आंखों से नहीं देखा हिमालय, हौसले से चढ़ गए शिखर:झारखंड के शेखर 20,472 फीट, धीरोज 16,732 फीट तक पहुंचे

झारखंड के दृष्टिबाधित शेखर गोप ने 20,472 फीट ऊंची झो-जोंगो चोटी पर तिरंगा फहराया। धीरोज 16,732 फीट तक पहुंचे। दोनों बेहतरीन फुटबॉल खिलाड़ी हैं।
आंखों से नहीं देखा हिमालय, हौसले से चढ़ गए शिखर:झारखंड के शेखर 20,472 फीट, धीरोज 16,732 फीट तक पहुंचे
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जिस हिमालय को देखने के लिए दुनिया भर से लोग हजारों किलोमीटर का सफर तय करते हैं, उसी हिमालय की बर्फीली ऊंचाइयों को झारखंड के दो दृष्टिबाधित युवाओं ने अपने हौसले से नाप दिया। पश्चिमी सिंहभूम के शेखर गोप और धीरोज कुम्हार ने लद्दाख की कठिन पहाड़ियों में ऐसा कारनामा किया है, जिसने पूरे झारखंड को गर्व करने का मौका दिया है। 24 वर्षीय शेखर गोप ने समुद्र तल से 20,472 फीट की ऊंचाई पर स्थित झो-जोंगो चोटी तक पहुंचकर तिरंगा फहराया। वहीं 23 वर्षीय धीरोज कुम्हार भी अभियान में 16,732 फीट की ऊंचाई तक पहुंचे, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के कारण उन्हें आगे की चढ़ाई रोकनी पड़ी। दोनों युवाओं की यह उपलब्धि इसलिए और खास है क्योंकि वे जन्म से ही दृष्टिबाधित हैं।

शेखर और धीरोज पश्चिमी सिंहभूम के दूरदराज ग्रामीण इलाके से आते हैं। सीमित संसाधनों वाले परिवेश से निकलकर दोनों ने पहले खेल के मैदान में अपनी पहचान बनाई और अब पर्वतारोहण जैसी कठिन चुनौती को भी स्वीकार कर लिया। दोनों ने 25 से 31 अगस्त 2026 के बीच लद्दाख की मारखा घाटी में आयोजित अभियान में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्हें बेहद कठिन मौसम, ऊंचाई, दुर्गम रास्तों और कम ऑक्सीजन जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। शेखर ने इन चुनौतियों के बावजूद लगातार चढ़ाई जारी रखी और अंततः 20,472 फीट की ऊंचाई पर स्थित झो-जोंगो चोटी तक पहुंचने में सफल रहे।

शेखर की कहानी सिर्फ एक पर्वतारोहण अभियान की सफलता नहीं है, बल्कि यह उस सोच को चुनौती देने वाली कहानी है जिसमें दृष्टिबाधित व्यक्ति की क्षमताओं को सीमित मान लिया जाता है। जिन आंखों से वह पहाड़ की ऊंचाई, बर्फीले रास्ते या सामने मौजूद चट्टानों को नहीं देख सकते थे, उसी शेखर ने अपने कदमों, प्रशिक्षण, साथियों के भरोसे और अपने हौसले के सहारे हजारों फीट की ऊंचाई तय की। शिखर तक पहुंचने के बाद तिरंगा फहराना उनके लिए सिर्फ एक उपलब्धि नहीं, बल्कि लंबे संघर्ष और आत्मनिर्भरता के सफर का प्रतीक बन गया।

धीरोज कुम्हार की उपलब्धि भी कम बड़ी नहीं है। अभियान के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ने लगी, जिसके कारण उन्हें 16,732 फीट की ऊंचाई पर स्थित बेस कैंप में अपनी चढ़ाई रोकनी पड़ी। हालांकि वह शिखर तक नहीं पहुंच सके, लेकिन इतनी ऊंचाई तक पहुंचना अपने आप में बेहद चुनौतीपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के बावजूद अभियान में लंबी दूरी तक साथ दिया और यह साबित किया कि किसी अभियान की सफलता को सिर्फ अंतिम शिखर तक पहुंचने से नहीं मापा जा सकता। परिस्थितियों के अनुसार सही फैसला लेना भी साहस का हिस्सा है।

