मद्रास हाईकोर्ट ने चुनाव प्रचार में बच्चों के जरिए परिवारों को वोट के लिए प्रभावित करने के मुद्दे पर संसद में बहस की जरूरत बताई। अदालत ने बच्चों से बनवाई गई राजनीतिक सोशल मीडिया रील्स को अनुचित बताया।
चेन्नई: भारत में चुनाव प्रचार के दौरान बच्चों की भूमिका और सोशल मीडिया पर राजनीतिक संदेश फैलाने के लिए उनके इस्तेमाल को लेकर मद्रास हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि इस बात पर देश और संसद में बहस होनी चाहिए कि क्या राजनीतिक नेताओं को बच्चों से उनके परिवार के वयस्क सदस्यों को किसी खास पार्टी के पक्ष में वोट देने के लिए प्रभावित करने की अपील करनी चाहिए। अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि क्या माता-पिता को ऐसे घरेलू दृश्यों की वीडियो रील बनाकर सोशल मीडिया पर प्रचार के लिए साझा करना उचित है। न्यायमूर्ति डी. भरत चक्रवर्ती ने बच्चों को चुनावी गतिविधियों में शामिल करने और उनसे घर में परिवार के सदस्यों पर वोट देने का दबाव बनाने जैसे दृश्य तैयार करवाने पर नाराजगी जताई। अदालत के अनुसार, इस तरह की गतिविधियां अनुचित हैं और सोशल मीडिया पर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए बच्चों का इस्तेमाल खराब अभिभावकीय व्यवहार को दर्शाता है।
यह टिप्पणी 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से जुड़े एक चुनाव याचिका मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) के अध्यक्ष और मौजूदा मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने चुनाव प्रचार के दौरान बच्चों से अपने परिवार के वयस्क सदस्यों को उनकी पार्टी के उम्मीदवारों के पक्ष में वोट देने के लिए कहने की अपील की थी।
बच्चों के जरिए वोट प्रभावित करने पर अदालत की चिंता
मद्रास हाईकोर्ट ने बच्चों को राजनीतिक प्रचार में शामिल करने के तरीके पर सवाल उठाया। न्यायमूर्ति चक्रवर्ती ने कहा कि छोटे बच्चों को चुनावी गतिविधियों में शामिल करना और उनसे घर पर परिवार के सदस्यों को प्रभावित करने वाले दृश्य तैयार करवाना अनुचित है।
अदालत की टिप्पणी का मुख्य केंद्र बच्चों की राजनीतिक समझ या उनकी स्वतंत्र राय नहीं, बल्कि उनका इस्तेमाल करके परिवार के वयस्क सदस्यों पर चुनावी दबाव बनाने की कोशिश थी। जब बच्चों को किसी राजनीतिक दल के समर्थन में संदेश देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और फिर उन दृश्यों को सोशल मीडिया पर साझा किया जाता है, तो यह सवाल उठता है कि क्या उनकी सहजता का इस्तेमाल राजनीतिक प्रचार के लिए किया जा रहा है।
अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों पर व्यापक सामाजिक चर्चा की जरूरत है। यह केवल किसी एक पार्टी या उम्मीदवार का मुद्दा नहीं, बल्कि चुनाव प्रचार की सीमाओं, बच्चों की सुरक्षा और अभिभावकों की जिम्मेदारी से जुड़ा सवाल है।
सोशल मीडिया रील्स पर भी उठाए सवाल
मामले में बच्चों के ऐसे वीडियो का उल्लेख किया गया, जिनमें वे अपने माता-पिता या परिवार के अन्य वयस्क सदस्यों से TVK को वोट देने की बात कहते दिखाई देते हैं। याचिका से जुड़े विवरण के मुताबिक, माता-पिता ने ऐसे वीडियो बनाकर YouTube पर साझा किए थे।
न्यायमूर्ति चक्रवर्ती ने इन वीडियो को खराब रुचि वाला बताते हुए कहा कि बच्चों से इस तरह की गतिविधियां करवाना खराब अभिभावकीय व्यवहार को दर्शाता है। अदालत ने इसे राजनीतिक उद्देश्य से सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का तरीका भी बताया।
सोशल मीडिया के दौर में छोटे वीडियो और रील्स राजनीतिक संदेशों को तेजी से फैलाने का माध्यम बन गए हैं। चुनावी प्रचार के दौरान ऐसे कंटेंट की पहुंच बड़ी संख्या में लोगों तक हो सकती है। लेकिन यदि इसमें बच्चों को किसी खास दल के पक्ष में परिवार के सदस्यों पर दबाव बनाने की भूमिका दी जाती है, तो इसके नैतिक और सामाजिक प्रभावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालांकि, अदालत की टिप्पणी को इस मामले में सोशल मीडिया पर मौजूद हर राजनीतिक वीडियो के बारे में सामान्य निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए। टिप्पणी का संदर्भ चुनाव याचिका में लगाए गए विशिष्ट आरोप और बच्चों से जुड़ी प्रचार सामग्री थी।
संसद तय करे कि क्या ऐसे मामलों में कानून होना चाहिए
मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि संसद को इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या चुनाव के दौरान बच्चों के जरिए परिवार के सदस्यों को प्रभावित करने की कोशिश को उम्मीदवार का चुनाव रद्द करने का आधार बनाया जाना चाहिए।
