कानपुर: खाने की बर्बादी रोकने और पर्यावरण को सुरक्षित रखने की दिशा में हरकोर्ट बटलर प्राविधिक विश्वविद्यालय (HBTU), कानपुर के विद्यार्थियों ने कई नए प्रयोग प्रस्तुत किए हैं। फलों को जल्दी सड़ने से बचाने वाले विशेष पाउच से लेकर हॉस्टल के बचे भोजन से जैविक खाद और जैव ईंधन बनाने तक, विद्यार्थियों ने रोजमर्रा के कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलने की संभावनाएं दिखाई हैं। विश्व खाद्य दिवस 2026 के अवसर पर आयोजित ‘इनोवेट विद वेस्ट’ प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने खाद्य अपशिष्ट का बेहतर इस्तेमाल करने वाले अपने नवाचार प्रस्तुत किए। इन प्रयोगों का उद्देश्य भोजन की बर्बादी कम करना, कचरे के निस्तारण की समस्या का समाधान तलाशना और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प विकसित करना है
विश्व खाद्य दिवस पर आयोजित इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने यह दिखाने की कोशिश की कि जिन चीजों को आमतौर पर बेकार समझकर फेंक दिया जाता है, उनका वैज्ञानिक तरीके से इस्तेमाल करके उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। फल और सब्जियों के छिलके, हॉस्टल की मेस में बचा भोजन, अंडों के छिलके और पूजा के बाद फेंके जाने वाले फूल जैसे पदार्थों से कई तरह के उत्पाद बनाने के मॉडल सामने आए। इससे खाद्य प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों की रचनात्मकता के साथ-साथ कचरा प्रबंधन और टिकाऊ विकास को लेकर उनकी सोच भी सामने आई।
विद्यार्थियों के प्रमुख नवाचारों में फलों को जल्दी पकने और खराब होने से बचाने के लिए तैयार किया गया एथिलीन अवशोषित करने वाला पाउच शामिल है। आयुष तिवारी, कृष्णा शर्मा, शिवानी और वेदांत की टीम ने नारियल के रेशों और धान की भूसी का इस्तेमाल करके यह पाउच तैयार किया। इसका उद्देश्य फलों से निकलने वाली एथिलीन गैस को अवशोषित करना है, क्योंकि यह गैस कई फलों के पकने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है। फलों के आसपास एथिलीन की मात्रा नियंत्रित करने से उनके तेजी से पकने की प्रक्रिया को धीमा करने में मदद मिल सकती है।
फल और सब्जियां बाजार तक पहुंचने से पहले खेतों से मंडियों, गोदामों और दुकानों तक लंबा सफर तय करती हैं। इस दौरान तापमान, भंडारण की व्यवस्था और परिवहन की परिस्थितियों के कारण कई बार फल जल्दी पक जाते हैं या खराब होने लगते हैं। इससे किसानों, कारोबारियों और उपभोक्ताओं को नुकसान उठाना पड़ता है। यदि एथिलीन अवशोषित करने वाले इस तरह के पाउच का व्यावहारिक इस्तेमाल सफल रहता है, तो फल भंडारण और परिवहन के दौरान होने वाली बर्बादी कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसकी वास्तविक प्रभावशीलता, अलग-अलग फलों पर असर और बाजार में इस्तेमाल की उपयुक्तता का आकलन परीक्षणों के आधार पर ही किया जा सकेगा।
विद्यार्थियों का एक अन्य महत्वपूर्ण प्रयोग हॉस्टल की मेस में बचने वाले भोजन के बेहतर निस्तारण से जुड़ा रहा। आमतौर पर हॉस्टल, कैंटीन और बड़े रसोईघरों में प्रतिदिन काफी मात्रा में पका हुआ भोजन बच जाता है। यदि इस कचरे को दूसरे कचरे के साथ मिलाकर फेंक दिया जाए, तो उसका उचित उपयोग करना मुश्किल हो सकता है। वहीं, इसे अलग करके वैज्ञानिक तरीके से संसाधित किया जाए, तो इससे जैविक खाद और जैव ईंधन बनाने की संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं।
