झुंझुनूं के इस्लामपुर का नाम बदलने पर विवाद: ग्रामीणों का कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन, “यथावत नाम रखने” की उठी मांग

झुंझुनूं के इस्लामपुर गांव का नाम बदलने के प्रस्ताव पर विवाद बढ़ा। ग्रामीणों ने कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन कर नाम यथावत रखने की मांग की और आक्रोश रैली निकाली।

झुंझुनूं के इस्लामपुर गांव का नाम बदलने के प्रस्ताव के विरोध में ग्रामीणों ने कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन किया। अंबेडकर पार्क से रैली निकालकर लोगों ने नाम यथावत रखने की मांग की और प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर विरोध दर्ज कराया।

झुंझुनूं: राजस्थान के झुंझुनूं जिले में स्थित ऐतिहासिक गांव इस्लामपुर इन दिनों एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया है। गांव का नाम बदलकर “श्रीरामपुर” किए जाने के प्रस्ताव के खिलाफ स्थानीय ग्रामीणों ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया है।

ग्रामीणों का कहना है कि यह कदम न केवल उनकी ऐतिहासिक पहचान को प्रभावित करेगा, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे सामाजिक सौहार्द और आपसी भाईचारे पर भी असर डालेगा। इसी मांग को लेकर सैकड़ों ग्रामीणों ने झुंझुनूं कलेक्ट्रेट पहुंचकर जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपा और नाम परिवर्तन प्रस्ताव वापस लेने की मांग की।

अंबेडकर पार्क से कलेक्ट्रेट तक निकाली गई आक्रोश रैली

विरोध प्रदर्शन की शुरुआत “समस्त ग्रामवासी, इस्लामपुर” के बैनर तले हुई, जहां बड़ी संख्या में ग्रामीण अंबेडकर पार्क में एकत्र हुए। यहां से एक आक्रोश रैली निकाली गई जो शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरते हुए कलेक्ट्रेट तक पहुंची।

रैली के दौरान प्रदर्शनकारियों ने हाथों में तख्तियां लेकर गांव का नाम यथावत रखने की मांग की और प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन माहौल में गहरी नाराजगी और भावनात्मक तनाव स्पष्ट देखा गया।

सर्वसमाज की भागीदारी, विभिन्न संगठनों का समर्थन

कलेक्ट्रेट पर हुए इस प्रदर्शन में विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इनमें मेघवाल समाज के सदस्य, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) के नेता राजेन्द्र फौजी, कांग्रेस नेता खलील बुडाना और मुस्लिम न्याय मंच के संयोजक इमरान बडगूजर प्रमुख रूप से मौजूद रहे।

प्रदर्शन में सभी समुदायों की भागीदारी को ग्रामीणों ने “सामाजिक एकता का प्रतीक” बताया और कहा कि गांव की पहचान किसी एक वर्ग से नहीं, बल्कि सभी समुदायों के साझा इतिहास से जुड़ी है।

“गंगा-जमुनी तहजीब” बचाने की अपील

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि गांव की सबसे बड़ी ताकत उसकी सामाजिक विविधता और गंगा-जमुनी तहजीब रही है। उनका आरोप है कि नाम बदलने का प्रस्ताव इस ऐतिहासिक समरसता को कमजोर कर सकता है।

नेताओं और ग्रामीणों ने प्रशासन से अपील की कि इस तरह के निर्णयों में स्थानीय लोगों की भावनाओं और ऐतिहासिक तथ्यों को प्राथमिकता दी जाए। उन्होंने कहा कि किसी भी बदलाव से पहले व्यापक संवाद और सहमति जरूरी है।

रैली में उठे तीखे राजनीतिक आरोप

रैली को संबोधित करते हुए RLP नेता राजेन्द्र फौजी ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि इस तरह के नाम परिवर्तन के मुद्दों को राजनीतिक रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे जनता का ध्यान मूल समस्याओं जैसे बेरोजगारी और महंगाई से हटाया जा रहा है।

उन्होंने यह भी दावा किया कि नाम बदलने से ग्रामीणों को प्रशासनिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है, जैसे आधार कार्ड, वोटर आईडी, जमीन रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजों में बदलाव की प्रक्रिया।

ऐतिहासिक दावे और गांव की स्थापना का उल्लेख

ग्रामीणों ने अपने ज्ञापन में गांव के ऐतिहासिक रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि इस्लामपुर का नाम सदियों पुराना है। उनके अनुसार, गांव की स्थापना वर्ष 1459 में इस्लाम खां सूर द्वारा की गई थी, और तब से यह नाम प्रचलन में है।

ग्रामीणों का कहना है कि गांव में विभिन्न समुदाय लंबे समय से सौहार्दपूर्ण तरीके से रह रहे हैं, और यह नाम उनकी साझा विरासत का प्रतीक है।

विरोध के दौरान भावनात्मक बयान और बहस

कलेक्ट्रेट के बाहर आयोजित सभा में कई वक्ताओं ने भावनात्मक और तीखे बयान दिए। कांग्रेस नेता खलील बुडाना ने कहा कि यदि प्रशासन को निर्णय की वैधता पर भरोसा है, तो सार्वजनिक रूप से चर्चा की जाए और ऐतिहासिक तथ्यों की जांच होनी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी विवाद का समाधान संवाद और पारदर्शिता से होना चाहिए, न कि एकतरफा निर्णय से।

प्रशासन से नाम यथावत रखने की मांग

प्रदर्शन के अंत में ग्रामीणों ने जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपते हुए स्पष्ट कहा कि गांव का नाम “इस्लामपुर” ही रखा जाए। उनका तर्क था कि यह केवल एक नाम नहीं, बल्कि उनकी पहचान, इतिहास और सामाजिक एकता का प्रतीक है।

ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर विचार नहीं किया गया तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।

सामाजिक सौहार्द बनाम पहचान की राजनीति

यह मामला अब केवल एक गांव के नाम परिवर्तन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पहचान, इतिहास और सामाजिक संतुलन से जुड़ी एक बड़ी बहस का रूप ले चुका है। एक ओर ग्रामीण इसे सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा मानते हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक प्रस्ताव इसे नए नाम से जोड़कर देख रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में स्थानीय समुदाय की सहमति और ऐतिहासिक दस्तावेजों का संतुलित मूल्यांकन बेहद जरूरी होता है, ताकि सामाजिक तनाव को बढ़ने से रोका जा सके।

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