राजस्थान के जोधपुर में NRI कृष्ण कुमार मेहता से 5.20 करोड़ की साइबर ठगी का मामला सामने आया है। 3 साल बाद भी पुलिस पूरी रकम रिकवर नहीं कर पाई है। आरोपी गिरफ्तार है, लेकिन केवल 1.45 करोड़ की वसूली हुई है।
जोधपुर: राजस्थान के जोधपुर में एक बड़े साइबर फ्रॉड मामले ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। न्यूयॉर्क में रहने वाले भारतीय मूल के उद्योगपति और समाजसेवी कृष्ण कुमार मेहता के बैंक खातों से 5.20 करोड़ रुपये की कथित साइबर ठगी का मामला सामने आया है। यह घटना अगस्त 2023 में दर्ज की गई थी, लेकिन तीन साल बीत जाने के बावजूद पूरी राशि की रिकवरी नहीं हो सकी है।
अब तक पुलिस केवल लगभग 1.45 करोड़ रुपये ही वापस करा पाई है, जबकि शेष राशि अब भी लापता है।
कैसे हुआ 5.20 करोड़ का साइबर फ्रॉड?
पीड़ित के अनुसार, उन्होंने अपने बैंक खातों (IDBI और HDFC बैंक) के संचालन और वित्तीय प्रबंधन के लिए एक अकाउंटेंट को नियुक्त किया था। आरोपी को लंबे समय तक खातों की देखरेख का भरोसा दिया गया था।
इसी भरोसे का फायदा उठाकर अकाउंटेंट ने धीरे-धीरे बैंक खातों तक पूरी पहुंच हासिल कर ली। बाद में उसने OTP और बैंकिंग एक्सेस अपने मोबाइल नंबर पर ट्रांसफर करा लिया, जिससे उसे लेनदेन पर पूरा नियंत्रण मिल गया।
जुलाई 2023 में जब पीड़ित ने खातों का विवरण मांगा, तो आरोपी टालमटोल करता रहा। इसके कुछ दिनों बाद जब खातों की जांच की गई, तो सामने आया कि कुल 5.20 करोड़ रुपये अलग-अलग खातों में ट्रांसफर किए जा चुके थे।
मास्टरमाइंड अकाउंटेंट और निवेश का जाल
जांच में सामने आया कि इस मामले का मुख्य आरोपी गुलाब बंजारा है, जो जोधपुर के चौपासनी हाउसिंग बोर्ड क्षेत्र का निवासी है। वह पीड़ित के यहां पार्ट-टाइम अकाउंटेंट के रूप में काम करता था और उसे लगभग 14,500 रुपये मासिक वेतन मिलता था।
हालांकि मामूली वेतन के बावजूद उसे खातों का पूरा एक्सेस प्राप्त था। आरोप है कि उसने बिना अनुमति के पैसों को विभिन्न खातों में निवेश करना शुरू कर दिया, जो बाद में साइबर फ्रॉड नेटवर्क का हिस्सा बन गया।
कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, आरोपी ने निवेश के दौरान बड़ी रकम गलत जगह लगा दी, जिसके चलते पूरा पैसा साइबर ठगों के नेटवर्क में चला गया।
71 बैंक खातों में ट्रांसफर हुआ पैसा
जांच में यह सामने आया कि ठगी की पूरी रकम को 71 अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर किया गया था। यह तरीका साइबर अपराधियों द्वारा आमतौर पर अपनाया जाता है ताकि धन के स्रोत को ट्रेस करना मुश्किल हो जाए।
इन खातों के माध्यम से पैसे को तेजी से इधर-उधर घुमाया गया। कुछ जगहों पर कैश निकासी की गई, जबकि कुछ ट्रांजैक्शन ऑनलाइन माध्यम से किए गए। इससे जांच एजेंसियों के लिए फंड ट्रेल को ट्रैक करना चुनौतीपूर्ण हो गया।
बिहार से हुई एक गिरफ्तारी, 60 लाख की रिकवरी
इस मामले में मार्च 2024 में पुलिस ने बिहार के वैशाली जिले से एक आरोपी ऋषभ को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने कई दिनों तक इलाके में डेरा डालकर ट्रैकिंग की थी।
जांच के दौरान सामने आया कि ठगी की रकम का एक हिस्सा उसके बैंक खाते में ट्रांसफर किया गया था। पुलिस ने उसके खाते से लगभग 60 लाख रुपये की रिकवरी की थी।
यह इस मामले की अब तक की सबसे बड़ी एकल रिकवरी मानी जाती है।
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अब तक केवल 1.45 करोड़ की रिकवरी
तीन साल से चल रही जांच के बावजूद अब तक कुल लगभग 1.45 करोड़ रुपये ही पीड़ित को वापस मिल पाए हैं। यह राशि भी चरणबद्ध तरीके से अलग-अलग खातों से वापस की गई है।
अभी भी करीब 3.75 करोड़ रुपये की रिकवरी लंबित है। पीड़ित पक्ष का कहना है कि जांच प्रक्रिया बेहद धीमी है, जिससे शेष राशि की वसूली प्रभावित हो रही है।
शुरुआती लापरवाही पर सवाल
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल शुरुआती जांच प्रक्रिया पर उठ रहा है। शिकायत के तुरंत बाद संदिग्ध बैंक खातों को फ्रीज नहीं किया गया, जिससे आरोपियों को पैसे को कई खातों में ट्रांसफर करने का समय मिल गया।
साइबर अपराध विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में शुरुआती 24 से 72 घंटे बेहद महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि इसी दौरान फंड ट्रेल को रोका जा सकता है। लेकिन इस केस में इसी विंडो में देरी ने जांच को जटिल बना दिया।
71 खातों में पैसा घुमाकर छिपाने की कोशिश
जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी ने पूरी राशि को 71 बैंक खातों के नेटवर्क में फैलाकर छिपाने की कोशिश की। इस तरह की रणनीति को “Layered Transaction Fraud” कहा जाता है, जिसमें पैसे को कई खातों के बीच घुमाकर उसकी पहचान छिपाई जाती है।
कई खातों को बाद में बंद भी कर दिया गया, जिससे ट्रैकिंग और मुश्किल हो गई।
पीड़ित की सामाजिक पृष्ठभूमि और मामला
केके मेहता न्यूयॉर्क स्थित एक एनआरआई उद्योगपति और समाजसेवी हैं, जिनका राजस्थान से गहरा जुड़ाव है। वे कई वर्षों से सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं और विशेष रूप से स्वास्थ्य और आपदा राहत कार्यों में योगदान देते रहे हैं।
उन्होंने कोरोना महामारी के दौरान भारत में ऑक्सीजन कंसंट्रेटर, भोजन सामग्री और आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई थी।
जांच पर उठ रहे सवाल
पीड़ित पक्ष का आरोप है कि पुलिस जांच की गति बेहद धीमी है और कई महत्वपूर्ण स्तरों पर कार्रवाई में देरी हुई है। उनका कहना है कि समय पर विशेष जांच दल (SIT) का गठन नहीं किया गया और बैंकिंग समन्वय भी प्रभावी नहीं रहा।
हालांकि जांच अधिकारी मंगलेश चुंडावत के अनुसार, अब तक एक करोड़ रुपये से अधिक की वसूली की जा चुकी है और बाकी राशि की रिकवरी प्रक्रिया जारी है।









