उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसमें उच्च शिक्षा, सरकारी क्षेत्र में लंबा अनुभव और खेती के प्रति रुचि एक साथ दिखाई देती है। आईआईटी रुड़की से एमटेक की पढ़ाई करने वाले संजीव कुमार यादव ने जलविद्युत क्षेत्र में लंबे समय तक जिम्मेदारी निभाने के बाद खेती की राह चुनी है। एनएचपीसी यानी नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन में निदेशक स्तर पर काम कर चुके संजीव अब अपने गांव ककरहिया में ड्रैगन फ्रूट की व्यावसायिक खेती कर रहे हैं। उनकी इस पहल में पत्नी शिखा यादव भी साथ दे रही हैं। उनका प्रयास केवल अपने खेत में नई फसल उगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे आसपास के किसानों को भी इस खेती के बारे में जानकारी और मार्गदर्शन देना चाहते हैं।
संजीव कुमार यादव का उदाहरण ऐसे समय में सामने आया है, जब खेती को लेकर युवाओं के बीच कई तरह की धारणाएं मौजूद हैं। बड़ी डिग्री हासिल करने के बाद आमतौर पर युवा निजी कंपनियों, सरकारी सेवाओं या दूसरे पेशेवर क्षेत्रों में करियर बनाने की कोशिश करते हैं। वहीं, खेती को कई बार कम आय और अधिक मेहनत वाला काम मान लिया जाता है। संजीव की यात्रा इस बात को सामने रखती है कि कृषि क्षेत्र में भी नए प्रयोग, वैज्ञानिक जानकारी और व्यवस्थित प्रबंधन के जरिए काम करने के अवसर तलाशे जा सकते हैं। हालांकि, किसी भी फसल से होने वाली कमाई जमीन, लागत, उत्पादन, बाजार भाव और बिक्री की व्यवस्था पर निर्भर करती है।
संजीव कुमार यादव मूल रूप से कानपुर जिले के पतारा ब्लॉक के ककरहिया गांव के निवासी हैं। उन्होंने आईआईटी रुड़की से एमटेक की पढ़ाई की और इसके बाद जलविद्युत परियोजनाओं तथा ऊर्जा क्षेत्र में काम किया। एनएचपीसी में उन्होंने वरिष्ठ पदों पर जिम्मेदारी संभाली। अपने पेशेवर जीवन के दौरान उन्हें बड़े स्तर की परियोजनाओं के प्रबंधन और संचालन से जुड़ा अनुभव मिला। रिपोर्टों के मुताबिक, वह फरवरी 2026 में सेवा से सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद उन्होंने अपने गांव में खेती से जुड़ा काम शुरू करने की दिशा में कदम बढ़ाया।
संजीव के लिए खेती का चुनाव केवल गांव लौटने का फैसला नहीं था, बल्कि एक नई कार्ययोजना की शुरुआत भी थी। लंबे समय तक ऊर्जा क्षेत्र में काम करने के बाद उन्होंने कृषि में ऐसा विकल्प तलाशा, जिसमें पारंपरिक खेती से अलग फसल का प्रयोग किया जा सके। इसी क्रम में उन्होंने ड्रैगन फ्रूट की खेती पर ध्यान दिया। यह फल अपने अलग आकार, रंग और बाजार में मिलने वाली कीमत के कारण लोगों के बीच जाना जाता है। भारत में कई क्षेत्रों के किसान इसे व्यावसायिक फसल के रूप में अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इसकी खेती शुरू करने से पहले स्थानीय जलवायु, मिट्टी, पानी की उपलब्धता, पौधों की गुणवत्ता और बाजार तक पहुंच का आकलन करना जरूरी होता है।
संजीव यादव ने कानपुर के ककरहिया गांव में लगभग तीन बीघा जमीन पर ड्रैगन फ्रूट का बाग लगाया। प्रकाशित जानकारी के अनुसार, उन्होंने जुलाई में इसकी पौध लगाकर खेती की शुरुआत की। उनकी योजना इस फसल को व्यवस्थित तरीके से विकसित करने और आगे इसके अनुभव को दूसरे किसानों तक पहुंचाने की है। ड्रैगन फ्रूट के पौधों को सहारा देने के लिए आम तौर पर मजबूत खंभों और संरचना की जरूरत होती है, क्योंकि पौधा कैक्टस परिवार से संबंधित होने के बावजूद फैलाव के लिए सहारे पर निर्भर रहता है। इसके साथ सिंचाई, पौधों की देखभाल, पोषण और समय पर रोग नियंत्रण का भी ध्यान रखना पड़ता है।
