बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की इस महीने के अंत में संभावित जापान यात्रा से पहले टोक्यो ने बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में औद्योगिक संपर्क बढ़ाने की योजना बनाई है।
Maitri Setu and Matarbari Port: भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को बांग्लादेश के मातारबारी गहरे समुद्र वाले बंदरगाह से जोड़ने की योजना क्षेत्रीय व्यापार और संपर्क के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जापान इस परियोजना के जरिए बांग्लादेश को औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित करने और बंगाल की खाड़ी के आसपास आर्थिक सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं तलाश रहा है।
हालांकि, भारत और बांग्लादेश के बीच राजनीतिक अनिश्चितता के कारण त्रिपुरा को बांग्लादेश से जोड़ने वाला मैत्री सेतु अब तक अपेक्षित कनेक्टिविटी का लाभ नहीं दे पाया है। ऐसे में मातारबारी बंदरगाह और मैत्री सेतु को एक व्यापक क्षेत्रीय संपर्क नेटवर्क से जोड़ने की संभावनाओं पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।
मैत्री सेतु परियोजना क्यों है महत्वपूर्ण?
भारत और बांग्लादेश के बीच संपर्क बढ़ाने के उद्देश्य से फेनी नदी पर मैत्री सेतु का निर्माण किया गया था। करीब 1.9 किलोमीटर लंबा यह पुल भारत के त्रिपुरा राज्य के सबरूम को बांग्लादेश के रामगढ़ से जोड़ता है। इसका उद्घाटन 9 मार्च 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने किया था।
इस पुल से भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र और बांग्लादेश के चटगांव क्षेत्र के बीच व्यापारिक संपर्क मजबूत करने की संभावनाएं पैदा हुई थीं। इसके माध्यम से भारतीय सामान को बांग्लादेश के बंदरगाहों तक पहुंचाने और क्षेत्रीय व्यापार के लिए वैकल्पिक मार्ग विकसित करने की उम्मीद थी। हालांकि, पुल का उद्घाटन होने के बावजूद इसके जरिए प्रस्तावित व्यापारिक और परिवहन गतिविधियों को पूरी क्षमता से आगे बढ़ाने में चुनौतियां बनी हुई हैं। भारत-बांग्लादेश संबंधों में बदलाव और संबंधित व्यवस्थाओं की जरूरतों ने इस संपर्क मार्ग की संभावनाओं को प्रभावित किया है।
मातारबारी बंदरगाह पर जापान का जोर
बांग्लादेश में विकसित किया जा रहा मातारबारी डीप-सी पोर्ट जापान के सहयोग से आगे बढ़ने वाली प्रमुख बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में शामिल है। जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (JICA) इस परियोजना को वित्तीय सहायता प्रदान कर रही है। बंदरगाह का उद्देश्य बांग्लादेश की समुद्री माल ढुलाई क्षमता बढ़ाना और बड़े जहाजों के लिए बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना है। फिलहाल, बड़े जहाजों से संबंधित कुछ व्यापारिक गतिविधियों के लिए बांग्लादेश को सिंगापुर और कोलंबो जैसे क्षेत्रीय बंदरगाहों पर निर्भर रहना पड़ता है।
परियोजना पूरी होने पर मातारबारी बंदरगाह बांग्लादेश के समुद्री व्यापार को नई दिशा दे सकता है। इसके साथ ही औद्योगिक क्षेत्र, परिवहन नेटवर्क और व्यापारिक केंद्र विकसित होने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलने की संभावना है।
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पूर्वोत्तर भारत को मिलेगा व्यापार का नया रास्ता
जापान की व्यापक योजना मातारबारी बंदरगाह को एक ऐसे औद्योगिक नेटवर्क का हिस्सा बनाने की है, जो बांग्लादेश के साथ भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और आसपास के देशों को बेहतर संपर्क उपलब्ध करा सके। इस नेटवर्क से भूटान, नेपाल और म्यांमार जैसे देशों के साथ क्षेत्रीय व्यापार बढ़ाने की संभावनाएं भी तलाश की जा रही हैं।
भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए समुद्री बंदरगाहों तक बेहतर पहुंच विशेष महत्व रखती है। बेहतर सड़क, रेल और सीमा-पार परिवहन सुविधाएं मिलने पर माल की आवाजाही आसान हो सकती है। इससे व्यापारियों को परिवहन के वैकल्पिक रास्ते मिलेंगे और क्षेत्रीय उद्योगों को व्यापक बाजारों तक पहुंचने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, इन लाभों को हासिल करने के लिए सीमा शुल्क प्रक्रियाओं, परिवहन समझौतों, सीमा प्रबंधन और दोनों देशों के बीच समन्वय को मजबूत करना जरूरी होगा।
बैंकॉक मॉडल से प्रेरित है जापान की योजना
जापान इस परियोजना के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया में विकसित क्षेत्रीय आर्थिक गलियारों से भी प्रेरणा ले रहा है। थाईलैंड, कंबोडिया और वियतनाम के बीच औद्योगिक और परिवहन संपर्क बढ़ाने वाली पहलों को इस संदर्भ में उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है। जापानी अधिकारियों के अनुसार, मातारबारी बंदरगाह के आसपास औद्योगिक और वाणिज्यिक गतिविधियां विकसित करके बांग्लादेश को क्षेत्रीय उत्पादन और व्यापार के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित करने की क्षमता है।
इसी दिशा में महेशखाली-मातारबारी एकीकृत बुनियादी ढांचा विकास पहल को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके तहत बंदरगाह, उद्योग और वाणिज्य से जुड़ी सुविधाओं को एक साथ विकसित करने की परिकल्पना है।









