असदुद्दीन ओवैसी ने RSS प्रमुख मोहन भागवत की तीन बच्चे पैदा करने की अपील पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने बेरोजगारी और युवाओं के भविष्य पर चिंता जताते हुए संघ की नीति पर सवाल उठाए।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत द्वारा तीन बच्चे पैदा करने की अपील ने राजनीतिक माहौल गरमा दिया है। AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि देश में नौजवानों को रोजगार नहीं मिल रहा और इसके बजाय आरएसएस बच्चों की संख्या बढ़ाने का दबाव डाल रहा है।
ओवैसी ने संघ की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही जनसंख्या नियंत्रण और छोटी फैमिली को देशभक्ति से जोड़कर प्रचार कर चुके हैं। उनका आरोप है कि संघ प्रमुख के बयान से जनता भ्रमित हो रही है और युवाओं के रोजगार पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
ओवैसी ने RSS की नीति पर उठाए सवाल
ओवैसी ने मोहन भागवत पर आरोप लगाया कि वे देश को गुमराह कर रहे हैं और युवाओं को नौकरी के अवसर देने की बजाय केवल जनसंख्या बढ़ाने की बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “आरएसएस की नीति हमेशा से दोगली रही है। आप 75 साल के हो चुके हैं और आरएसएस के लोग भी बैचलर रहना पसंद करते हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं और परिवारों पर बच्चों के जन्म का दबाव डालना गलत है और यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है। ओवैसी ने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में पीएम मोदी की पहल और संघ की अपील में विरोधाभास स्पष्ट है।
ओवैसी ने महुआ मोइत्रा के बयान पर तंज कसा
ओवैसी ने टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा के बयान का भी जिक्र किया और कहा कि किसी को भी गंभीर बयान देने से पहले अपने शब्दों की शालीनता का ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री की आलोचना करना जायज है, लेकिन अगर शालीनता की सीमा पार की जाए तो यह गलत और अश्लील होगा।
ओवैसी ने स्पष्ट किया कि राजनीतिक आलोचना में भी मर्यादा बनाए रखना आवश्यक है और किसी और की नकल करके सीमा पार करने की जरूरत नहीं है। उनका कहना था कि शालीनता और सम्मान के साथ बहस करना ही लोकतंत्र का सही तरीका है।
RSS प्रमुख के बयान से बढ़ी राजनीतिक हलचल
RSS प्रमुख के बयान ने जनसंख्या नीति और रोजगार के मुद्दे पर सियासी बहस को बढ़ावा दिया है। विपक्ष और नागरिक समाज की प्रतिक्रिया में यह देखा जा रहा है कि युवा और महिला वर्ग इस मुद्दे पर संवेदनशील हैं।
इस बयान के चलते सरकारी और राजनीतिक नीतियों पर सवाल उठेंगे और संभव है कि संसद या मीडिया में इस पर चर्चा बढ़े। यह मुद्दा न केवल जनसंख्या नियंत्रण, बल्कि रोजगार, महिला अधिकार और सामाजिक जिम्मेदारी के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है।