झारखंड के बोकारो जिले में एक ऐसा मंदिर है, जिसकी परंपरा आम मंदिरों से बिल्कुल अलग है। कसमार प्रखंड के कुसमाटांड़ गांव स्थित मां मंगलचंडी मंदिर में महिलाएं और बच्चियां मंदिर के अंदर प्रवेश नहीं करतीं। स्थानीय मान्यता के अनुसार यह परंपरा करीब 200 वर्षों से चली आ रही है। यहां महिलाएं मंदिर के गर्भगृह या पूजा स्थल के भीतर जाने के बजाय मंदिर से कुछ दूरी पर बैठकर ही मां की आराधना करती हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार महिलाओं और बच्चियों को मंदिर से करीब 150 से 200 मीटर की दूरी पर बैठकर पूजा करने की परंपरा है।
मां मंगलचंडी मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों में गहरी आस्था है। खासकर धार्मिक अवसरों और पूजा-अनुष्ठान के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। लेकिन मंदिर की सबसे अलग पहचान महिलाओं के प्रवेश से जुड़ी इस पुरानी परंपरा को माना जाता है। जहां देश के ज्यादातर मंदिरों में महिलाएं पुरुषों के साथ पूजा-अर्चना करती हैं, वहीं कसमार के इस मंदिर में लंबे समय से एक विशेष धार्मिक मान्यता का पालन किया जा रहा है। इस परंपरा के कारण यह मंदिर आसपास के इलाके में चर्चा का विषय भी बना रहता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार मंदिर में मां मंगलचंडी की पूजा विशेष धार्मिक विधि-विधान से की जाती है और यहां चली आ रही परंपराओं का पालन श्रद्धालु लंबे समय से करते आ रहे हैं। महिलाओं को मंदिर के अंदर जाने की अनुमति नहीं होने के बावजूद उनकी आस्था में कोई कमी नहीं है। वे मंदिर के बाहर निर्धारित दूरी पर बैठकर ही मां की पूजा करती हैं और अपनी मनोकामना लेकर माता का स्मरण करती हैं। इस तरह मंदिर की धार्मिक परंपरा में महिलाओं की आस्था भी बनी रहती है, लेकिन पूजा करने का तरीका अलग है।
मंदिर की इस मान्यता को लेकर कई तरह की स्थानीय कथाएं और धार्मिक विश्वास जुड़े हुए हैं। हालांकि इन मान्यताओं का लिखित ऐतिहासिक प्रमाण अलग विषय है और इनके बारे में अलग-अलग स्थानीय लोगों की अपनी-अपनी व्याख्या हो सकती है। इसलिए मंदिर से जुड़ी पुरानी कथाओं को धार्मिक आस्था और स्थानीय परंपरा के रूप में ही देखा जाता है। उपलब्ध जानकारी में यह स्पष्ट है कि महिलाओं और बच्चियों के प्रवेश पर रोक मंदिर की पुरानी मान्यता का हिस्सा है।
कुसमाटांड़ गांव में स्थित यह मंदिर केवल स्थानीय लोगों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि आसपास के ग्रामीण इलाकों से भी लोग मां के दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में किसी प्राचीन मंदिर से जुड़ी परंपरा कई पीढ़ियों तक आगे बढ़ती रहती है। परिवार के बुजुर्ग बच्चों को मंदिर की मान्यताओं के बारे में बताते हैं और अगली पीढ़ी भी उसी परंपरा का पालन करती है। मां मंगलचंडी मंदिर के मामले में भी स्थानीय लोगों के बीच यही धार्मिक विश्वास देखने को मिलता है।
इस मंदिर की खास बात यह है कि महिलाओं को मंदिर में प्रवेश नहीं करने की परंपरा केवल किसी एक विशेष पर्व तक सीमित नहीं बताई जाती, बल्कि धार्मिक पूजा और अनुष्ठान के दौरान इसका पालन किया जाता है। स्थानीय जानकारी के मुताबिक बच्चियों को भी मंदिर के अंदर जाने की अनुमति नहीं है। महिलाएं मंदिर से काफी दूरी पर बैठकर पूजा करती हैं और वहीं से मां का आशीर्वाद लेने की मान्यता है।
मंदिर की यह परंपरा सुनने में भले ही अलग लगे, लेकिन देश के अलग-अलग हिस्सों में कई धार्मिक स्थलों पर विशेष समय या विशेष पूजा पद्धति से जुड़े नियम देखने को मिलते हैं। कहीं कुछ दिनों के लिए प्रवेश प्रतिबंधित होता है, तो कहीं गर्भगृह में प्रवेश को लेकर अलग नियम होते हैं। उदाहरण के लिए बिहार के नालंदा स्थित मां आशापुरी मंदिर में भी कुछ धार्मिक अवसरों के दौरान महिलाओं के प्रवेश से जुड़ी विशेष परंपरा का उल्लेख मिलता है। वहां भी स्थानीय धार्मिक मान्यता और विशेष पूजा पद्धति को इसके पीछे वजह बताया जाता है।
कसमार के मां मंगलचंडी मंदिर की पहचान भी इसी तरह की स्थानीय धार्मिक परंपरा से बनी है। मंदिर में पूजा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए मां की आस्था सबसे महत्वपूर्ण है। महिलाएं मंदिर के भीतर प्रवेश नहीं करतीं, लेकिन बाहर से ही पूजा-अर्चना कर अपनी श्रद्धा व्यक्त करती हैं। कई बार किसी धार्मिक परंपरा का महत्व उसके नियमों से ज्यादा उस पर लोगों की आस्था और विश्वास से जुड़ा होता है। इस मंदिर के मामले में भी स्थानीय समुदाय इस परंपरा को लंबे समय से निभाता आया है।
