Swavlamban Seminar 2026: भारतीय नौसेना के स्वदेशी रक्षा उपकरणों पर जोर, 1,950 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट किया साइन

Swavlamban Seminar 2026 में भारतीय नौसेना ने स्वदेशी रक्षा उपकरणों और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया। जानें 1,950 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट और देश की रक्षा क्षमता

भारतीय नौसेना 26 और 27 अक्टूबर को पांचवें इनोवेशन सेमिनार ‘स्वावलंबन’ का आयोजन करेगी। इस सेमिनार का उद्देश्य देश में स्वदेशी तकनीक और रक्षा उपकरणों के विकास को बढ़ावा देना है।

Swavlamban 2026: भारतीय नौसेना स्वदेशी रक्षा तकनीक, नवाचार और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए 26 और 27 अक्टूबर को पांचवें ‘स्वावलंबन’ इनोवेशन सेमिनार का आयोजन करेगी। इस दो दिवसीय कार्यक्रम में रक्षा क्षेत्र से जुड़े उद्योगों, नवाचारकर्ताओं, शिक्षाविदों और निवेशकों को एक मंच पर लाया जाएगा। 

नौसेना के वाइस चीफ वाइस एडमिरल अजय कोचर के मुताबिक, स्वावलंबन पहल के तहत अब तक लगभग 3,500 करोड़ रुपये के उपकरणों और तकनीकों की आवश्यकता को मंजूरी दी जा चुकी है, जबकि 1,950 करोड़ रुपये के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं। यह पहल भारत की रक्षा जरूरतों को स्वदेशी तकनीक के जरिए पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

26 और 27 अक्टूबर को होगा स्वावलंबन सेमिनार

भारतीय नौसेना का पांचवां स्वावलंबन इनोवेशन सेमिनार रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और तकनीकी विकास को गति देने के उद्देश्य से आयोजित किया जा रहा है। दो दिनों तक चलने वाले इस कार्यक्रम में 100 से अधिक स्टॉल लगाए जाएंगे, जहां विभिन्न स्वदेशी तकनीकों, उपकरणों और नए समाधानों को प्रदर्शित किया जाएगा।

इस आयोजन में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रतिनिधियों के साथ सुरक्षा एजेंसियों को भी भाग लेने का अवसर मिलेगा। वे नवाचारकर्ताओं, शिक्षाविदों और निवेशकों के साथ सीधे बातचीत कर सकेंगे। इससे रक्षा बलों की वास्तविक जरूरतों और घरेलू उद्योगों की तकनीकी क्षमताओं के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

सेमिनार के दौरान विभिन्न उपकरणों की उपयोगिता का आकलन करने के साथ-साथ रक्षा आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी चुनौतियों और साइबर सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी चर्चा की जाएगी।

3,500 करोड़ रुपये की जरूरत को मंजूरी, 1,950 करोड़ के अनुबंध

Swavlamban Seminar 2026: भारतीय नौसेना के स्वदेशी रक्षा उपकरणों पर जोर, 1,950 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट किया साइन

नौसेना के वाइस चीफ वाइस एडमिरल अजय कोचर ने स्वावलंबन पहल के तहत घरेलू उद्योगों के प्रदर्शन पर संतोष जताया है। उन्होंने बताया कि जब इस कार्यक्रम की शुरुआत हुई थी, तब भारतीय उद्योगों को नौसेना की जरूरतों के अनुरूप नए समाधान विकसित करने की चुनौती दी गई थी। उद्योग जगत की ओर से इसे सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली।

वाइस एडमिरल कोचर के अनुसार, इस पहल के अंतर्गत अब तक लगभग 3,500 करोड़ रुपये के प्रस्तावों के लिए आवश्यकता की स्वीकृति यानी एओएन (Acceptance of Necessity) मिल चुकी है। इसके अलावा करीब 1,950 करोड़ रुपये के अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं। रक्षा खरीद प्रक्रिया में एओएन किसी उपकरण या प्रणाली की आवश्यकता को मंजूरी देने से संबंधित महत्वपूर्ण चरण है। हालांकि, आवश्यकता की मंजूरी और अनुबंध पर हस्ताक्षर अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए इन दोनों आंकड़ों को रक्षा खरीद के अलग-अलग चरणों के रूप में समझना जरूरी है।

नौसेना का मानना है कि घरेलू कंपनियों और तकनीकी संस्थानों की भागीदारी से ऐसे समाधान विकसित किए जा सकते हैं, जो परिचालन जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता को भी मजबूत करें।

नौसेना को चाहिए वास्तविक जरूरतों पर आधारित तकनीक

वाइस एडमिरल अजय कोचर ने उद्योग जगत और शिक्षण संस्थानों से अपील की कि वे केवल नए विचार प्रस्तुत करने तक सीमित न रहें, बल्कि ऐसे व्यावहारिक समाधान विकसित करें, जिन्हें वास्तविक परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जा सके। उन्होंने कहा कि रक्षा बलों को ऐसे उत्पादों की जरूरत है, जिनके पीछे मजबूत इंजीनियरिंग हो और जिन्हें भरोसेमंद तरीके से उपलब्ध कराया जा सके। किसी तकनीक की सफलता केवल उसके नए होने पर निर्भर नहीं करती, बल्कि यह भी जरूरी है कि वह सेना की परिचालन आवश्यकताओं को पूरा करे और लंबे समय तक प्रभावी ढंग से काम कर सके।

इस दृष्टिकोण से स्वावलंबन सेमिनार रक्षा बलों और घरेलू उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ाने का माध्यम बन सकता है। इसके जरिए नए विचारों को व्यावहारिक उपकरणों में बदलने और उनकी उपयोगिता का परीक्षण करने के अवसर मिलेंगे।

प्रोटोटाइप और समुद्री परीक्षण से बेहतर होगी तकनीक

नौसेना के अनुसार, किसी भी नई तकनीक को पहली कोशिश में पूरी तरह तैयार मान लेना व्यावहारिक नहीं है। इसके बजाय चरणबद्ध विकास, प्रोटोटाइप निर्माण और वास्तविक परिस्थितियों में परीक्षण के माध्यम से उसे बेहतर बनाया जा सकता है। वाइस एडमिरल कोचर ने बताया कि नौसेना शुरुआती चरण में काम करने वाले प्रोटोटाइप को स्वीकार करती है। इसके बाद संबंधित प्रणाली का समुद्र में वास्तविक परिचालन परिस्थितियों के तहत परीक्षण किया जाता है। इन परीक्षणों से मिलने वाली प्रतिक्रिया के आधार पर उपकरणों में आवश्यक बदलाव किए जाते हैं।

नई तकनीकों की उपलब्धता और परीक्षण के दौरान सामने आने वाली कमियों को ध्यान में रखते हुए सिस्टम में लगातार सुधार किया जाता है। इससे अंतिम उत्पाद की विश्वसनीयता, उपयोगिता और परिचालन क्षमता बढ़ाने में मदद मिलती है।

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