आदित्य अग्रवाल ने हॉस्टल की मेस से निकलने वाले बचे भोजन के प्रबंधन का एक मॉडल प्रस्तुत किया। इसमें खाद्य अपशिष्ट से प्लास्टिक को अलग करने और जैविक सामग्री को सूखी पत्तियों के साथ संसाधित करके उपयोगी उत्पाद तैयार करने की अवधारणा रखी गई। इस तरह के मॉडल का उद्देश्य भोजन की बर्बादी को कम करना और जैविक कचरे को दोबारा उपयोग में लाना है। यदि ऐसे मॉडल को संस्थानों और बड़े सामुदायिक रसोईघरों में प्रभावी तरीके से लागू किया जाए, तो कचरे को बाहर भेजने की जरूरत कम करने के साथ-साथ संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है।
कार्यक्रम में केले के छिलकों से बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक बनाने का प्रयोग भी प्रस्तुत किया गया। अदिति सिंह और जानवी कौशल ने केले के छिलकों का उपयोग करके ऐसा पदार्थ तैयार करने का प्रयास किया, जिसका इस्तेमाल पर्यावरण के अनुकूल पैकेजिंग के विकल्प के रूप में किया जा सकता है। केले का छिलका आमतौर पर घरों, फलों की दुकानों और खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों से निकलने वाला जैविक कचरा है। इसे उपयोगी सामग्री में बदलने से एक ओर कचरे का बेहतर प्रबंधन संभव हो सकता है, वहीं दूसरी ओर पैकेजिंग के लिए वैकल्पिक सामग्री विकसित करने की दिशा में भी काम किया जा सकता है।
हालांकि, बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक के व्यापक इस्तेमाल के लिए उसकी मजबूती, टिकाऊपन, पानी और नमी के प्रति प्रतिरोधक क्षमता तथा प्राकृतिक परिस्थितियों में विघटित होने की दर जैसे पहलुओं का परीक्षण जरूरी होता है। विद्यार्थियों का यह प्रयोग इसी तरह के वैकल्पिक पदार्थों के विकास की संभावनाओं को सामने लाता है।
प्रतियोगिता में केवल फल-सब्जियों के अवशेषों का इस्तेमाल ही नहीं, बल्कि रसोई और घरों से निकलने वाले दूसरे अपशिष्ट पदार्थों के उपयोग पर भी ध्यान दिया गया। वैभव सिंह ने संतरे के छिलकों के पाउडर और बेकिंग सोडा की मदद से बर्तन साफ करने वाला ‘सिट्रस स्क्रब’ तैयार किया। संतरे के छिलकों में मौजूद प्राकृतिक घटकों का इस्तेमाल सफाई से जुड़े उत्पाद विकसित करने में किया जा सकता है। इस तरह के प्रयोग से फलों के छिलकों को सीधे कूड़े में फेंकने के बजाय उनका मूल्यवर्धन करने की संभावना सामने आती है।
नंदिनी खत्री ने अंडों के छिलकों से कैल्शियम कार्बोनेट युक्त पाउडर तैयार करने का प्रयोग प्रस्तुत किया। अंडों के छिलके अक्सर घरों, भोजनालयों और खाद्य प्रतिष्ठानों में कचरे के रूप में फेंक दिए जाते हैं, जबकि उनमें कैल्शियम कार्बोनेट पाया जाता है। उचित प्रसंस्करण के बाद इस तरह की सामग्री का उपयोग विभिन्न उत्पादों में किए जाने की संभावनाओं पर विचार किया जा सकता है। इसके लिए उत्पाद की शुद्धता, गुणवत्ता और निर्धारित उपयोग के अनुसार सुरक्षा मानकों की जांच आवश्यक होगी।
धार्मिक आयोजनों और पूजा-पाठ के बाद बड़ी मात्रा में फूल भी निकलते हैं। कई जगह इन फूलों को सीधे कचरे में डाल दिया जाता है या जलाशयों में विसर्जित कर दिया जाता है। ऐसे फूलों के उचित निस्तारण की समस्या को ध्यान में रखते हुए अनाया सिंह भवानी ने विसर्जित फूलों से चारकोल-मुक्त अगरबत्ती तैयार करने का प्रयोग किया। इस पहल का उद्देश्य फूलों जैसे जैविक अपशिष्ट को उपयोगी उत्पाद में बदलना है। यदि ऐसे प्रयासों को बड़े स्तर पर विकसित किया जाए, तो मंदिरों और धार्मिक स्थलों से निकलने वाले फूलों के प्रबंधन के लिए भी नए विकल्प मिल सकते हैं।
