पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार हासिरानी रथ ने कांग्रेस के मिलन प्रधान को 1,22,753 वोटों से हराया। ममता बनर्जी ने कांग्रेस प्रत्याशी का समर्थन किया था। यह सीट शुभेंदु अधिकारी के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी।
नंदीग्राम: पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने बड़ी जीत दर्ज की है। भाजपा उम्मीदवार हासिरानी रथ ने कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को 1,22,753 वोटों के भारी अंतर से हराया। निर्वाचन आयोग के परिणामों के मुताबिक, इस जीत के साथ भाजपा ने नंदीग्राम में अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूत किया है। इस उपचुनाव पर पूरे बंगाल की नजरें थीं, क्योंकि यहां भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबले के साथ तृणमूल कांग्रेस (TMC) की रणनीति भी चर्चा में रही। ममता बनर्जी ने टीएमसी उम्मीदवार के चुनाव मैदान से हटने के बाद कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को समर्थन दिया था। इसके बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार को बड़ी हार का सामना करना पड़ा।
नंदीग्राम उपचुनाव में किसे कितने वोट मिले?
नंदीग्राम विधानसभा सीट पर 6 अक्टूबर 2026 को मतदान हुआ था, जबकि मतगणना 9 अक्टूबर को की गई। मतगणना पूरी होने के बाद भाजपा उम्मीदवार हासिरानी रथ को विजेता घोषित किया गया। उन्होंने कांग्रेस के मिलन प्रधान को 1,22,753 मतों से पराजित किया।
इस चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के उम्मीदवार शांतिगोपाल गिरि भी मैदान में थे। हालांकि, मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच रहा। भाजपा की जीत का अंतर इतना बड़ा रहा कि चुनाव परिणाम ने नंदीग्राम की राजनीति को एक बार फिर चर्चा में ला दिया।
नंदीग्राम पूर्व मेदिनीपुर जिले में स्थित विधानसभा क्षेत्र है। यह सीट पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऐतिहासिक महत्व रखती है। वर्ष 2007 के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन से लेकर 2021 के विधानसभा चुनाव तक, नंदीग्राम राज्य की राजनीति में कई बड़े बदलावों का केंद्र रहा है।
शुभेंदु अधिकारी के इस्तीफे से खाली हुई थी सीट
नंदीग्राम विधानसभा सीट पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी। 2026 के विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम और भवानीपुर, दोनों सीटों से जीत हासिल की थी। नियमों के मुताबिक, एक व्यक्ति विधानसभा की दो सीटों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। इसलिए उन्हें एक सीट छोड़नी थी।
शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर सीट अपने पास रखने का फैसला किया और नंदीग्राम से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद निर्वाचन आयोग को इस सीट पर उपचुनाव कराना पड़ा।
नंदीग्राम पहले भी शुभेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी के बीच राजनीतिक संघर्ष का केंद्र रहा है। 2021 के विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी को हराया था। इस वजह से यहां होने वाले प्रत्येक चुनाव को बंगाल की राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है।
2026 के उपचुनाव में भाजपा ने हासिरानी रथ को उम्मीदवार बनाया। दूसरी ओर, कांग्रेस ने मिलन प्रधान को मैदान में उतारा। चुनाव का परिणाम घोषित होने के बाद भाजपा ने इस सीट पर अपना प्रभाव बनाए रखने में सफलता हासिल की।
हासिरानी रथ कौन हैं? चंद्रनाथ रथ से क्या है रिश्ता?
भाजपा की विजेता उम्मीदवार हासिरानी रथ का नाम चुनाव के दौरान एक अन्य वजह से भी चर्चा में रहा। वह चंद्रनाथ रथ की मां हैं। चंद्रनाथ रथ, शुभेंदु अधिकारी के पूर्व निजी सहायक (PA) थे। रिपोर्टों के मुताबिक, चंद्रनाथ रथ की 4 मई 2026 को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उनकी हत्या के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में कानून-व्यवस्था और राजनीतिक हिंसा को लेकर बहस तेज हुई थी।
ऐसे राजनीतिक माहौल में हासिरानी रथ को भाजपा की ओर से उम्मीदवार बनाया गया। नंदीग्राम में उनकी जीत ने उन्हें राज्य के चर्चित राजनीतिक चेहरों में शामिल कर दिया है। हालांकि, चुनाव परिणाम को किसी एक घटना के प्रभाव से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा, क्योंकि मतदाताओं के फैसले के पीछे कई राजनीतिक, स्थानीय और सामाजिक कारण हो सकते हैं।
ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार को क्यों दिया समर्थन?
