महिला आरक्षण पर बड़ा फैसला, संसद में जल्द आ सकता है संशोधन बिल, जानें कब से होगा लागू

महिला आरक्षण 2029 से लागू करने की तैयारी तेज, सरकार संशोधन बिल लाने की योजना में। विपक्ष से सहमति बनाने की कोशिश, जनगणना और परिसीमन अहम भूमिका निभाएंगे।

सरकार महिला आरक्षण को 2034 के बजाय 2029 से लागू करने की तैयारी कर रही है। संशोधन बिल लाने की प्रक्रिया तेज है, जबकि जनगणना और परिसीमन इस योजना के क्रियान्वयन में अहम भूमिका निभाएंगे।

New Delhi: महिला आरक्षण को लेकर केंद्र सरकार ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करने के संकेत दिए हैं। अब तक यह प्रावधान 2034 से लागू करने की योजना थी, लेकिन अब सरकार इसे आगे बढ़ाकर 2029 के लोकसभा चुनाव से लागू करना चाहती है। इसी दिशा में महिला आरक्षण संशोधन बिल (Amendment Bill) लाने की तैयारी तेज कर दी गई है। सरकार इस फैसले को जल्द लागू करने के लिए विपक्षी दलों से लगातार बातचीत कर रही है, ताकि संसद के बजट सत्र में ही इस पर सहमति बनाकर विधेयक पेश किया जा सके और देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को जल्द बढ़ाया जा सके।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम में बदलाव

सरकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम (Nari Shakti Vandan Act) में संशोधन कर इस योजना को तेजी से लागू करना चाहती है। इस कानून के तहत संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है, लेकिन इसकी लागू होने की समयसीमा जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया से जुड़ी हुई थी। अब सरकार इस पूरी प्रक्रिया को तेज करने की तैयारी में है, ताकि 2029 के चुनाव से ही यह आरक्षण लागू किया जा सके और महिलाओं को राजनीति में अधिक प्रतिनिधित्व मिल सके।

बजट सत्र में बिल पेश करने की तैयारी

मौजूदा बजट सत्र (Budget Session) में ही इस संशोधन बिल को पेश करने की संभावना जताई जा रही है। इसके लिए सरकार ने विपक्षी नेताओं से संपर्क करना शुरू कर दिया है। गृहमंत्री अमित शाह और संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजीजू इस मुद्दे पर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। रिजीजू ने राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखकर इस विषय पर चर्चा की पहल की है, जिससे यह स्पष्ट है कि सरकार इस बिल को व्यापक राजनीतिक सहमति के साथ आगे बढ़ाना चाहती है।

जनगणना और परिसीमन की अहम भूमिका

महिला आरक्षण को 2029 से लागू करने के लिए 2027 की राष्ट्रीय जनगणना (Census) और परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया अहम मानी जा रही है। सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि जनगणना से पहले ही परिसीमन की प्रक्रिया शुरू कर दी जाए, ताकि नई सीटों का निर्धारण और आरक्षण का ढांचा समय पर तैयार हो सके।

यदि यह प्रक्रिया तय समय में पूरी हो जाती है, तो 2029 के लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण लागू करना संभव हो जाएगा और यह देश के चुनावी ढांचे में एक बड़ा बदलाव साबित होगा।

लोकसभा सीटों में संभावित बढ़ोतरी

इस प्रस्ताव के तहत लोकसभा की सीटों की संख्या में भी बड़ा इजाफा हो सकता है। वर्तमान में लोकसभा में कुल 543 सीटें हैं, लेकिन 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के लिए सीटों की संख्या बढ़ाकर लगभग 814 तक की जा सकती है। इस स्थिति में करीब 272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यह बदलाव न केवल संसद की संरचना को बदलेगा बल्कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को भी एक नई दिशा देगा और उन्हें नीति निर्माण में अधिक अवसर प्रदान करेगा।

राज्यों के लिए अलग व्यवस्था

महिला आरक्षण लागू करने के दौरान राज्यों के आकार और उनकी सीटों की संख्या को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग व्यवस्था बनाई जा सकती है। बड़े राज्यों में 33 प्रतिशत आरक्षण के हिसाब से सीटों में बढ़ोतरी की जाएगी, जबकि छोटे राज्यों, जहां केवल एक या दो लोकसभा सीटें हैं, वहां सीटों की संख्या नहीं बढ़ाई जाएगी। ऐसे राज्यों में बारी-बारी से सीटों को महिलाओं के लिए आरक्षित किया जाएगा, जिससे सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व का अवसर मिल सके और संतुलन बना रहे।

विपक्ष से समर्थन के संकेत

इस मुद्दे पर सरकार को विपक्ष से समर्थन मिलने के संकेत भी मिल रहे हैं। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दल पहले से ही महिला आरक्षण के पक्ष में रहे हैं और इसे जल्द लागू करने की मांग करते रहे हैं। कांग्रेस ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम के पारित होने के समय भी इसे तुरंत लागू करने की बात कही थी, जबकि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने हाल ही में 2029 से इसे लागू करने की मांग दोहराई थी। इससे यह संभावना बढ़ जाती है कि संसद में इस बिल को पास कराने में सरकार को व्यापक समर्थन मिल सकता है।

आरक्षण के भीतर कोटे की मांग

हालांकि कुछ क्षेत्रीय दलों की ओर से अलग मांगें भी सामने आ सकती हैं। समाजवादी पार्टी, राजद और द्रमुक जैसे दल महिला आरक्षण के भीतर ओबीसी, एससी और एसटी वर्ग के लिए अलग कोटा तय करने की मांग उठा सकते हैं। इन दलों का मानना है कि महिला आरक्षण के साथ सामाजिक न्याय को भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए, इसलिए आरक्षण के भीतर उप-कोटा (Sub-quota) जरूरी है। यह मुद्दा संसद में चर्चा का अहम विषय बन सकता है और बिल के अंतिम स्वरूप को प्रभावित कर सकता है।

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