आज सुभाष चंद्र बोस की जयंती है। देश उनके अदम्य साहस और देशभक्ति को याद कर रहा है। बोस का झारखंड से खास लगाव था। उनकी झारखंड यात्राएं 1928 से शुरू होकर 1941 तक चलीं, जिसमें वे रांची से लेकर धनबाद तक कई जगह गए।
रांची: आज 23 जनवरी, 2026 को राष्ट्र नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती मना रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के इस महान नेता का झारखंड (तत्कालीन बिहार प्रांत का हिस्सा) से गहरा जुड़ाव रहा। 1928 से 1941 तक बोस ने जमशेदपुर, धनबाद, रामगढ़, रांची, देवघर, हजारीबाग और गोमो जैसे महत्वपूर्ण स्थानों का दौरा किया। इस दौरान वे मजदूर आंदोलनों में सक्रिय रूप से शामिल रहे और स्वतंत्रता संग्राम को मजबूती देने के लिए कई महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं सामाजिक पहल की।
नेताजी की झारखंड यात्रा सिर्फ राजनीतिक मजबूती तक सीमित नहीं थी। उन्होंने मजदूरों और आम जनता से सीधे संवाद किया, उनके हक की बात की और उग्र संघर्ष के लिए युवाओं को प्रेरित किया। उनकी इन यात्राओं ने झारखंड में स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी और स्थानीय लोगों के दिलों में क्रांतिकारी चेतना जागृत की।
जमशेदपुर: 1928 की शुरुआत
1928 में बोस पहली बार जमशेदपुर आए। वे टाटा स्टील के मजदूर आंदोलनों से जुड़े और मजदूरों के हित के लिए कई सुधारों का प्रस्ताव रखा। उन्होंने टाटा स्टील प्रबंधन से मुलाकात कर बेहतर आवास, वेतन और कामकाजी परिस्थितियों में सुधार की मांग की। इस दौर में बोस टाटा लेबर एसोसिएशन के साथ काम कर चुके थे और मजदूर संघ के पहले अध्यक्ष भी रहे। उनकी यह सक्रियता मजदूरों के हक की लड़ाई में मील का पत्थर साबित हुई।
1930 से 1941 के बीच बोस ने धनबाद के कई दौरे किए। वे कोयला मजदूरों के आंदोलनों में सक्रिय रहे और धनबाद कोल माइनर्स यूनियन के संस्थापक भी थे। स्थानीय लोगों के अनुसार, उन्होंने मजदूरों को संगठित किया और अनेक सभाओं को संबोधित किया। 1941 में बोस ने गोमो जंक्शन से अपनी ऐतिहासिक पलायन यात्रा शुरू की, जो अंग्रेजों को चकमा देने का आखिरी अवसर था।
गोमो जंक्शन का ऐतिहासिक पलायन: 17-18 जनवरी 1941
नेताजी का गोमो (Gomoh) जंक्शन से पलायन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। 17 जनवरी 1941 की रात कलकत्ता से भागकर वे अपने भतीजे शिशिर बोस के साथ कार द्वारा गोमो पहुंचे। उन्होंने शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह के घर में रात बिताई और पठान के वेश में हावड़ा-पेशावर एक्सप्रेस पकड़ी। यह घटना ‘द ग्रेट एस्केप’ के नाम से जानी जाती है।
नेताजी ने गोमो के जंगलों में छिपकर स्वतंत्रता सेनानियों से मुलाकात भी की। गोमो रेलवे स्टेशन का नाम 2009 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन रखा गया। प्लेटफॉर्म 1 और 2 के बीच कांस्य प्रतिमा उनकी ऐतिहासिक पलायन यात्रा को याद दिलाती है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस जयंती 2026: झारखंड में उनकी क्रांतिकारी विरासत और 1928-1941 की अनकही कहानी
बोस ने रामगढ़ में कांग्रेस के 53वें सत्र में हिस्सा लिया। उन्होंने महात्मा गांधी की अहिंसक नीति का विरोध किया और ‘एंटी-कॉम्प्रोमाइज कॉन्फ्रेंस’ का आयोजन किया। यह सम्मेलन फॉरवर्ड ब्लॉक और किसान सभा द्वारा आयोजित था। बोस ने युवाओं को उग्र संघर्ष की दिशा में प्रेरित किया और स्वतंत्रता आंदोलन में नया जोश भर दिया।
1940-41 के बीच बोस रांची पहुंचे और लालपुर इलाके में स्थानीय नेताओं से मिले। रामगढ़ सम्मेलन से पहले रांची में उनका ठहराव और बैठकों ने क्षेत्रीय स्वतंत्रता संग्राम को मजबूती दी।
- देवघर: रामकृष्ण मिशन के ब्रह्मानंद भवन में छात्रों और शिक्षकों को संबोधित किया। भाषण का फोकस स्वतंत्रता और युवा भागीदारी पर था।
- हजारीबाग और गिरिडीह: स्थानीय कार्यकर्ताओं से चर्चा की और संगठनात्मक ढांचे को मजबूत किया।
इन यात्राओं ने झारखंड में बोस की लोकप्रियता और उनके क्रांतिकारी व्यक्तित्व को स्थापित किया।
झारखंड में स्मारक और विरासत
झारखंड में नेताजी की स्मृति में कई स्मारक बनाए गए हैं, जो उनके योगदान को याद करते हैं:
- नेताजी सुभाष चंद्र बोस पार्क, चकुलिया: पूर्वी सिंहभूम में जीवन-आकार की प्रतिमा, 98 लाख रुपये की लागत से बना।
- गोमो रेलवे स्टेशन मेमोरियल: 2009 में नाम बदलकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन किया गया। प्लेटफॉर्म पर कांस्य प्रतिमा और घटना का विवरण रखा गया।
- धनबाद – सुभाष पार्क: बलिहारी एरिया में उनकी यादों को संरक्षित करने का प्रयास।
- रामगढ़ – सुभाष चौक: एंटी-कॉम्प्रोमाइज कॉन्फ्रेंस स्थल का स्मारक।
- जमशेदपुर प्रतिमाएं: 2003 और 2024 में जीवन-आकार की प्रतिमाओं का अनावरण।
- देवघर स्मृतियां: ब्रह्मानंद भवन और 2016 में जारी विशेष कवर ने नेताजी की झारखंड यात्राओं का सम्मान किया।
वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश अश्क के अनुसार, झारखंड में नेताजी की यात्राएं और स्मारक स्वतंत्रता संग्राम का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन स्थलों को संरक्षित और पर्यटन स्थलों के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है। 23 जनवरी को मनाया जाने वाला पराक्रम दिवस नई पीढ़ियों को नेताजी के साहस और संघर्ष की प्रेरणा देता है।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की झारखंड से जुड़ी ये कहानियां और स्मारक उनके अदम्य साहस, क्रांतिकारी दृष्टि और स्वतंत्रता के लिए अटूट समर्पण की याद दिलाते हैं। उनका जीवन आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है और उनके आदर्शों को संरक्षित करना हर भारतीय का कर्तव्य है।










