कनाडा ने Bill C-9 में संशोधन करते हुए धार्मिक स्वास्तिक को नाजी प्रतीक से अलग कर दिया है। समिति ने कानून के मसौदे से ‘Swastika’ शब्द हटाकर स्पष्ट किया कि यह कदम केवल नफरत फैलाने वाले हकेनक्रॉइज जैसे प्रतीकों पर लागू होगा। बदलाव से हिंदू, जैन और बौद्ध समुदायों की धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान को कानूनी सुरक्षा मिली है।
Canada Swastika Controversy Update: कनाडा में 10 दिसंबर 2025 को संसद की स्थायी समिति ने Bill C-9 में बड़ा बदलाव करते हुए यह स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वास्तिक को नाजी प्रतीक नहीं माना जाएगा। संशोधन के तहत मसौदे से ‘Swastika’ शब्द हटाया गया, ताकि कानून केवल घृणा-प्रेरित हकेनक्रॉइज जैसे प्रतीकों पर लागू हो। यह निर्णय इसलिए जरूरी हुआ क्योंकि हिंदू, जैन और बौद्ध समुदायों ने चिंता जताई थी कि धार्मिक प्रतीक को गलत संदर्भ में लेने से सांस्कृतिक स्वतंत्रता और पूजा-स्थलों पर असर पड़ सकता है।
धार्मिक स्वास्तिक को क्यों मिली कानूनी सुरक्षा
नया संशोधन साफ करता है कि हिंदू-जैन-बौद्ध परंपराओं में प्रयुक्त स्वास्तिक किसी भी रूप में घृणा प्रतीक की श्रेणी में नहीं आता। समिति ने माना कि स्वास्तिक का इतिहास हजारों साल पुराना है और यह शुभता, शांति और मंगलकामना का प्रतीक है, जिसका नाजी प्रतीक से कोई संबंध नहीं है।
कई धार्मिक संगठनों और विशेषज्ञों ने दलील दी थी कि गलतफहमी दूर करना आवश्यक है, ताकि मंदिर, सांस्कृतिक कार्यक्रम और धार्मिक उत्सव अनावश्यक जांच के डर में न रहें। संशोधन के बाद इन प्रतीकों पर कानूनी कार्रवाई का खतरा पूरी तरह टल गया है और धार्मिक स्वतंत्रता को मजबूती मिली है।

विवाद कैसे शुरू हुआ और क्यों बढ़ा
Bill C-9 के शुरुआती मसौदे में ‘Swastika’ का उल्लेख था, जिसे पश्चिमी देशों में अक्सर नाजी प्रतीक के रूप में समझा जाता है। इस समानता को लेकर हिंदू समुदाय ने चिंता जताई कि क्या धार्मिक स्थानों में मौजूद स्वास्तिक को नफरत से जोड़कर आपत्ति दर्ज की जा सकती है।
इस विवाद ने इंटरफेथ संगठनों का ध्यान खींचा और कई यहूदी मानवाधिकार समूहों ने भी स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वास्तिक और नाजी प्रतीक में समानता बताना ऐतिहासिक रूप से गलत है। व्यापक समर्थन मिलने के बाद समिति ने कानून में बड़ी सुधारात्मक कार्रवाई की।
Bill C-9 का असली उद्देश्य क्या है
कनाडा सरकार का कहना है कि Bill C-9 का लक्ष्य धार्मिक आस्था पर प्रतिबंध लगाना नहीं, बल्कि घृणा-आधारित प्रतीकों और अपराधों की स्पष्ट परिभाषा तय करना है। इसका मकसद उन प्रतीकों पर कार्रवाई करना है, जिन्हें नफरत फैलाने या समुदायों को डराने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
इसी वजह से धार्मिक प्रतीकों को इस कानून के दायरे से बाहर रखना जरूरी माना गया, ताकि घृणा अपराधों पर सख्ती के साथ-साथ आस्था की स्वतंत्रता भी सुरक्षित रह सके। यह कदम बहुसांस्कृतिक समाज में संतुलन बनाए रखने का प्रयास माना जा रहा है।








