जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल 17वें दिन में पहुंच गई है। सांसद जॉन ब्रिटास ने छात्रों की बिगड़ती सेहत पर चिंता जताते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और केंद्रीय शिक्षा मंत्री से हस्तक्षेप की मांग की है।
नई दिल्ली: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में छात्रों की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 को यह हड़ताल 17वें दिन में प्रवेश कर गई। छात्रों की बिगड़ती सेहत को लेकर चिंता जताते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPI(M) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रल्हाद जोशी से मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की है।
ब्रिटास ने विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्रों के बीच जारी गतिरोध को समाप्त करने के लिए जरूरी कदम उठाने की मांग की है। उनका कहना है कि 3 अक्टूबर से शुरू हुई भूख हड़ताल विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से छात्रों की लंबे समय से चली आ रही मांगों पर कथित तौर पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिए जाने के बाद शुरू हुई।
इस मामले में छात्रों के प्रतिनिधियों के खिलाफ की गई निष्कासन संबंधी कार्रवाई और मुख्य प्रॉक्टर कार्यालय (CPO) के मैनुअल के कुछ प्रावधान भी विवाद के केंद्र में हैं।
राष्ट्रपति और शिक्षा मंत्री से हस्तक्षेप की मांग
जॉन ब्रिटास ने 18 अक्टूबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रल्हाद जोशी को पत्र लिखकर मामले में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया। उन्होंने भूख हड़ताल में शामिल छात्रों की स्वास्थ्य स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की।
ब्रिटास ने मांग की कि विश्वविद्यालय के निर्वाचित छात्र प्रतिनिधियों के खिलाफ जारी निष्कासन आदेश वापस लिए जाएं। इसके साथ ही उन्होंने मुख्य प्रॉक्टर कार्यालय के मैनुअल में कथित रूप से आपत्तिजनक प्रावधानों को हटाने की मांग भी उठाई।
उनकी अपील का उद्देश्य विश्वविद्यालय प्रशासन और प्रदर्शन कर रहे छात्रों के बीच बने गतिरोध का समाधान निकालना है। हालांकि, राष्ट्रपति और केंद्रीय शिक्षा मंत्री की ओर से इस अपील पर क्या प्रतिक्रिया दी गई है, इसकी पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती।
3 अक्टूबर से जारी है छात्रों की भूख हड़ताल
JNU में छात्रों की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल 3 अक्टूबर को शुरू हुई थी। 19 अक्टूबर तक इसके 17वें दिन में पहुंचने के साथ प्रदर्शनकारियों की सेहत को लेकर चिंता बढ़ गई है।
भूख हड़ताल विरोध दर्ज कराने का एक ऐसा तरीका है, जिसमें प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को लेकर भोजन का त्याग करते हैं। लंबे समय तक भोजन नहीं लेने से शरीर में कमजोरी, निर्जलीकरण और अन्य स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए इस तरह के प्रदर्शन में शामिल लोगों की स्वास्थ्य स्थिति पर निगरानी रखना महत्वपूर्ण होता है।
ब्रिटास ने इसी स्वास्थ्य संबंधी चिंता को अपने पत्रों में प्रमुखता दी है। उनका मानना है कि छात्रों की मांगों पर बातचीत और समाधान की दिशा में कदम उठाए जाने चाहिए, ताकि स्थिति को और गंभीर होने से रोका जा सके।
हालांकि, प्रदर्शन में शामिल प्रत्येक छात्र की मौजूदा स्वास्थ्य स्थिति, चिकित्सा संबंधी विवरण और विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं की जानकारी सामने आने पर ही स्थिति का पूरा आकलन किया जा सकेगा।
निर्वाचित छात्र प्रतिनिधियों के निष्कासन का मुद्दा
इस विवाद का एक प्रमुख पहलू जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (JNUSU) के निर्वाचित प्रतिनिधियों के खिलाफ जारी निष्कासन आदेश हैं। ब्रिटास ने इन आदेशों को वापस लेने की मांग की है।