ड्रैगन फ्रूट की खेती में शुरुआती तैयारी महत्वपूर्ण होती है। खेत का चयन करने से लेकर पौधों के बीच उचित दूरी, सहारा देने वाली संरचना और सिंचाई व्यवस्था तक कई बातों का ध्यान रखना पड़ता है। शुरुआत में खंभे, पौधे और अन्य जरूरी सामग्री पर खर्च हो सकता है। इसलिए किसी किसान के लिए इस फसल को अपनाने से पहले कुल निवेश और संभावित बाजार की जानकारी जुटाना आवश्यक है। संजीव जैसे शिक्षित और पेशेवर अनुभव रखने वाले लोगों का खेती में आना इस बात की संभावना दिखाता है कि कृषि क्षेत्र में प्रबंधन और तकनीकी सोच का इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि, उनकी खेती की वास्तविक लागत और मुनाफे के विस्तृत आंकड़े सार्वजनिक रिपोर्टों में स्पष्ट नहीं हैं।
संजीव की इस पहल में उनकी पत्नी शिखा यादव भी सहयोग कर रही हैं। पति-पत्नी मिलकर गांव में खेती से जुड़े काम को आगे बढ़ा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित काम शुरू करने के लिए परिवार का सहयोग, स्थानीय संसाधनों की समझ और बाजार से संपर्क अहम हो सकते हैं। किसी नई फसल की खेती में शुरुआती चरण के दौरान पौधों की देखभाल और उत्पादन संबंधी अनुभव हासिल करना पड़ता है। इस तरह खेती को केवल जमीन पर फसल उगाने का काम नहीं, बल्कि योजना, समय और संसाधनों के बेहतर उपयोग से जुड़ी गतिविधि के रूप में भी देखा जा सकता है।
संजीव कुमार यादव का एक प्रमुख उद्देश्य आसपास के किसानों को ड्रैगन फ्रूट की खेती के बारे में जानकारी देना है। वह इच्छुक किसानों को मार्गदर्शन देकर उनकी आमदनी बढ़ाने की संभावनाओं पर काम करना चाहते हैं। किसी नई फसल को अपनाने से पहले किसानों को यह समझना जरूरी होता है कि पौधे लगाने से लेकर फल की बिक्री तक कितने चरण आते हैं। उन्हें पौधों की उपलब्धता, खेती की तकनीक, उत्पादन शुरू होने में लगने वाला समय और बाजार की मांग के बारे में जानकारी चाहिए होती है। अनुभवी व्यक्ति का मार्गदर्शन इन पहलुओं को समझने में मदद कर सकता है, लेकिन खेती शुरू करने से पहले कृषि विशेषज्ञों और स्थानीय उद्यान विभाग से भी सलाह लेना उपयोगी रहता है।
ड्रैगन फ्रूट को कई जगह उच्च मूल्य वाली बागवानी फसल के रूप में देखा जाता है। इसके बावजूद इसकी खेती को बिना जोखिम वाला या हर किसान के लिए निश्चित रूप से लाभकारी विकल्प नहीं माना जा सकता। शुरुआती निवेश, फसल की गुणवत्ता, मौसम, पौधों की सेहत और बिक्री के समय मिलने वाले भाव से किसान की आमदनी प्रभावित होती है। यदि बाजार तक पहुंच कमजोर हो या उत्पादन के समय कीमत कम मिल जाए, तो लाभ घट सकता है। इसलिए संजीव की कहानी से प्रेरणा लेने वाले किसानों के लिए जरूरी होगा कि वे अपने क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार योजना बनाएं और उपलब्ध संसाधनों का आकलन करके ही निवेश करें।
