ईरान का ऐलान-एक ग्राम एनरिच्ड यूरेनियम भी देश से बाहर नहीं जाएगा, अमेरिका से बातचीत पर रखीं शर्तें

ईरान ने संवर्धित यूरेनियम विदेश भेजने से इनकार किया है। तेहरान ने अमेरिका से बातचीत के लिए प्रतिबंध हटाने, नाकेबंदी खत्म करने और लड़ाई रोकने की शर्तें रखीं।

ईरान ने कहा है कि वह एक ग्राम भी संवर्धित यूरेनियम विदेश नहीं भेजेगा। तेहरान ने अमेरिका से बातचीत के लिए प्रतिबंध हटाने, बंदरगाहों की नाकेबंदी खत्म करने और क्षेत्रीय संघर्ष रोकने जैसी शर्तें रखी हैं।

तेहरान: ईरान ने अमेरिका के साथ परमाणु कार्यक्रम को लेकर जारी तनाव के बीच स्पष्ट किया है कि वह अपना एक ग्राम भी संवर्धित यूरेनियम (एनरिच्ड यूरेनियम) किसी दूसरे देश नहीं भेजेगा। ईरानी अधिकारियों ने कहा है कि जब तक अमेरिका भरोसा बहाल करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाता और तेहरान की शर्तें पूरी नहीं करता, तब तक दोनों देशों के बीच बातचीत आगे बढ़ना मुश्किल है। ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसिन रजाई ने मंगलवार को यह रुख दोहराया। वहीं, ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने कहा कि अमेरिका को ईरान का भरोसा जीतने के लिए उसकी सात शर्तें पूरी करनी होंगी। इन शर्तों का संबंध पिछले महीने होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने के लिए रखी गई मांगों से बताया गया है।

ईरान की प्रमुख मांगों में उसके बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकेबंदी खत्म करना, तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंध हटाना और क्षेत्र के विभिन्न मोर्चों पर लड़ाई रोकना शामिल है। इस रुख से संकेत मिलता है कि परमाणु कार्यक्रम पर किसी समझौते की राह केवल यूरेनियम संवर्धन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आर्थिक प्रतिबंध, समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय संघर्ष भी जुड़े हुए हैं।

संवर्धित यूरेनियम बाहर भेजने से ईरान का इनकार

ईरान के नेताओं ने कहा है कि देश के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी संवेदनशील सामग्री को विदेश भेजना स्वीकार्य नहीं होगा। ईरान के सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई भी पहले कह चुके हैं कि हथियार बनाने के लिए आवश्यक स्तर के करीब पहुंच चुके संवर्धित यूरेनियम को देश से बाहर नहीं भेजा जाना चाहिए।

संवर्धित यूरेनियम ऐसा यूरेनियम होता है, जिसमें यूरेनियम-235 नामक समस्थानिक का अनुपात बढ़ाया जाता है। इस प्रक्रिया का इस्तेमाल परमाणु ऊर्जा के लिए ईंधन तैयार करने में किया जा सकता है। हालांकि, संवर्धन का स्तर और सामग्री की मात्रा अधिक होने पर यह परमाणु प्रसार से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय चिंताओं का विषय बन जाता है।

ईरान का यूरेनियम विदेश भेजने से इनकार करना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि संवर्धित यूरेनियम का भंडार और संवर्धन की क्षमता किसी भी परमाणु समझौते के अहम हिस्से होते हैं। संभावित समझौते में सामग्री के भंडारण, संवर्धन की सीमा, अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण और सत्यापन की व्यवस्था पर सहमति बनाना आवश्यक हो सकता है।

परमाणु कार्यक्रम पर अमेरिका और ईरान के बीच मतभेद

ईरान का परमाणु कार्यक्रम अमेरिका के साथ किसी समझौते की राह में प्रमुख विवादों में से एक बना हुआ है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इसी महीने की शुरुआत में कहा था कि ईरान को अपनी यूरेनियम संवर्धन क्षमता में ठोस कमी करनी होगी। उनके मुताबिक, अमेरिकी मांगों को पूरा करने और दोनों देशों के बीच जारी युद्ध को समाप्त करने के लिए यह कदम जरूरी है।

अमेरिका, इजराइल और कई पश्चिमी देश लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंता जताते रहे हैं। उनकी आशंका है कि उच्च स्तर तक यूरेनियम संवर्धन करने की क्षमता भविष्य में परमाणु हथियार बनाने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है।

ईरान इन आरोपों को खारिज करता रहा है। उसका कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और उसे परमाणु तकनीक के इस्तेमाल का अधिकार है। इस तरह दोनों पक्षों के बीच विवाद केवल तकनीकी क्षमता का नहीं, बल्कि ईरान के इरादों, अंतरराष्ट्रीय निगरानी और सुरक्षा गारंटी का भी है।