यह टिप्पणी चुनावी कानूनों के संभावित दायरे से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल उठाती है। मौजूदा मामले में अदालत ने इस तरह की गतिविधियों को चुनाव रद्द करने का स्वतः लागू आधार घोषित नहीं किया। इसके बजाय उसने कहा कि ऐसे आचरण के कानूनी परिणाम तय करने का विषय व्यापक विधायी चर्चा का हिस्सा होना चाहिए।
यदि संसद इस मुद्दे पर विचार करती है, तो उसे कई पहलुओं का संतुलन देखना होगा। इनमें राजनीतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, चुनाव प्रचार के नियम, बच्चों के अधिकार और उम्मीदवारों की जिम्मेदारी शामिल हो सकते हैं।
साथ ही, यह भी स्पष्ट करना होगा कि किस तरह की गतिविधि को अनुचित चुनावी प्रभाव माना जाए, उसका प्रमाण कैसे जुटाया जाए और किन परिस्थितियों में किसी उम्मीदवार के निर्वाचन को चुनौती दी जा सके। फिलहाल, अदालत की टिप्पणी इस विषय पर बहस की जरूरत को रेखांकित करती है; यह अपने आप में किसी नए कानून की घोषणा नहीं है।
TVK और मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय से जुड़ा मामला
यह विवाद तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 से जुड़ी एक चुनाव याचिका के दौरान उठा। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि TVK प्रमुख और मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने चुनाव प्रचार के दौरान बच्चों से अपने परिवार के वयस्क सदस्यों को उनकी पार्टी के उम्मीदवारों को वोट देने के लिए कहने की अपील की थी।
इस आरोप के संदर्भ में अदालत ने बच्चों को चुनावी प्रचार में शामिल करने के व्यापक मुद्दे पर टिप्पणी की। हालांकि, किसी याचिका में लगाए गए आरोप को अदालत द्वारा अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता। मामले में आरोपों की कानूनी स्थिति और अंतिम निर्णय को अलग-अलग समझना जरूरी है।
राजनीतिक दलों के प्रचार में परिवारों, युवाओं और पहली बार मतदान करने वालों तक पहुंचना आम रणनीति का हिस्सा हो सकता है। लेकिन बच्चों को माध्यम बनाकर परिवार के वयस्कों पर दबाव डालने का आरोप इस सवाल को जन्म देता है कि राजनीतिक संदेश पहुंचाने और बच्चों को प्रचार के लिए इस्तेमाल करने के बीच सीमा कहां तय होनी चाहिए।
चुनावी प्रक्रिया में बच्चों के अधिकार क्यों महत्वपूर्ण हैं?
बच्चों को राजनीतिक विचारों से परिचित होना या अपने परिवार में चुनाव पर चर्चा सुनना अपने आप में अनुचित नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में परिवार और समाज के भीतर राजनीतिक बातचीत सामान्य है। चिंता तब पैदा होती है, जब बच्चों को किसी राजनीतिक उद्देश्य के लिए ऐसी भूमिका निभाने को कहा जाता है जिसमें उनसे वयस्कों पर दबाव डालने या किसी दल के समर्थन में प्रचार करने की अपेक्षा की जाए।
ऐसी गतिविधियों में बच्चे अपनी स्वतंत्र इच्छा से भाग ले रहे हैं या उन्हें लोकप्रियता और राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, यह महत्वपूर्ण प्रश्न है। माता-पिता की जिम्मेदारी केवल बच्चों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है; उन्हें यह भी ध्यान रखना होता है कि सोशल मीडिया पर साझा की जाने वाली सामग्री बच्चों की निजता और भलाई को प्रभावित न करे।
राजनीतिक दलों के लिए भी यह जरूरी है कि प्रचार की रणनीतियां बच्चों की संवेदनशीलता का अनुचित लाभ न उठाएं। चुनावी प्रतिस्पर्धा में संदेशों को प्रभावी बनाने की कोशिश और बच्चों को राजनीतिक दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करने के बीच अंतर बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
आगे क्या होगा?
मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी ने चुनाव प्रचार के नैतिक मानकों और कानूनी सीमाओं पर बहस को फिर सामने ला दिया है। अदालत ने इस विषय को संसद और व्यापक समाज के विचार के लिए महत्वपूर्ण बताया है। खास तौर पर यह सवाल उठाया गया है कि बच्चों को परिवार के सदस्यों को किसी पार्टी के पक्ष में वोट देने के लिए प्रेरित करने में शामिल करना स्वीकार्य होना चाहिए या नहीं।
फिलहाल, इस टिप्पणी से किसी नए कानूनी प्रतिबंध के लागू होने का संकेत नहीं मिलता। ऐसे बदलाव के लिए संसद को कानून में संशोधन या नई व्यवस्था पर विचार करना होगा। साथ ही, किसी चुनाव को रद्द करने जैसे गंभीर परिणाम के लिए स्पष्ट कानूनी आधार और उचित न्यायिक प्रक्रिया आवश्यक होगी।
इस मामले का व्यापक महत्व यह है कि डिजिटल प्रचार और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बढ़ते दौर में बच्चों की भूमिका पर स्पष्ट सामाजिक और कानूनी मानक विकसित करने की जरूरत महसूस की जा रही है। अदालत की टिप्पणी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण चर्चा को सामने लाती है।








