अलीगढ़ में आयोजित श्रीरामकथा के दौरान जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने मथुरा, काशी और संभल को लेकर टिप्पणी की। उन्होंने सनातन संस्कृति के संरक्षण, धार्मिक एकता और रामकथा के आध्यात्मिक महत्व पर भी जोर दिया।
अलीगढ़: गांव लधौआ में चल रही श्रीरामकथा के दौरान जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य ने धर्म और संस्कृति से जुड़े मुद्दों पर अपने विचार रखे। प्रवचन के दौरान उन्होंने मथुरा, काशी और संभल का उल्लेख करते हुए बयान दिया, वहीं श्रद्धालुओं से सनातन परंपराओं के संरक्षण और सामाजिक एकजुटता का आह्वान भी किया।
रामकथा में धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर बोले रामभद्राचार्य
अलीगढ़ के अकराबाद क्षेत्र स्थित लधौआ गांव में आयोजित विराट श्रीरामकथा के दौरान पद्म विभूषण सम्मानित Jagadguru Rambhadracharya ने धर्म, संस्कृति और सनातन परंपराओं से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि जहां-जहां सनातन परंपरा के पवित्र स्थल हैं, उन्हें संरक्षित रखने के प्रयास जारी रहने चाहिए। इसी क्रम में उन्होंने मथुरा, काशी और संभल का उल्लेख करते हुए दावा जताया कि ये स्थान भी भविष्य में सनातन समाज के अधीन होंगे।
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उनके इस बयान पर कथा पंडाल में मौजूद श्रद्धालुओं ने जय श्रीराम के उद्घोष के साथ प्रतिक्रिया दी। कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे और पूरे परिसर में धार्मिक वातावरण बना रहा।
श्रीरामकथा को बताया जीवन मूल्यों का माध्यम
रामभद्राचार्य ने कहा कि श्रीरामकथा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज को नैतिक और आध्यात्मिक दिशा देने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने भगवान श्रीराम और माता सीता के चरित्र को आदर्श जीवन का उदाहरण बताते हुए कहा कि उनके जीवन से त्याग, मर्यादा, कर्तव्य और समर्पण जैसे मूल्यों की प्रेरणा मिलती है।
प्रवचन के दौरान उन्होंने याज्ञवल्क्य-भारद्वाज संवाद, शिव-सती प्रसंग और भगवान राम की दिव्यता का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि राम को केवल ऐतिहासिक या मानवीय व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि परमब्रह्म के रूप में समझा जाना चाहिए।
कथा श्रवण से आध्यात्मिक लाभ की बात
अपने संबोधन में रामभद्राचार्य ने कहा कि मनुष्य के दस प्रकार के पाप बताए गए हैं, जिनमें तीन मन से, चार वाणी से और तीन शरीर से संबंधित होते हैं। उनके अनुसार भगवान श्रीराम और माता सीता की दिव्य लीलाओं का श्रद्धापूर्वक श्रवण व्यक्ति को आत्मशुद्धि की ओर ले जाता है और इन दोषों को दूर करने में सहायक माना जाता है।
उन्होंने कहा कि सत्संग और कथा व्यक्ति के भीतर सकारात्मक सोच विकसित करते हैं और समाज में सद्भाव तथा नैतिक मूल्यों को मजबूत बनाते हैं।
श्रद्धालुओं से एकजुट रहने का आह्वान
कथा के दौरान जगद्गुरु ने भारत की सांस्कृतिक विरासत, तीर्थ स्थलों और धार्मिक परंपराओं के संरक्षण की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने श्रद्धालुओं से धर्म और राष्ट्रहित के मुद्दों पर संगठित रहने की अपील की।
कार्यक्रम में हजारों श्रद्धालुओं ने कथा श्रवण किया। आयोजकों के अनुसार आगामी दिनों में भी बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने की संभावना है। कथा स्थल पर देर शाम तक भक्ति, आस्था और धार्मिक उत्साह का माहौल बना रहा।