60 प्रतिशत संवर्धन और परमाणु हथियारों को लेकर चिंता

ईरान के यूरेनियम को 60 प्रतिशत तक संवर्धित करने की खबरें पश्चिमी देशों की चिंताओं का एक प्रमुख कारण रही हैं। आम नागरिक परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन के लिए सामान्यतः इससे कम संवर्धन स्तर पर्याप्त हो सकता है, जबकि परमाणु हथियारों में इस्तेमाल होने वाले यूरेनियम को आम तौर पर लगभग 90 प्रतिशत तक संवर्धित किया जाता है।

हालांकि, केवल संवर्धन का प्रतिशत यह साबित नहीं करता कि कोई देश परमाणु हथियार बना रहा है। इसके लिए परमाणु सामग्री की मात्रा, उसके इस्तेमाल, तकनीकी गतिविधियों और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण से जुड़े साक्ष्यों का आकलन करना होता है। ईरान का कहना है कि वह परमाणु हथियार बनाने की कोशिश नहीं कर रहा है।

अमेरिका की मांग है कि ईरान की परमाणु गतिविधियों पर ऐसी सीमाएं हों, जिनसे परमाणु हथियार विकसित करने की आशंका कम हो। इसके विपरीत, ईरान आर्थिक प्रतिबंधों और सैन्य दबाव को खत्म करने के साथ अपने परमाणु अधिकारों की मान्यता चाहता है। इन परस्पर विरोधी मांगों ने वार्ता को जटिल बना दिया है।

ट्रम्प ने दोहराया-ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने देंगे

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 15 अक्टूबर को न्यूजमैक्स को दिए इंटरव्यू में कहा था कि अमेरिका ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रम्प ने कहा कि वाशिंगटन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि ईरान के पास कभी परमाणु हथियार न हों।

ट्रम्प ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े एक पहाड़ के नीचे स्थित ठिकाने को निशाना बनाने की संभावना का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस ठिकाने पर हमला करने की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि, ट्रम्प ने यह भी कहा कि ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका परमाणु बम का इस्तेमाल नहीं करेगा।

इन बयानों से स्पष्ट है कि अमेरिकी प्रशासन परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने को अपनी प्रमुख सुरक्षा प्राथमिकताओं में रखता है। दूसरी ओर, ईरान का कहना है कि वह दबाव में आकर अपनी प्रमुख मांगों और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े रुख को नहीं बदलेगा।

पाकिस्तान की मध्यस्थता से बातचीत बहाल करने की कोशिश

अमेरिका और ईरान के बीच संवाद दोबारा शुरू कराने के लिए पाकिस्तान प्रयास कर रहा है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर इसी सिलसिले में ईरान के दौरे पर हैं। ईरानी मीडिया के मुताबिक, मंगलवार को राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने तेहरान में मुनीर से मुलाकात की। इस दौरान क्षेत्रीय हालात और बातचीत बहाल करने की कोशिशों पर चर्चा हुई।

समाचार एजेंसी नूर न्यूज के अनुसार, मुनीर ने ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ से भी मुलाकात की। इन संपर्कों का उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच संवाद के लिए रास्ता तलाशना बताया गया है।

उपलब्ध विवरण के मुताबिक, पाकिस्तान की मध्यस्थता से जून में अमेरिका और ईरान के बीच अंतरिम शांति समझौता हुआ था। हालांकि, कुछ ही सप्ताह बाद दोनों देशों के बीच फिर लड़ाई शुरू हो गई और समझौता कायम नहीं रह सका। ऐसे में मौजूदा प्रयासों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष सुरक्षा, परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक प्रतिबंधों पर किस हद तक सहमति बना पाते हैं।

28 फरवरी से जारी संघर्ष ने बढ़ाई क्षेत्रीय चिंता

दी गई जानकारी के अनुसार, अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल और उन खाड़ी देशों में हमले किए, जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। इस संघर्ष ने क्षेत्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक प्रयासों को और जटिल बना दिया है।

अमेरिका का कहना है कि उसका उद्देश्य ईरान की परमाणु क्षमता को कमजोर करना है। वहीं, ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण बताते हुए परमाणु तकनीक के इस्तेमाल के अधिकार पर जोर देता रहा है।

समझौते की राह में सबसे बड़ी चुनौतियां

ईरान का संवर्धित यूरेनियम देश से बाहर भेजने से इनकार करना और अमेरिका से बातचीत के लिए पहले भरोसा बहाल करने की शर्त रखना मौजूदा गतिरोध को दर्शाता है। एक ओर अमेरिका यूरेनियम संवर्धन क्षमता में कमी और परमाणु हथियारों की संभावना रोकने पर जोर दे रहा है, वहीं ईरान प्रतिबंधों में राहत, बंदरगाहों से नाकेबंदी हटाने और क्षेत्रीय संघर्ष रोकने की मांग कर रहा है।

पाकिस्तान की मध्यस्थता से बातचीत का रास्ता खुल सकता है, लेकिन किसी ठोस समझौते के लिए दोनों देशों को अपनी शर्तों पर समझौता करना होगा। फिलहाल, ईरान का बयान बताता है कि संवर्धित यूरेनियम और आर्थिक प्रतिबंधों पर मतभेद दूर हुए बिना कूटनीतिक प्रगति आसान नहीं होगी।

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