West Bengal: सत्ता की सीढ़ी बना सिंगूर, अब वही बनेगा ममता की सबसे बड़ी परीक्षा

सिंगूर वही जगह जहां से ममता बनर्जी को सत्ता मिली। अब बीजेपी इसे उद्योग विरोधी कहकर हमला कर रही है। रैली में ममता किसानों और विकास का संदेश देंगी।

सिंगूर वही भूमि है जिसने ममता बनर्जी को सत्ता दिलाई। अब बीजेपी इसे टीएमसी की उद्योग विरोधी नीतियों का प्रतीक बना रही है। ममता की सिंगूर रैली राजनीतिक जवाब और किसानों तथा विकास के संदेश का केंद्र होगी।

West Bengal: पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ी दिख रही है, जहां से तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी का सत्ता तक का सफर शुरू हुआ था। सिंगूर। वही सिंगूर, जिसने 2011 में 34 साल पुराने वाम मोर्चे के किले को ढहा दिया था। आज वही सिंगूर एक बार फिर बंगाल की राजनीति का केंद्र बन गया है, लेकिन इस बार हालात बिल्कुल अलग हैं।

जिस मुद्दे ने ममता बनर्जी को सत्ता दिलाई, अब उसी मुद्दे को भारतीय जनता पार्टी उनके खिलाफ हथियार बना रही है। बीजेपी सिंगूर को तृणमूल कांग्रेस की कथित उद्योग विरोधी नीतियों का प्रतीक बताकर ममता की साख पर सवाल उठा रही है। ऐसे में विधानसभा चुनावों से पहले ममता बनर्जी का सिंगूर लौटना सिर्फ एक रैली नहीं, बल्कि अपनी कुर्सी बचाने की रणनीतिक लड़ाई मानी जा रही है।

सिंगूर और नंदीग्राम से सत्ता तक का सफर

सिंगूर और नंदीग्राम। बंगाल की राजनीति में ये दो नाम ऐसे हैं, जिनके सहारे ममता बनर्जी ने इतिहास रचा। 2006 के बाद जब वाम मोर्चा लगातार सातवीं बार सत्ता में लौटा, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने औद्योगीकरण और रोजगार सृजन को प्राथमिकता बनाने का ऐलान किया। इसी के तहत टाटा मोटर्स को सिंगूर में नैनो कार फैक्ट्री लगाने के लिए लगभग 1000 एकड़ जमीन दी गई।

लेकिन यह जमीन उपजाऊ कृषि भूमि थी। भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों में असंतोष फैलने लगा। इसी असंतोष को ममता बनर्जी ने आंदोलन का रूप दिया। उन्होंने किसानों के साथ खड़े होकर विरोध प्रदर्शन किए, धरने दिए और 26 दिनों की भूख हड़ताल तक की। सिंगूर आंदोलन धीरे-धीरे पूरे राज्य में वाम सरकार के खिलाफ जनाक्रोश का प्रतीक बन गया।

आखिरकार 2008 में टाटा मोटर्स ने सिंगूर से अपना प्रोजेक्ट वापस लेने का फैसला किया और नैनो प्लांट गुजरात के सानंद में स्थापित किया गया। यही वह मोड़ था, जिसने ममता बनर्जी को बंगाल की राजनीति में सबसे मजबूत चेहरा बना दिया। 2011 में उन्होंने वाम मोर्चे को सत्ता से बाहर कर दिया।

अब BJP का हमला

समय बदला है। सत्ता में अब तृणमूल कांग्रेस है और विपक्ष की भूमिका में बीजेपी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 जनवरी को सिंगूर की धरती से ही तृणमूल कांग्रेस पर जोरदार हमला बोला। रोजगार सृजन और औद्योगीकरण को लेकर टीएमसी के रिकॉर्ड पर सवाल उठाते हुए पीएम मोदी ने कहा कि बंगाल में उद्योग तभी आएगा, जब कानून व्यवस्था सुधरेगी।

