धन केवल एक साधन है, साध्य नहीं। यदि धन का उपयोग अपनी और दूसरों की भलाई के लिए न किया जाए, तो वह केवल धातु के एक टुकड़े या कागज के रद्दी के समान है। यह कहानी एक ऐसे कंजूस व्यक्ति की है जिसने अपनी पूरी जिंदगी धन जोड़ने में बिता दी, लेकिन वह कभी यह नहीं समझ पाया कि असली संपत्ति वह है जो काम आए।
कहानी
एक गाँव में 'धनराज' नाम का एक बहुत ही अमीर लेकिन बेहद कंजूस आदमी रहता था। उसके पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन वह अपनी जरूरत की चीजों पर भी एक पैसा खर्च नहीं करता था। वह फटे-पुराने कपड़े पहनता और बहुत ही साधारण भोजन करता था। गाँव के लोग उसे 'मक्खीचूस' कहकर पुकारते थे।
धनराज को किसी भी चीज से इतना प्यार नहीं था जितना उसे अपने सोने के सिक्कों से था। उसने अपनी सारी संपत्ति बेचकर सोने का एक बहुत बड़ा 'बिस्कुट' (ईंट) खरीदा था। उसे डर था कि कोई उसे चुरा न ले, इसलिए उसने अपने घर के पीछे एक सुनसान जगह पर गड्ढा खोदा और उस सोने को वहां गाड़ दिया।
हर रोज आधी रात को, जब पूरा गाँव सो जाता, धनराज चुपके से अपने पिछवाड़े जाता। वह पत्थर हटाकर गड्ढा खोदता और उस सोने को बाहर निकालता। वह उसे घंटों निहारता, उसे चूमता और फिर से वापस गाड़ देता। ऐसा करने से उसे बहुत सुकून मिलता था। उसे लगता था कि वह दुनिया का सबसे भाग्यशाली आदमी है।
एक दिन, गाँव का एक चोर धनराज का पीछा कर रहा था। उसने देखा कि धनराज रोज रात को उस गड्ढे के पास जाता है और कुछ कीमती चीज बाहर निकालता है। चोर ने अनुमान लगाया कि वहां जरूर कोई बड़ा खजाना छिपा है। अगली रात, जैसे ही धनराज अपने घर में गहरी नींद में सोया, चोर वहां पहुँचा और उसने सोने की वह ईंट निकाल ली। चोर ने सोने की जगह एक भारी 'पत्थर' वहां रख दिया और गड्ढा वापस भर दिया।
अगली रात जब धनराज हमेशा की तरह अपने खजाने को देखने पहुँचा, तो उसने देखा कि सोने की ईंट गायब है। उसकी जगह मिट्टी से भरा एक बड़ा पत्थर पड़ा था। धनराज के होश उड़ गए। वह जोर-जोर से रोने और चिल्लाने लगा। उसकी चीखें सुनकर पड़ोसी जाग गए और वहां इकट्ठा हो गए।
एक पड़ोसी ने पूछा, 'क्या हुआ धनराज? तुम इतना क्यों चिल्ला रहे हो?'
धनराज ने रोते हुए कहा, 'मेरा सब कुछ लुट गया! मेरा सोना चोरी हो गया! मैंने उसे यहाँ गाड़ा था, पर अब यहाँ सिर्फ पत्थर बचा है।'
तभी एक बुद्धिमान बुजुर्ग, जो धनराज की कंजूसी के बारे में जानते थे, आगे आए। उन्होंने पूछा, 'धनराज, तुम उस सोने का करते क्या थे? क्या तुमने उससे कभी कुछ खरीदा या किसी की मदद की?'
धनराज ने सिसकते हुए कहा, 'नहीं, मैं उसे खर्च नहीं करता था। मैं तो बस उसे रोज देखता था और वापस रख देता था।'
बुजुर्ग मुस्कुराए और बोले, 'फिर दुखी क्यों होते हो? इस पत्थर को वापस गाड़ दो और रोज आकर इसे देखा करो। तुम्हारे लिए तो सोना और पत्थर दोनों बराबर ही हैं। क्योंकि तुमने उस सोने का उपयोग कभी किया ही नहीं, वह बस एक ऐसी चीज थी जिसे तुम देख सकते थे। जो धन काम न आए, वह पत्थर ही तो है।'
धनराज को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसे समझ आ गया कि धन की असली कीमत उसके 'उपयोग' में है, उसे सिर्फ इकट्ठा करने में नहीं।
सीख
धन की उपयोगिता उसके संचय (इकट्ठा करने) में नहीं, बल्कि उसके सही उपयोग में होती है। यदि आप अपनी संपत्ति का उपयोग अपने जीवन को बेहतर बनाने या दूसरों की मदद करने में नहीं करते, तो वह आपके लिए बिल्कुल बेकार है। बिना उपयोग के धन केवल मिट्टी और पत्थर के समान है।