मंदिर से जुड़ी मान्यता के कारण यहां आने वाले लोगों के लिए भी कुछ नियमों का पालन महत्वपूर्ण माना जाता है। श्रद्धालु मंदिर परिसर की धार्मिक मर्यादा का ध्यान रखते हैं और स्थानीय लोगों से मंदिर की परंपरा के बारे में जानकारी लेकर उसी के अनुरूप पूजा करते हैं। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी यह जरूरी होता है कि वे स्थानीय धार्मिक भावनाओं और मंदिर समिति या पुजारियों की व्यवस्था का सम्मान करें।
महिलाओं के मंदिर के अंदर प्रवेश पर रोक की यह परंपरा आज के समय में चर्चा का विषय इसलिए भी बनती है क्योंकि धार्मिक स्थलों में महिलाओं की भागीदारी और प्रवेश को लेकर देशभर में अलग-अलग मत और परंपराएं रही हैं। कुछ मंदिरों में महिलाओं के लिए विशेष नियम हैं, तो कुछ स्थानों पर किसी खास धार्मिक अनुष्ठान के दौरान प्रवेश सीमित किया जाता है। वहीं कई मंदिरों में महिलाओं को पूजा और धार्मिक गतिविधियों में पुरुषों के बराबर भागीदारी मिलती है। कसमार का मां मंगलचंडी मंदिर अपनी अलग स्थानीय परंपरा के कारण इस विषय में विशेष स्थान रखता है।
स्थानीय लोगों की मानें तो इस परंपरा को लेकर गांव में किसी तरह का नया विवाद नहीं है और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यता का सामान्य रूप से पालन किया जाता है। महिलाओं के लिए मंदिर से बाहर निर्धारित दूरी पर पूजा करने की व्यवस्था इसी परंपरा का हिस्सा मानी जाती है। इस कारण मंदिर आने वाली महिलाएं भी बाहर से ही मां के दर्शन और आराधना करती हैं।
मंदिर की धार्मिक पहचान के साथ-साथ इससे जुड़ी लोक आस्था भी महत्वपूर्ण है। ग्रामीण इलाकों में देवी मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं होते, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी हिस्सा होते हैं। पर्व-त्योहारों के दौरान यहां ग्रामीणों की मौजूदगी बढ़ जाती है। लोग पूजा, प्रसाद और धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होते हैं। ऐसे में मंदिर से जुड़ी कोई भी पुरानी परंपरा स्थानीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बन जाती है।
कसमार का यह मंदिर भी इसी लोक आस्था और परंपरा से जुड़ा हुआ बताया जाता है। मां मंगलचंडी के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था के कारण यहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना होती है। महिलाओं का मंदिर के अंदर प्रवेश नहीं करना इस मंदिर की सबसे अलग विशेषताओं में गिना जाता है। बाहर से आने वाले लोगों के लिए यह परंपरा चौंकाने वाली हो सकती है, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह लंबे समय से चली आ रही धार्मिक व्यवस्था है।
हालांकि मंदिर के करीब 200 वर्ष पुराने होने और महिलाओं के प्रवेश पर रोक की शुरुआत को लेकर जो बातें कही जाती हैं, उन्हें स्थानीय मान्यता के रूप में देखना उचित होगा। किसी परंपरा की वास्तविक ऐतिहासिक शुरुआत को प्रमाणित करने के लिए पुराने दस्तावेज, शिलालेख या अन्य ऐतिहासिक साक्ष्य जरूरी होते हैं। उपलब्ध जानकारी मुख्य रूप से स्थानीय मान्यता और मंदिर से जुड़े लोगों द्वारा बताई गई परंपरा पर आधारित है। इसलिए इसे निश्चित ऐतिहासिक तथ्य के बजाय स्थानीय धार्मिक विश्वास के तौर पर प्रस्तुत किया जाना अधिक उचित है।
मां मंगलचंडी मंदिर की यह अनोखी परंपरा एक बार फिर बताती है कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक आस्थाओं और मंदिरों की परंपराओं में कितनी विविधता है। एक ही देवी की पूजा अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग विधियों और मान्यताओं के साथ की जाती है। कसमार का यह मंदिर भी अपनी विशिष्ट परंपरा के कारण लोगों का ध्यान आकर्षित करता है।
सबसे खास बात यह है कि मंदिर के नियमों के बावजूद महिलाओं की आस्था मंदिर से जुड़ी हुई है। वे मंदिर से दूर बैठकर ही मां की पूजा करती हैं और धार्मिक अनुष्ठान में अपनी श्रद्धा व्यक्त करती हैं। इस तरह मंदिर की पुरानी परंपरा और श्रद्धालुओं की आस्था दोनों साथ-साथ आगे बढ़ रहे हैं।
बोकारो के कसमार क्षेत्र में स्थित मां मंगलचंडी मंदिर आने वाले समय में भी अपनी इस विशिष्ट धार्मिक परंपरा के कारण लोगों के बीच चर्चा में बना रह सकता है। करीब दो शताब्दी पुरानी बताई जाने वाली यह मान्यता स्थानीय लोगों के लिए केवल मंदिर का नियम नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा है। मंदिर में महिलाओं और बच्चियों के प्रवेश पर रोक तथा बाहर से पूजा करने की व्यवस्था इसकी सबसे प्रमुख विशेषताओं में शामिल है।