शेखर और धीरोज की कहानी का एक और खास पहलू उनका फुटबॉल से जुड़ाव है। दोनों सिर्फ पर्वतारोही ही नहीं, बल्कि बेहतरीन दृष्टिबाधित फुटबॉल खिलाड़ी भी हैं। शेखर झारखंड की दृष्टिबाधित फुटबॉल टीम के कप्तान हैं, जबकि धीरोज राष्ट्रीय स्तर पर दृष्टिबाधित फुटबॉल खिलाड़ी के तौर पर झारखंड का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। यानी मैदान पर गेंद के पीछे दौड़ने से लेकर हिमालय की ऊंचाइयों पर कदम बढ़ाने तक दोनों ने अपने जीवन में लगातार चुनौतियों को स्वीकार किया है।

फुटबॉल ने दोनों युवाओं को केवल खेल नहीं सिखाया, बल्कि टीम भावना, आपसी भरोसा, अनुशासन और मुश्किल परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना भी सिखाया। पर्वतारोहण के दौरान यही गुण उनके काम आए। पहाड़ पर एक छोटी सी गलती भी मुश्किल पैदा कर सकती है। ऐसे में साथी पर भरोसा, निर्देशों को ध्यान से सुनना और अपनी शारीरिक क्षमता को समझना बेहद जरूरी होता है। शेखर और धीरोज ने अपने खेल अनुभव को पर्वतारोहण की चुनौती के साथ जोड़ा और एक नई मिसाल कायम की।

दोनों युवाओं के जीवन में बदलाव लाने में टाटा स्टील फाउंडेशन की ‘सबल’ पहल की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। रिपोर्टों के अनुसार, दोनों शुरुआत में ब्रेल सीखने और बिना किसी की मदद के आने-जाने जैसे बुनियादी कौशल का प्रशिक्षण लेने से जुड़े। इसके बाद उनकी गतिविधियां खेल, नेतृत्व और आउटडोर प्रशिक्षण तक पहुंचीं। इसी प्रक्रिया ने उनमें आत्मविश्वास बढ़ाया और उन्हें अपनी क्षमताओं को नए तरीके से पहचानने का अवसर मिला।

शेखर और धीरोज के लिए आत्मनिर्भर बनने की यह यात्रा आसान नहीं रही होगी। ग्रामीण परिवेश में दृष्टिबाधित व्यक्ति के सामने रोजमर्रा की गतिविधियों से लेकर शिक्षा, रोजगार और खेल तक कई तरह की चुनौतियां होती हैं। लेकिन प्रशिक्षण और अवसर मिलने के बाद दोनों ने अपनी सीमाओं को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। उन्होंने पहले फुटबॉल के मैदान पर अपनी जगह बनाई और फिर पर्वतारोहण जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में कदम रखा। उनकी सफलता इस बात का उदाहरण है कि सही प्रशिक्षण और अवसर मिलने पर प्रतिभा किसी शारीरिक सीमा से बंधी नहीं रहती।

पर्वतारोहण के लिए दोनों ने पहले कठिन प्रशिक्षण भी लिया। रिपोर्टों में बताया गया है कि उन्हें झारखंड में आउटडोर और प्री-एक्सपीडिशन ट्रेनिंग दी गई थी। इस दौरान कठिन परिस्थितियों में काम करना, टीम के साथ तालमेल बनाना, शारीरिक क्षमता बढ़ाना और चुनौतीपूर्ण वातावरण में खुद को तैयार करना शामिल रहा। लद्दाख की यात्रा में इसी तैयारी की परीक्षा हुई। ऊंचाई बढ़ने के साथ हवा में ऑक्सीजन की कमी और मौसम की कठिन परिस्थितियां शरीर पर असर डालती हैं। धीरोज की तबीयत खराब होना भी इसी कठिन अभियान का हिस्सा रहा।