कुमी यादव ने मौसमी के छिलकों से हर्बल फेसपैक तैयार किया। वहीं, कनिष्ठा गर्ग, प्रशांत सिंह और प्रियांश गुप्ता ने केले के रेशों का इस्तेमाल करके सजावटी उत्पाद और हस्तनिर्मित कागज तैयार करने के प्रयोग प्रस्तुत किए। इन प्रयोगों से यह संदेश सामने आया कि कृषि और खाद्य पदार्थों से निकलने वाले अवशेषों का उपयोग केवल खाद बनाने तक सीमित नहीं है। उपयुक्त तकनीक और प्रसंस्करण की मदद से उनसे घरेलू उपयोग, सजावट और पैकेजिंग से जुड़े उत्पाद भी विकसित किए जा सकते हैं।
एचबीटीयू के खाद्य प्रौद्योगिकी विभाग और एएफएसटी (इंडिया) की ओर से शुक्रवार को आरके ऑडिटोरियम में विश्व खाद्य दिवस 2026 के अवसर पर कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम की थीम ‘आज का नवाचार, कल का पोषण’ रखी गई। इस आयोजन के तहत ‘इनोवेट विद वेस्ट’ प्रतियोगिता के माध्यम से विद्यार्थियों को खाद्य अपशिष्ट के उपयोग और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विचार प्रस्तुत करने का अवसर मिला।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. समशेर ने खाद्य चुनौतियों से निपटने के लिए वैज्ञानिक शोध और नवाचार को महत्वपूर्ण बताया। इस दौरान प्रो. अनुराग सिंह, प्रो. विवेक कुमार, प्रो. पीकेएस यादव और प्रो. अलक कुमार सिंह ने भी तकनीकी विकास और अनुसंधान के महत्व पर विचार रखे। तकनीकी सत्र में गुरुग्राम के अमित कुमार और निफ्टेम के प्रो. मुरलीधर मेघवाल ने भी शोध से जुड़े विषयों पर जानकारी दी।इस आयोजन की खास बात यह रही कि विद्यार्थियों ने खाद्य पदार्थों की बर्बादी को केवल पर्यावरण से जुड़ी समस्या के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे उपयोगी उत्पाद तैयार करने के अवसर के रूप में प्रस्तुत किया। फलों को अधिक समय तक सुरक्षित रखने की तकनीक से लेकर भोजन के अवशेषों से खाद और जैव ईंधन तैयार करने तक, इन प्रयोगों में संसाधनों का बेहतर उपयोग करने पर जोर दिया गया।
खाद्य पदार्थों की बर्बादी दुनिया भर में एक बड़ी चुनौती है। भोजन तैयार करने से लेकर उसके भंडारण, परिवहन और उपभोग तक अलग-अलग चरणों में काफी मात्रा में खाद्य सामग्री बेकार हो जाती है। इससे पानी, ऊर्जा, जमीन और खेती में इस्तेमाल होने वाले दूसरे संसाधनों की भी बर्बादी होती है। ऐसे में खाद्य अपशिष्ट को कम करना और उससे उपयोगी उत्पाद तैयार करना पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ संसाधनों के कुशल इस्तेमाल के लिए भी महत्वपूर्ण है।
एचबीटीयू के विद्यार्थियों के इन प्रयोगों को आगे बढ़ाने के लिए उनकी तकनीकी क्षमता, लागत, उत्पाद की गुणवत्ता और बड़े स्तर पर उत्पादन की संभावनाओं का आकलन महत्वपूर्ण होगा। यदि इन विचारों को सफल परीक्षणों, शोध और व्यावहारिक अनुप्रयोग का समर्थन मिलता है, तो भविष्य में इनसे खाद्य उद्योग, कृषि, घरेलू उपयोग और कचरा प्रबंधन के क्षेत्र में नए विकल्प विकसित हो सकते हैं। विश्व खाद्य दिवस पर प्रस्तुत ये नवाचार इस बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि सही तकनीक और वैज्ञानिक सोच के जरिए बेकार समझी जाने वाली सामग्री को भी उपयोगी संसाधन में बदला जा सकता है।









