भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने हजारीबाग के चौपारण क्षेत्र में हथिंदर, सोहरा और दैहर सहित कई पुरास्थलों का दस्तावेजीकरण किया है। सर्वेक्षण में प्राचीन लौह उद्योग, महापाषाणिक संस्कृति और दुर्लभ प्रतिमाओं से जुड़े महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य सामने आए हैं।
हजारीबाग: झारखंड के हजारीबाग जिले के चौपारण क्षेत्र में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के हालिया सर्वेक्षण ने क्षेत्र के समृद्ध ऐतिहासिक महत्व को नई पहचान दी है। हथिंदर, सोहरा और दैहर समेत कई पुरास्थलों का पहली बार औपचारिक दस्तावेजीकरण किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यहां मिले पुरातात्विक साक्ष्य इस क्षेत्र की प्राचीन सभ्यता और विकसित लौह तकनीक की ओर संकेत करते हैं।
ASI ने पहली बार दर्ज किए हथिंदर और सोहरा के पुरास्थल
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रांची सर्किल की टीम ने दो दिवसीय सर्वेक्षण के दौरान चौपारण प्रखंड के हथिंदर, सोहरा और दैहर सहित कई ऐतिहासिक स्थलों का विस्तृत अध्ययन किया। इस सर्वेक्षण के बाद हथिंदर और सोहरा के पुरातात्विक अवशेष पहली बार आधिकारिक रूप से ASI के अभिलेखों में दर्ज किए गए हैं। टीम ने प्राचीन मूर्तियों, अभिलेखों, आयरन स्लैग, मृदभांड, महापाषाणिक अवशेषों और धार्मिक स्थलों का तकनीकी एवं फोटोग्राफिक दस्तावेज तैयार किया है।
सर्वेक्षण का नेतृत्व सहायक पुरातत्वविद डॉ. नीरज कुमार मिश्रा और वरिष्ठ छायाकार कन्हैया कुमार झा ने किया। तैयार रिपोर्ट अब उच्च अधिकारियों को भेजी जाएगी। यह चौपारण क्षेत्र में ASI का तीसरा आधिकारिक सर्वेक्षण है। इससे पहले मानगढ़, चैथी और दैहर क्षेत्र का अध्ययन किया जा चुका है।
लौह उद्योग और महापाषाणिक संस्कृति के मिले प्रमाण
सर्वेक्षण के दौरान सबसे महत्वपूर्ण खोज बड़ी मात्रा में मिले आयरन स्लैग, लौह गलाने वाली भट्टियों के अवशेष और धातुकर्म से जुड़े अन्य साक्ष्य रहे। विशेषज्ञों के अनुसार, ये प्रमाण बताते हैं कि चौपारण और चतरा क्षेत्र में प्राचीन काल से विकसित लौह उद्योग मौजूद था। ASI का मानना है कि प्रथम शताब्दी ईस्वी से असुर जनजाति इस क्षेत्र में लौह प्रगलन का कार्य करती थी और यह परंपरा आठवीं-नौवीं शताब्दी तक जारी रही।
महापाषाणिक समाधि स्थलों के आसपास मिले लौह अवशेष इस बात का संकेत देते हैं कि यहां तकनीकी रूप से उन्नत समाज विकसित हो चुका था। शोधकर्ताओं का मानना है कि इसी धातुकर्म परंपरा ने बाद के काल में मंदिरों और अन्य विशाल स्थापत्य निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई होगी।
सती स्तंभ और दुर्लभ प्रतिमाएं बनीं आकर्षण का केंद्र
हथिंदर गांव में स्थित प्राचीन सती प्रस्तर स्तंभ ने भी विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित किया है। इस पर सूर्य, चंद्रमा, आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ और महिला-पुरुष की आकृतियां उकेरी गई हैं, जो उस समय की सामाजिक और धार्मिक परंपराओं की जानकारी देती हैं। शैली के आधार पर विशेषज्ञ इसे 14वीं से 15वीं शताब्दी का मान रहे हैं।
वहीं दैहर गांव में नौवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच की अनेक दुर्लभ प्रतिमाएं मिली हैं। इनमें उमा-महेश्वर, विष्णु, शिव, अवलोकितेश्वर, देवी तारा, बुद्ध और बोधिसत्व की प्रतिमाएं शामिल हैं। कई पत्थर के फलक और छोटे स्तूपों के अवशेष इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म के प्रभाव की भी पुष्टि करते हैं। कमला माता मंदिर परिसर में संरक्षित बौद्ध देवी मरीची की प्रतिमा और उस पर अंकित अभिलेख भी ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
3500 वर्ष पुराने इतिहास की संभावना, संग्रहालय की उठी मांग
सर्वेक्षण के दौरान ब्लैक एंड रेड वेयर तथा नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर जैसे प्राचीन मृदभांड भी मिले हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इनसे संकेत मिलता है कि यह क्षेत्र प्रागैतिहासिक काल से लेकर प्रारंभिक ऐतिहासिक काल तक लगातार आबाद रहा। डॉ. नीरज मिश्रा के अनुसार, हजारीबाग और चतरा क्षेत्र में मिले पुरातात्विक साक्ष्य लगभग तीन से साढ़े तीन हजार वर्ष पुराने सांस्कृतिक विकास की ओर इशारा करते हैं। हालांकि किसी विशिष्ट "3500 वर्ष पुरानी सभ्यता" की अंतिम पुष्टि विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन और आगे के शोध के बाद ही संभव होगी।
इसी बीच स्थानीय लोगों ने दैहर गांव में खुले आसमान के नीचे रखी दर्जनों दुर्लभ प्रतिमाओं के संरक्षण के लिए स्थायी संग्रहालय बनाने की मांग की है। उनका कहना है कि प्राकृतिक क्षरण के कारण ये अमूल्य धरोहरें धीरे-धीरे नष्ट हो रही हैं। ASI के अधिकारियों ने भी माना है कि इन प्रतिमाओं का संरक्षण राष्ट्रीय महत्व का विषय है। उनका कहना है कि यदि यहां संग्रहालय स्थापित किया जाता है तो इससे ऐतिहासिक धरोहर सुरक्षित रहेगी, शोध को बढ़ावा मिलेगा और क्षेत्र में पर्यटन व स्थानीय रोजगार के नए अवसर भी विकसित हो सकेंगे।









