मोहन भागवत का उपभोक्तावाद पर बड़ा बयान: '142 करोड़ भारतीय अमेरिकी जीवनशैली अपनाएं तो 6 पृथ्वी भी कम पड़ेंगी'

मोहन भागवत ने उपभोक्तावाद और अमेरिकी जीवनशैली पर बड़ा बयान दिया। कहा, 142 करोड़ भारतीय यही जीवनशैली अपनाएं तो 6 पृथ्वी भी कम पड़ेंगी। जानें पूरा बयान।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने अमेरिका की अत्यधिक उपभोक्तावादी संस्कृति पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की जीवनशैली मानवता और पर्यावरण के लिए टिकाऊ नहीं है।

Mohan Bhagwat on Consumerism: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने वैश्विक उपभोक्तावाद और संसाधनों के अत्यधिक दोहन को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि यदि भारत की 142 करोड़ आबादी अमेरिका जैसी जीवनशैली अपनाती है, तो मानवता की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक नहीं बल्कि छह पृथ्वियों की आवश्यकता होगी। उन्होंने आर्थिक विकास के साथ संयम, नैतिकता और सामूहिक कल्याण को जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।

दिल्ली में आयोजित 18वें बीएमएल मुंजाल अवार्ड्स समारोह को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि किसी भी देश की प्रगति केवल आर्थिक समृद्धि से नहीं मापी जानी चाहिए, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि उसका विकास समाज और पर्यावरण के लिए कितना टिकाऊ है।

अमेरिकी उपभोक्ता संस्कृति पर उठाए सवाल

अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि दुनिया के कई विकसित देशों की जीवनशैली प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक उपयोग पर आधारित है। उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां का उपभोग स्तर इतना अधिक है कि यदि पूरी दुनिया उसी मॉडल का अनुसरण करे, तो पृथ्वी के सीमित संसाधन पर्याप्त नहीं होंगे।

उन्होंने कहा कि भारत को आर्थिक विकास की दिशा में आगे बढ़ते हुए ऐसा मॉडल अपनाना चाहिए, जो संसाधनों के संतुलित उपयोग और पर्यावरणीय जिम्मेदारी पर आधारित हो।

आर्थिक विकास के साथ संयम जरूरी

मोहन भागवत का उपभोक्तावाद पर बड़ा बयान: '142 करोड़ भारतीय अमेरिकी जीवनशैली अपनाएं तो 6 पृथ्वी भी कम पड़ेंगी'

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि समृद्धि का अर्थ केवल अधिक उपभोग नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार, आर्थिक शक्ति के साथ नैतिक आचरण, सामाजिक जिम्मेदारी और दूसरों के हितों का ध्यान रखना भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता ने हमेशा 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' की भावना को महत्व दिया है। इस दृष्टिकोण में व्यक्तिगत लाभ के बजाय सामूहिक कल्याण को प्राथमिकता दी जाती है।

अपने भाषण में मोहन भागवत ने वैश्विक कूटनीति और देशों के बीच संबंधों पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कई बार अंतरराष्ट्रीय सहयोग रणनीतिक और आर्थिक हितों से प्रेरित होता है, जहां राष्ट्रीय स्वार्थ प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इसके विपरीत उन्होंने भारत की विदेश नीति और पड़ोसी देशों के प्रति सहयोगात्मक रवैये का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत ने विभिन्न अवसरों पर मानवीय सहायता और क्षेत्रीय सहयोग की भावना का परिचय दिया है।

उन्होंने मालदीव और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों की सहायता के उदाहरण देते हुए कहा कि भारत ने संकट के समय मानवीय जिम्मेदारी निभाने का प्रयास किया है।

भारत के विकास मॉडल पर जोर

भागवत ने कहा कि भारत को एक मजबूत आर्थिक शक्ति बनने की आवश्यकता है, क्योंकि वैश्विक स्तर पर प्रभावी भूमिका निभाने के लिए आर्थिक और रणनीतिक क्षमता महत्वपूर्ण होती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि केवल शक्ति पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार, यदि शक्ति के साथ नैतिक मूल्यों और चरित्र का संतुलन न हो, तो उसका परिणाम विनाशकारी हो सकता है। उन्होंने कहा कि भारत का विकास ऐसा होना चाहिए, जो आर्थिक प्रगति के साथ सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी को भी साथ लेकर चले।

विशेषज्ञों का मानना है कि संसाधनों के अत्यधिक दोहन और बढ़ती उपभोक्ता संस्कृति को लेकर दुनिया भर में चर्चा तेज हो रही है। जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा संकट और प्राकृतिक संसाधनों की सीमित उपलब्धता ने टिकाऊ विकास (Sustainable Development) को वैश्विक नीति का महत्वपूर्ण विषय बना दिया है।

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