विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और एशियाई विकास बैंक (ADB) समेत कई प्रमुख संस्थानों ने हाल ही में भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमान में बढ़ोतरी की है। इन संस्थानों ने इस साल और अगले साल भारत की विकास दर 7 प्रतिशत से अधिक रहने का अनुमान जताया है।
बिजनेस न्यूज़: भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर वैश्विक स्तर पर सकारात्मक अनुमान सामने आ रहे हैं। दक्षिण कोरिया के कोरिया इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक पॉलिसी (KIEP) में दक्षिण एशिया मामलों के प्रमुख क्यूंगहून किम का मानना है कि भारत आने वाले वर्षों में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। उनके अनुमान के मुताबिक, यह लक्ष्य 2030 के आसपास हासिल किया जा सकता है। उन्होंने भारत की आर्थिक विकास दर, महामारी के बाद हुई तेज रिकवरी और लगातार मजबूत प्रदर्शन को इसकी प्रमुख वजहों में शामिल किया है।
किम के अनुसार, भारत ने पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक मोर्चे पर उल्लेखनीय मजबूती दिखाई है। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि देश के सामने कई चुनौतियां मौजूद हैं। ऐसे में तेज विकास दर को लंबे समय तक बनाए रखना भारत के लिए महत्वपूर्ण होगा।
महामारी के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत वापसी
कोविड-19 महामारी के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा था। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, उस दौर में अर्थव्यवस्था में 5.8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। इसके बाद 2021 में भारत ने करीब 9.7 प्रतिशत की वृद्धि के साथ जोरदार वापसी की। क्यूंगहून किम ने भारत की इस रिकवरी को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इसके बाद भी अर्थव्यवस्था ने मजबूत रफ्तार बनाए रखी। उनके मुताबिक, महामारी के बाद के वर्षों में भारत की विकास दर लगातार ऊंचे स्तर पर बनी रही, जिससे देश की आर्थिक संभावनाओं को लेकर भरोसा बढ़ा है।
उन्होंने यह भी कहा कि नए सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के आंकड़े आने के बाद कई अर्थशास्त्रियों ने अपने विकास अनुमानों में संशोधन किया है। वह खुद भी उन विशेषज्ञों में शामिल हैं, जिन्होंने भारत की आर्थिक संभावनाओं को पहले की तुलना में बेहतर आंका है।
लगातार तेज विकास दर ने खींचा दुनिया का ध्यान
भारत की अर्थव्यवस्था की चर्चा की एक प्रमुख वजह इसकी निरंतर विकास गति है। किम के अनुसार, 2021 से 2025 के दौरान भारत की औसत वार्षिक आर्थिक वृद्धि दर लगभग 7.83 प्रतिशत रही। यह प्रदर्शन पिछले कई दशकों के मजबूत विकास दौरों में शामिल है। उन्होंने इसकी तुलना 2003 से 2007 के बीच के समय से की, जब भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होकर वैश्विक निवेशकों और नीति निर्माताओं का ध्यान आकर्षित कर रहा था। उस अवधि में भारत की औसत विकास दर करीब 7.89 प्रतिशत बताई गई है।
हालांकि, आर्थिक वृद्धि की तुलना करते समय इस्तेमाल किए गए आंकड़ों, वित्तीय वर्षों और गणना की पद्धति को ध्यान में रखना जरूरी है। इसके बावजूद, भारत की तेज विकास गति को वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसकी बढ़ती भूमिका के एक महत्वपूर्ण संकेतक के रूप में देखा जा रहा है।
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एक ट्रिलियन डॉलर से चार ट्रिलियन डॉलर तक पहुंची अर्थव्यवस्था
भारत की आर्थिक स्थिति में पिछले दो दशकों के दौरान बड़ा बदलाव आया है। क्यूंगहून किम के अनुसार, 2007 के आसपास भारत की GDP एक ट्रिलियन डॉलर से कुछ अधिक थी, जबकि अब इसका आकार लगभग चार ट्रिलियन डॉलर के स्तर पर पहुंच चुका है। इस बदलाव का अर्थ है कि भारत की अर्थव्यवस्था का आधार पहले के मुकाबले काफी बड़ा हो गया है। ऐसे में सात प्रतिशत की विकास दर भी अब पहले की तुलना में अधिक आर्थिक गतिविधियों और उत्पादन में बढ़ोतरी को दर्शाती है।
बड़ी अर्थव्यवस्था होने के साथ भारत के सामने रोजगार सृजन, बुनियादी ढांचे का विस्तार, उत्पादकता में सुधार और आय में असमानता जैसी चुनौतियां भी हैं। इसलिए आर्थिक विकास के आंकड़ों के साथ यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि वृद्धि का लाभ आम लोगों तक किस हद तक पहुंचता है।
IMF और अन्य संस्थानों के अनुमानों पर नजर
भारत की आर्थिक संभावनाओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के अनुमान भी अहम भूमिका निभाते हैं। स्रोत में विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और एशियाई विकास बैंक (ADB) के विकास अनुमानों में बढ़ोतरी का उल्लेख किया गया है। हालांकि, इन संस्थानों के पूर्वानुमान अलग-अलग समय पर जारी होते हैं और वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार बदल सकते हैं। तेल की कीमतें, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, भू-राजनीतिक तनाव, महंगाई और निवेश की स्थिति भारत की विकास दर को प्रभावित कर सकती हैं।









