नवरात्रि में कन्या पूजन की परंपरा देवी शक्ति की आराधना से जुड़ी है। धार्मिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है और माना जाता है कि छोटी कन्याएं देवी के विभिन्न रूपों का प्रतीक होती हैं। अष्टमी या नवमी के दिन उनकी पूजा कर प्रसाद खिलाने की परंपरा आज भी पूरे भारत में श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
Navratri Kanya Puja Tradition: भारत में नवरात्रि के दौरान अष्टमी या नवमी तिथि पर दो से नौ वर्ष की कन्याओं की पूजा करने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अनुष्ठान में छोटी कन्याओं को देवी शक्ति का स्वरूप मानकर घरों और मंदिरों में आमंत्रित किया जाता है। उनके चरण धोकर तिलक लगाया जाता है और हलवा-पूड़ी व चने का प्रसाद खिलाया जाता है। पौराणिक ग्रंथों जैसे Markandeya Purana और Devi Bhagavata Purana में भी इस परंपरा का उल्लेख मिलता है, जहां कन्याओं को देवी के अलग-अलग रूपों का प्रतीक बताया गया है।
कन्या पूजन की परंपरा कैसे शुरू हुई
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार कन्या पूजन की परंपरा का उल्लेख प्रमुख रूप से Markandeya Purana और Devi Bhagavata Purana में मिलता है। इन ग्रंथों में बताया गया है कि देवी दुर्गा ने कई बार बाल रूप धारण कर असुरों का नाश किया था। यही कारण है कि छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनकी पूजा करने की परंपरा विकसित हुई।
एक अन्य कथा के अनुसार कात्य वंश के ऋषि Rishi Katyayan ने देवी भगवती की कठोर तपस्या और मंत्र सिद्धि की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लेने की इच्छा व्यक्त की। बाद में देवी उनके वंश में जन्म लेकर Katyayani के रूप में प्रकट हुईं। इसी शक्ति ने आगे चलकर असुरों का अंत किया।
इतिहासकारों और धार्मिक परंपराओं के अनुसार कन्या पूजन की प्रथा व्यापक रूप से लगभग 14वीं से 16वीं सदी के बीच लोकप्रिय हुई। उस समय से यह नवरात्रि के प्रमुख अनुष्ठानों में शामिल हो गई और आज भी देश के अधिकांश हिस्सों में इसका पालन किया जाता है।

नवरात्रि में कन्या पूजन का महत्व
नवरात्रि के दौरान कन्या पूजन को देवी शक्ति की आराधना का विशेष माध्यम माना जाता है। इस अनुष्ठान में छोटी कन्याओं को घर बुलाकर उनके चरण धोए जाते हैं, माथे पर तिलक लगाया जाता है और उन्हें प्रसाद स्वरूप हलवा, पूड़ी और चने खिलाए जाते हैं।
धार्मिक मान्यता है कि ऐसा करने से देवी दुर्गा प्रसन्न होती हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है। इसके साथ ही कन्याओं को उपहार, वस्त्र या दक्षिणा देकर विदा किया जाता है। यह अनुष्ठान देवी के प्रति श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक माना जाता है।
कई परिवारों में नौ कन्याओं के साथ एक छोटे बालक को भी आमंत्रित किया जाता है, जिसे भैरव का स्वरूप माना जाता है। यह परंपरा शक्ति और शिव के संतुलन का प्रतीक मानी जाती है।
2 से 9 वर्ष की कन्याओं को क्या कहा जाता है
शास्त्रों के अनुसार नवरात्रि में दो से नौ वर्ष तक की कन्याओं को देवी के अलग-अलग रूपों का प्रतीक माना गया है। हर आयु की कन्या विशेष शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है।
दो वर्ष की कन्या को कुमारी कहा जाता है। तीन वर्ष की कन्या त्रिमूर्ति मानी जाती है, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश की संयुक्त शक्ति का प्रतीक है। चार वर्ष की कन्या कल्याणी कहलाती है, जिसे शुभ और मंगल का प्रतीक माना जाता है।
पांच वर्ष की कन्या रोहिणी के नाम से जानी जाती है, जो समृद्धि और विकास का संकेत मानी जाती है। छह वर्ष की कन्या कालिका कहलाती है, जो शक्ति और साहस का प्रतीक है।
सात वर्ष की कन्या चंडिका मानी जाती है, जो दुष्ट शक्तियों के विनाश का प्रतीक है। आठ वर्ष की कन्या शांभवी कहलाती है, जो शिव शक्ति से जुड़ी मानी जाती है। वहीं नौ वर्ष की कन्या को देवी दुर्गा का पूर्ण स्वरूप माना जाता है।
इसी कारण नवरात्रि के दौरान इन आयु वर्ग की कन्याओं की पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है।
कन्या पूजन की विधि और परंपराएं
कन्या पूजन आमतौर पर अष्टमी या नवमी तिथि को किया जाता है। इस दिन घर की साफ-सफाई कर पूजा स्थल तैयार किया जाता है। इसके बाद आमंत्रित कन्याओं के चरण धोकर उन्हें आसन पर बैठाया जाता है।
फिर उनके माथे पर तिलक लगाया जाता है और हाथों में मौली बांधी जाती है। इसके बाद उन्हें प्रसाद के रूप में हलवा, पूड़ी और काले चने खिलाए जाते हैं। कई लोग कन्याओं को उपहार के रूप में कपड़े, फल या मिठाई भी देते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया को देवी की पूजा का ही एक रूप माना जाता है। माना जाता है कि सच्चे मन से किए गए कन्या पूजन से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है।