कानपुर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में कृषि के विविधीकरण की संभावनाओं पर भी इस तरह के प्रयासों से चर्चा होती है। पारंपरिक फसलों के साथ बागवानी, फल उत्पादन और अन्य वैकल्पिक फसलों पर विचार करने से किसानों को अपनी जमीन के इस्तेमाल के अलग-अलग विकल्प मिल सकते हैं। लेकिन हर फसल हर जमीन और हर मौसम के लिए उपयुक्त नहीं होती। किसी भी नई फसल को अपनाने से पहले मिट्टी की जांच, सिंचाई की सुविधा, पौधों की उपलब्धता और खरीदारों की जानकारी जुटाना आवश्यक है। इसके साथ उत्पादन और बिक्री का रिकॉर्ड रखने से किसान अपने खर्च और आय का वास्तविक आकलन कर सकते हैं।
संजीव यादव की पेशेवर पृष्ठभूमि इस कहानी को एक अलग पहचान देती है। उन्होंने ऊर्जा क्षेत्र में उच्च जिम्मेदारी निभाने के बाद अपने गांव में कृषि से जुड़ने का फैसला किया। उनके पास परियोजना प्रबंधन का अनुभव है, जबकि खेती के क्षेत्र में उन्हें स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सीखने और काम करने की जरूरत होगी। कृषि में सफलता केवल शिक्षा या पद के आधार पर तय नहीं होती; इसके लिए फसल की जरूरतों को समझना, मौसम के अनुसार काम करना, बाजार से जुड़ना और लगातार निगरानी करना भी जरूरी है। इस दृष्टि से उनका प्रयास एक नई शुरुआत है, जिसके परिणाम समय के साथ उत्पादन और बाजार के अनुभव से स्पष्ट होंगे।
गांव में रहकर खेती करने का फैसला ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी एक महत्वपूर्ण पहलू सामने रखता है। जब कोई व्यक्ति अपने गांव में कृषि या उससे जुड़े व्यवसाय की शुरुआत करता है, तो स्थानीय स्तर पर जानकारी का आदान-प्रदान बढ़ सकता है। यदि ऐसी पहल के साथ प्रशिक्षण, पौधों की उपलब्धता, कृषि सलाह और बिक्री की व्यवस्था जुड़ती है, तो अन्य किसान भी नई फसलों के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं। संजीव यादव का किसानों को मार्गदर्शन देने का प्रयास इसी दिशा में है। हालांकि, इससे कितने किसानों को लाभ मिला है या कितनी अतिरिक्त आमदनी हुई है, इसके आंकड़े अभी स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं हैं।
संजीव और शिखा यादव की कहानी उन लोगों के लिए भी दिलचस्प है, जो अपने पैतृक गांव से जुड़े रहकर नया काम शुरू करना चाहते हैं। यह उदाहरण दिखाता है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी व्यक्ति अपने अनुभव और रुचि के अनुसार नई गतिविधि शुरू कर सकता है। खेती में उतरने का अर्थ केवल पारंपरिक तरीकों को अपनाना नहीं है; नई फसलों, बेहतर योजना और वैज्ञानिक सलाह के जरिए भी काम किया जा सकता है। साथ ही, खेती में निवेश करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए जोखिम, लागत और बाजार की वास्तविकताओं को समझना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना नई फसल चुनना।
कानपुर के ककरहिया गांव में ड्रैगन फ्रूट का बाग लगाकर संजीव कुमार यादव ने अपने लिए एक नया रास्ता चुना है। आईआईटी रुड़की से उच्च शिक्षा, एनएचपीसी में लंबा पेशेवर अनुभव और उसके बाद खेती की ओर रुख करना उनकी यात्रा के प्रमुख पड़ाव हैं। अब वह अपनी पत्नी के साथ इस फसल को विकसित करने और दूसरे किसानों तक जानकारी पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी पहल का आगे कितना व्यावसायिक विस्तार होता है, यह उत्पादन, लागत और बाजार में मिलने वाले परिणामों से तय होगा। फिलहाल उनकी कहानी गांव में रहकर कृषि के नए विकल्प तलाशने और खेती को व्यवस्थित व्यवसाय के रूप में समझने के प्रयास की मिसाल है।










