ा दी है। इस बीच Mehbooba Mufti के बयान ने भारत के हिजाब विवाद से तुलना कर मामले को और विवादास्पद बना दिया है।
Jammu-Kashmir: बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय खासकर महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार की खबरों ने पूरे क्षेत्र में चिंता बढ़ा दी है। हाल के दिनों में ऐसी रिपोर्ट सामने आई हैं जिनमें कहा गया है कि हिंदू महिलाएं अपनी धार्मिक पहचान के प्रतीक जैसे सिंदूर लगाने से भी डर रही हैं। इन घटनाओं ने मानवाधिकार, महिला सुरक्षा और अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसी संवेदनशील मुद्दे पर जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी अध्यक्ष Mehbooba Mufti का बयान सामने आया, जिसने एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
Mehbooba Mufti का बयान क्यों बना विवाद का कारण
Mehbooba Mufti ने बांग्लादेश में हिंदू महिलाओं के साथ हो रहे उत्पीड़न पर चिंता जताते हुए एक बयान दिया, लेकिन इसी के साथ उन्होंने भारत के भीतर हिजाब विवाद को जोड़ दिया। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश से आ रही खबरें बेहद परेशान करने वाली हैं, जहां हिंदू महिलाएं सिंदूर लगाकर बाहर निकलने से डर रही हैं। इसके बाद उन्होंने यह भी कहा कि भारत का नेतृत्व नैतिक दुविधा में है क्योंकि यहां कुछ अराजक तत्व मुस्लिम महिलाओं का हिजाब जबरदस्ती उतारते देखे जा रहे हैं। यही तुलना उनके बयान को आपत्तिजनक और विवादास्पद बना रही है।
भारत की स्थिति
![]()
भारत में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा केवल एक राजनीतिक नारा नहीं बल्कि संविधान द्वारा सुनिश्चित अधिकार है। यहां कानून का शासन है, स्वतंत्र न्यायपालिका है और किसी भी समुदाय के खिलाफ अपराध होने पर कानूनी प्रक्रिया मौजूद है। एफआईआर से लेकर अदालत तक का स्पष्ट सिस्टम है। हिजाब जैसे मुद्दों पर भी बहस और फैसले संवैधानिक दायरे में होते हैं, न कि भीड़ या कट्टरपंथी दबाव के तहत। ऐसे में भारत को “नैतिक दुविधा” में बताना, देश की संस्थाओं और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा सवाल खड़ा करता है।
बांग्लादेश की जमीनी हकीकत
इसके उलट बांग्लादेश की स्थिति काफी अलग है। वहां अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय लंबे समय से हिंसा, सामाजिक बहिष्कार और डर के माहौल में जी रहा है। मंदिरों पर हमले, घरों की तोड़फोड़, महिलाओं को उनकी पहचान के आधार पर निशाना बनाना और भीड़ की हिंसा, ये घटनाएं बार बार सामने आई हैं। कई मामलों में सरकार की भूमिका और कार्रवाई की इच्छा पर भी सवाल उठे हैं। अंतरिम शासन के दौरान कट्टरपंथी तत्वों का प्रभाव बढ़ा है, जिससे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और कमजोर होती दिख रही है।