छात्र संगठनों के निर्वाचित प्रतिनिधि विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों की मांगों और शिकायतों को प्रशासन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई को लेकर विवाद होने पर छात्र समुदाय और प्रशासन के बीच तनाव बढ़ सकता है।
इस मामले में निष्कासन आदेशों के पीछे के विस्तृत आरोप, प्रशासनिक प्रक्रिया और संबंधित पक्षों की दलीलों का पूरा विवरण उपलब्ध जानकारी में शामिल नहीं है। इसलिए कार्रवाई की वैधता या उसके आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले विश्वविद्यालय के आधिकारिक दस्तावेजों और संबंधित पक्षों के बयान देखना जरूरी होगा।
ब्रिटास की मांग है कि इन आदेशों को वापस लेकर छात्रों के साथ बातचीत का रास्ता खोला जाए।
CPO मैनुअल के प्रावधान भी विवाद में
मुख्य प्रॉक्टर कार्यालय का मैनुअल विश्वविद्यालय परिसर में अनुशासन और संबंधित प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जुड़ा होता है। जॉन ब्रिटास ने इसके कुछ प्रावधानों को कथित तौर पर आपत्तिजनक बताते हुए उन्हें वापस लेने की मांग की है।
इस मांग से संकेत मिलता है कि छात्रों की शिकायतें केवल निष्कासन आदेशों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विश्वविद्यालय में अनुशासन संबंधी नियमों और उनके इस्तेमाल को लेकर भी असहमति है।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी में मैनुअल के उन विशिष्ट प्रावधानों का पूरा विवरण नहीं दिया गया है, जिन पर आपत्ति जताई गई है। इसलिए यह स्पष्ट करने के लिए संबंधित दस्तावेजों की समीक्षा आवश्यक है कि विवाद किन नियमों और प्रक्रियाओं को लेकर है।
विश्वविद्यालयों में अनुशासन बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी होती है। वहीं, छात्रों के अधिकारों, प्रतिनिधित्व और शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया को लेकर स्पष्टता बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है। किसी भी विवाद का समाधान संबंधित नियमों, तथ्यों और उचित प्रक्रिया के आधार पर किया जाना चाहिए।
विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्रों के बीच गतिरोध
JNU में जारी भूख हड़ताल ने विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र समुदाय के बीच संवाद की आवश्यकता को फिर सामने ला दिया है। जब किसी शैक्षणिक संस्थान में मांगों को लेकर लंबा विरोध चलता है, तो उसका असर परिसर के सामान्य माहौल और छात्रों की पढ़ाई पर भी पड़ सकता है।
ऐसी परिस्थितियों में सभी संबंधित पक्षों के बीच बातचीत, शिकायतों की निष्पक्ष समीक्षा और समयबद्ध समाधान महत्वपूर्ण हो जाते हैं। यदि छात्रों की मांगों पर सहमति बनती है, तो गतिरोध कम करने का रास्ता निकल सकता है। दूसरी ओर, मांगों और प्रशासनिक फैसलों को लेकर मतभेद बने रहने पर प्रदर्शन लंबा खिंच सकता है।
ब्रिटास ने राष्ट्रपति और शिक्षा मंत्री से हस्तक्षेप की अपील करके इस मामले को विश्वविद्यालय के दायरे से आगे राष्ट्रीय स्तर पर उठाया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित अधिकारी इस अपील पर क्या कदम उठाते हैं और विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है।
आगे क्या होगा?
19 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार, JNU छात्रों की भूख हड़ताल 17वें दिन में पहुंच चुकी थी और जॉन ब्रिटास ने छात्रों की स्वास्थ्य स्थिति का हवाला देकर उच्च स्तर पर हस्तक्षेप की मांग की थी।
इस विवाद के आगे बढ़ने की दिशा मुख्य रूप से छात्रों की मांगों, निष्कासन आदेशों पर प्रशासन के रुख और CPO मैनुअल को लेकर उठाई गई आपत्तियों पर निर्भर करेगी।
फिलहाल, छात्रों की स्वास्थ्य सुरक्षा, प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच संवाद तथा विवादित फैसलों की समीक्षा इस मामले के महत्वपूर्ण पहलू हैं। राष्ट्रपति, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और विश्वविद्यालय प्रशासन की संभावित प्रतिक्रिया पर अब नजर रहेगी। इस बीच, मामले से जुड़े सभी पक्षों के आधिकारिक बयानों और दस्तावेजों के आधार पर ही आगे की स्थिति का आकलन किया जा सकेगा।