नंदीग्राम उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। टीएमसी ने शुरुआत में इस सीट पर अपना उम्मीदवार उतारा था, लेकिन पार्टी की उम्मीदवार ने चुनाव से पहले नाम वापस ले लिया। इसके बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को समर्थन देने का फैसला किया।
इस घटनाक्रम ने चुनावी समीकरण बदल दिए। टीएमसी के अपने उम्मीदवार के मैदान से हटने के बाद कांग्रेस प्रत्याशी को ममता बनर्जी का समर्थन मिला। राजनीतिक रूप से इसे भाजपा के खिलाफ विपक्षी सहयोग की कोशिश के रूप में देखा गया।
हालांकि, समर्थन मिलने के बावजूद मिलन प्रधान चुनाव जीतने में सफल नहीं हुए। भाजपा उम्मीदवार हासिरानी रथ ने उन्हें 1,22,753 मतों के अंतर से हराया। इस नतीजे से स्पष्ट हुआ कि राजनीतिक दलों के बीच समर्थन और चुनावी परिणाम के बीच सीधा संबंध मानकर नहीं चला जा सकता।
नंदीग्राम के नतीजे ने विपक्षी रणनीति पर भी सवाल खड़े किए हैं। लेकिन किसी एक सीट के परिणाम के आधार पर पूरे पश्चिम बंगाल में सभी विपक्षी दलों की स्थिति का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।
ममता के समर्थन के कुछ घंटे बाद गिरफ्तार हुए थे मिलन प्रधान
चुनाव से पहले मिलन प्रधान की गिरफ्तारी भी काफी चर्चा में रही। रिपोर्टों के अनुसार, ममता बनर्जी द्वारा कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देने की घोषणा के कुछ घंटे बाद प्रधान को गिरफ्तार किया गया था। उनकी गिरफ्तारी का संबंध 2007 के नंदीग्राम आंदोलन से जुड़े पुराने आपराधिक मामलों से बताया गया।
मामलों में गंभीर आरोप शामिल होने की जानकारी सामने आई थी। हालांकि, गिरफ्तारी या आरोप दर्ज होने का अर्थ यह नहीं है कि किसी व्यक्ति का अपराध अदालत में सिद्ध हो चुका है।
गिरफ्तारी के बाद मिलन प्रधान को कानूनी राहत के लिए अदालत का रुख करना पड़ा। कलकत्ता हाई कोर्ट ने उन्हें अंतरिम जमानत दी, जिससे उन्हें चुनाव लड़ने का अवसर मिला। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, यह राहत 21 अक्टूबर तक के लिए थी।
इस घटनाक्रम ने चुनावी माहौल में राजनीतिक विवाद को बढ़ा दिया था। कांग्रेस और टीएमसी की ओर से गिरफ्तारी के समय को लेकर सवाल उठाए गए, जबकि मामले को लंबित आपराधिक कार्यवाही के संदर्भ में भी देखा गया। राजनीतिक आरोपों और कानूनी तथ्यों के बीच अंतर करना जरूरी है।
नंदीग्राम में भाजपा की जीत के क्या हैं मायने?
नंदीग्राम का उपचुनाव केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं था। इसका महत्व इसलिए भी बढ़ गया था, क्योंकि यह क्षेत्र 2021 में ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी के बीच हुए चर्चित मुकाबले का केंद्र रहा था। 2026 में भी सीट खाली होने के बाद यहां हुए उपचुनाव पर राजनीतिक दलों की नजरें थीं।
भाजपा की हासिरानी रथ ने कांग्रेस उम्मीदवार को बड़े अंतर से हराकर सीट पर जीत दर्ज की। दूसरी ओर, ममता बनर्जी के समर्थन के बावजूद कांग्रेस प्रत्याशी को जीत नहीं मिली। इससे यह सवाल उठता है कि स्थानीय चुनावों में पार्टी संगठन, उम्मीदवार की छवि, क्षेत्रीय मुद्दे और मतदाताओं की प्राथमिकताएं किस तरह नतीजों को प्रभावित करती हैं।
उपचुनाव के परिणाम को पश्चिम बंगाल की राजनीति में भाजपा की मौजूदगी के संदर्भ में देखा जा सकता है। वहीं, कांग्रेस और टीएमसी के बीच इस सीट पर बने समीकरण का चुनावी नतीजे में बदलना संभव नहीं हुआ।