उन्होंने ‘सिंडिकेट टैक्स’ का जिक्र करते हुए कहा कि बंगाल में हर काम पर अवैध वसूली होती है और बीजेपी इसे खत्म करेगी। मोदी के इस बयान के बाद बीजेपी ने सिंगूर को टीएमसी की उद्योग विरोधी सोच का सबसे बड़ा उदाहरण बताना शुरू कर दिया।

बीजेपी का दावा है कि पिछले 14 वर्षों में करीब 6688 कंपनियां पश्चिम बंगाल छोड़कर दूसरे राज्यों में चली गई हैं। पार्टी का कहना है कि निवेशकों को यहां अनुकूल माहौल नहीं मिलता और इसका सबसे बड़ा उदाहरण सिंगूर है।

टीएमसी का पलटवार, जवाब भी सिंगूर से ही

बीजेपी के हमलों का जवाब देने के लिए तृणमूल कांग्रेस ने भी सिंगूर को ही चुना है। 28 जनवरी को ममता बनर्जी सिंगूर में रैली करने जा रही हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि सिंगूर आंदोलन और टीएमसी एक-दूसरे के पर्याय हैं।

एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, ममता बनर्जी का मकसद प्रधानमंत्री मोदी को उसी जमीन से जवाब देना है, जहां से उनकी राजनीतिक यात्रा को ताकत मिली थी। पार्टी का मानना है कि सिंगूर आज भी किसानों के संघर्ष और जमीन के अधिकार का प्रतीक है, न कि उद्योग विरोध का।

टीएमसी यह संदेश देना चाहती है कि वह किसानों के साथ-साथ औद्योगीकरण के भी खिलाफ नहीं है। पार्टी के अनुसार, उद्योग विकास तभी सार्थक है, जब किसानों के अधिकार सुरक्षित रहें।

ममता की रैली में बड़े ऐलान की तैयारी

राज्य सरकार के सूत्रों के अनुसार, ममता बनर्जी सिंगूर रैली में कई अहम परियोजनाओं की घोषणा कर सकती हैं। इनमें ‘बंग्लार बारी’ परियोजना का दूसरा चरण प्रमुख है, जिससे लगभग 16 लाख परिवारों को लाभ मिलने की संभावना है।

यह परियोजना तब शुरू की गई थी, जब केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत बंगाल को मिलने वाली फंडिंग रोक दी थी। ममता इस मंच से यह संदेश देना चाहती हैं कि केंद्र सरकार बंगाल के साथ सौतेला व्यवहार कर रही है, जबकि राज्य सरकार अपने संसाधनों से गरीबों को घर देने का काम कर रही है।

इसके अलावा सिंगूर औद्योगिक क्षेत्र में वेयरहाउसिंग प्रोजेक्ट की घोषणा भी की जा सकती है। इसका मकसद साफ है। बीजेपी के इस आरोप को खारिज करना कि टीएमसी उद्योग विरोधी है।

सिंगूर आंदोलन की पूरी कहानी

2006 के विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। उसी के बाद सरकार ने औद्योगीकरण को विकास का आधार बनाया। टाटा मोटर्स को नैनो कार के लिए सिंगूर में जमीन दी गई। शुरुआत में विरोध सीमित था, लेकिन भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया ने स्थानीय किसानों और छोटे राजनीतिक दलों को नाराज कर दिया।

ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को पूरी ताकत से उठाया। जब उन्हें सिंगूर में प्रवेश से रोका गया, तो उन्होंने कोलकाता में भूख हड़ताल शुरू कर दी। 26 दिन की इस भूख हड़ताल को बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम जनता का व्यापक समर्थन मिला।

हालांकि कलकत्ता हाई कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण को वैध ठहराया, लेकिन आंदोलन थमा नहीं। नंदीग्राम में रसायन उद्योग हब के खिलाफ आंदोलन ने भी आग में घी का काम किया। अंततः टाटा मोटर्स ने प्रोजेक्ट वापस ले लिया और सिंगूर का मुद्दा बंगाल की राजनीति का टर्निंग पॉइंट बन गया।

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