RBI की मौद्रिक नीति का दशक: कभी सस्ती हुई लोन की दरें तो कभी बढ़ीं ब्याज दरें, जानें कब क्या फैसला लिया

SBI रिसर्च रिपोर्ट में 2016-2026 के दौरान RBI की मौद्रिक नीति का विश्लेषण सामने आया है। जानें कब रेपो रेट घटा, कब बढ़ा और कोविड का क्या असर पड़ा।

SBI रिसर्च की रिपोर्ट में 2016 से 2026 तक RBI की मौद्रिक नीति का विश्लेषण किया गया है। इस दौरान रेपो रेट में कटौती, बढ़ोतरी और स्थिरता के दौर देखने को मिले, जिन पर कोविड-19, महंगाई और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों का असर पड़ा।

RBI Report: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति पर पिछले दस वर्षों का एक महत्वपूर्ण विश्लेषण सामने आया है। SBI रिसर्च की रिपोर्ट में 2016 से 2026 तक के ब्याज दर फैसलों का विस्तृत अध्ययन किया गया है। इस रिपोर्ट के अनुसार इस दौरान रेपो रेट ने एक पूरा चक्र पूरा किया। शुरुआत में ब्याज दरों में कटौती हुई, इसके बाद बढ़ोतरी का दौर आया और फिर एक समय ऐसा भी रहा जब दरें लंबे समय तक स्थिर रहीं।

रिपोर्ट के मुताबिक इस पूरे दौर में सबसे ज्यादा उतार-चढ़ाव RBI के गवर्नर शक्तिकांत दास के कार्यकाल में देखने को मिला। इसका मुख्य कारण कोविड-19 महामारी, वैश्विक महंगाई और आपूर्ति संकट जैसे बड़े आर्थिक झटके रहे, जिनके कारण केंद्रीय बैंक को कई बार तेजी से नीतिगत बदलाव करने पड़े।

महामारी से महंगाई तक बदलती रही नीति

SBI रिसर्च की रिपोर्ट बताती है कि 2020 में जब कोविड-19 महामारी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया, तब भारत की आर्थिक गतिविधियां भी धीमी पड़ गई थीं। इस कठिन समय में अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए RBI ने ब्याज दरों में तेजी से कटौती की।

रेपो रेट में कटौती का उद्देश्य बैंकिंग सिस्टम में तरलता बढ़ाना और कर्ज सस्ता करना था, ताकि कंपनियां और आम लोग आसानी से लोन ले सकें और आर्थिक गतिविधियां दोबारा गति पकड़ सकें।

हालांकि यह दौर ज्यादा समय तक नहीं रहा। 2022 में वैश्विक स्तर पर महंगाई तेजी से बढ़ने लगी। कच्चे तेल की कीमतों और सप्लाई चेन की समस्याओं ने दुनिया भर के देशों में महंगाई का दबाव बढ़ा दिया। इसके चलते RBI को अपनी नीति का रुख बदलना पड़ा और ब्याज दरों में तेजी से बढ़ोतरी करनी पड़ी।

महंगाई लक्ष्य व्यवस्था का असर

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में Inflation Targeting Framework लागू होने के बाद ब्याज दरों में बार-बार बदलाव की घटनाएं कम हो गई हैं। 2010 से 2015 के बीच के आंकड़ों को देखें तो उस समय RBI ने 16 बार ब्याज दरों में बढ़ोतरी की थी। लेकिन महंगाई लक्ष्य प्रणाली लागू होने के बाद नीतिगत फैसलों में अधिक स्थिरता देखने को मिली।

इस व्यवस्था के तहत RBI का मुख्य लक्ष्य महंगाई को एक निश्चित सीमा में रखना है। इसी वजह से अब ब्याज दरों में बदलाव केवल तब किया जाता है जब आर्थिक परिस्थितियां इसकी मांग करती हैं।

दो साल तक स्थिर रही रेपो रेट

SBI रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार 2021 और 2024 ऐसे साल रहे जब पूरे वर्ष RBI ने रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया। यह उस समय की आर्थिक परिस्थितियों को दर्शाता है जब केंद्रीय बैंक ने स्थिति को स्थिर बनाए रखने को प्राथमिकता दी।

रिपोर्ट में 2024 को एक दिलचस्प साल बताया गया है। इस वर्ष कई नीतिगत फैसले पूरे Consensus के साथ लिए गए। यानी MPC के सभी सदस्य एक ही निर्णय पर सहमत दिखाई दिए।

हालांकि इसी वर्ष कुछ मामलों में मतभेद भी सामने आए। खासकर नीति के रुख और भविष्य की दिशा को लेकर कुछ सदस्यों ने अलग राय रखी। इसी वजह से 2024 को सहमति और मतभेद दोनों का साल भी कहा गया।

MPC के फैसलों में दिखी मजबूत सहमति

रिपोर्ट के मुताबिक RBI की Monetary Policy Committee (MPC) के फैसलों में अक्सर सदस्यों के बीच मजबूत सहमति देखने को मिली है। ब्याज दर तय करने के फैसलों पर आमतौर पर सदस्य एकमत रहे हैं। लेकिन नीति के रुख और भविष्य के संकेतों को लेकर कई बार मतभेद सामने आए।

यह किसी भी केंद्रीय बैंक के लिए सामान्य बात मानी जाती है क्योंकि नीति निर्धारण में अलग-अलग आर्थिक दृष्टिकोण शामिल होते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह की चर्चा और मतभेद से नीति और अधिक संतुलित बनती है और आर्थिक परिस्थितियों को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।

शक्तिकांत दास के कार्यकाल का सबसे कठिन दौर

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि RBI गवर्नर शक्तिकांत दास के कार्यकाल को मौद्रिक नीति के लिहाज से सबसे चुनौतीपूर्ण दौर माना जा सकता है।

इस अवधि में दुनिया ने कई बड़े आर्थिक संकटों का सामना किया। कोविड-19 महामारी, वैश्विक सप्लाई चेन संकट, ऊर्जा कीमतों में तेजी और महंगाई का दबाव जैसे कई कारकों ने आर्थिक नीतियों को प्रभावित किया।

इन परिस्थितियों में RBI को कई बार तेजी से फैसले लेने पड़े। कभी अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए दरें घटानी पड़ीं तो कभी महंगाई को नियंत्रित करने के लिए उन्हें बढ़ाना पड़ा।

MPC की भाषा भी समय के साथ बदली

SBI रिसर्च की रिपोर्ट में MPC बैठकों के मिनट्स का विश्लेषण Artificial Intelligence और NLP तकनीक की मदद से किया गया। इस अध्ययन से यह पता चला कि समय के साथ मौद्रिक नीति की भाषा और शब्दावली भी बदलती रही। उर्जित पटेल के कार्यकाल में नीति की भाषा अधिक स्थिर और महंगाई नियंत्रण पर केंद्रित रही। उस समय RBI का मुख्य फोकस Inflation Targeting को मजबूत बनाना था।

वहीं शक्तिकांत दास के कार्यकाल में कोविड-19 महामारी और वैश्विक आर्थिक संकटों के कारण नीति की भाषा में कई बदलाव देखने को मिले। इसमें आर्थिक प्रोत्साहन, तरलता और वैश्विक जोखिम जैसे शब्द अधिक प्रमुख रहे। रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि मौजूदा गवर्नर संजय मल्होत्रा के शुरुआती कार्यकाल में नीति की नई दिशा धीरे-धीरे स्पष्ट होती दिखाई दे रही है।

Leave a comment