25 अगस्त को शुरू हुआ अभियान 31 अगस्त को पूरा हुआ। इन कुछ दिनों में शेखर और धीरोज ने जिस तरह अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया, उसने उनकी कहानी को झारखंड से बाहर भी पहुंचा दिया। शेखर के शिखर तक पहुंचने और धीरोज के 16,732 फीट तक पहुंचने की खबर सामने आने के बाद दोनों को देशभर से सराहना मिल रही है। यह उपलब्धि विशेष रूप से उन लोगों के लिए प्रेरणादायक है, जो किसी शारीरिक चुनौती या सामाजिक परिस्थिति के कारण अपने सपनों को सीमित समझने लगते हैं।

शेखर ने झो-जोंगो चोटी पर पहुंचकर तिरंगा फहराया तो वह पल उनके लिए बेहद भावुक रहा होगा। जिस ऊंचाई तक पहुंचना किसी सामान्य पर्वतारोही के लिए भी बड़ी चुनौती है, वहां दृष्टिबाधित होकर पहुंचना उनके असाधारण साहस को दर्शाता है। इस उपलब्धि ने यह संदेश दिया कि किसी मंजिल को हासिल करने के लिए केवल आंखों से रास्ता देखना जरूरी नहीं है। मंजिल तक पहुंचने के लिए विश्वास, प्रशिक्षण, अनुशासन और लगातार प्रयास भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।

धीरोज की कहानी भी इसी संदेश को मजबूत करती है। वह स्वास्थ्य कारणों से शिखर तक नहीं पहुंच सके, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 16,732 फीट तक पहुंचना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। सही समय पर स्वास्थ्य को प्राथमिकता देकर बेस कैंप पर रुकना भी अभियान की सुरक्षा का हिस्सा था। इस तरह दोनों युवाओं की उपलब्धियां अलग-अलग होने के बावजूद समान रूप से प्रेरणादायक हैं। एक ने शिखर तक पहुंचकर तिरंगा फहराया तो दूसरे ने कठिन परिस्थितियों के बीच हजारों फीट की ऊंचाई तक पहुंचकर अपनी क्षमता साबित की।

इन दोनों की कहानी में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे अब केवल अपनी उपलब्धियों तक सीमित नहीं हैं। रिपोर्टों के अनुसार, दोनों दूसरे दृष्टिबाधित लोगों को भी आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रशिक्षण देने से जुड़े हैं। यानी जिस रास्ते पर कभी उन्हें दूसरों के सहारे की जरूरत थी, उसी रास्ते पर आगे बढ़कर अब वे दूसरों के लिए प्रेरणा और सहारा बन रहे हैं। यह बदलाव उनकी पूरी यात्रा को और अधिक महत्वपूर्ण बना देता है।

पश्चिमी सिंहभूम के गांवों से शुरू हुई यह कहानी अब हिमालय की चोटी तक पहुंच चुकी है। शेखर गोप और धीरोज कुम्हार ने दिखाया है कि सपनों की ऊंचाई देखने के लिए आंखों की रोशनी जरूरी नहीं होती। जरूरी है उन्हें पूरा करने का हौसला। शेखर ने 20,472 फीट की ऊंचाई पर तिरंगा फहराकर इतिहास रचा, जबकि धीरोज ने 16,732 फीट तक पहुंचकर अपनी दृढ़ता साबित की। दोनों का फुटबॉल से पर्वतारोहण तक का सफर झारखंड के युवाओं के लिए भी एक बड़ा संदेश है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर अवसर और मेहनत साथ हों तो मंजिल की ऊंचाई छोटी पड़ सकती है।

शेखर और धीरोज की उपलब्धि इसलिए भी याद रखी जाएगी क्योंकि उन्होंने हिमालय को अपनी आंखों से नहीं देखा, लेकिन उसके शिखर तक पहुंचने का सपना जरूर देखा और उसे हकीकत में बदल दिया। एक ने 20 हजार फीट से ज्यादा ऊंचाई पर तिरंगा फहराया, दूसरे ने स्वास्थ्य की चुनौती के बावजूद 16,732 फीट तक अपना सफर जारी रखा। फुटबॉल के मैदान से हिमालय की चोटियों तक पहुंचे इन दोनों युवाओं ने साबित कर दिया कि इंसान की असली ताकत उसकी आंखों में नहीं, बल्कि उसके हौसले में होती है।

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