ईंधन की बढ़ती कीमतों के चलते महंगाई का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे आने वाली भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) बैठक पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। ऐसे में ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
RBI: भारत में बढ़ती ईंधन कीमतों और महंगाई के दबाव के बीच आने वाले महीनों में लोन की ब्याज दरों में बदलाव को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। निवेशक, बैंकिंग सेक्टर और आम उपभोक्ता सभी की नजर अब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की आगामी मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक पर टिकी है, जो यह तय करेगी कि रेपो रेट में बदलाव होगा या नहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल महंगाई के जोखिमों के बावजूद केंद्रीय बैंक आक्रामक रुख अपनाने से बच सकता है।
महंगाई का बढ़ता दबाव और RBI की चुनौती
हाल के महीनों में पेट्रोल, डीजल और सीएनजी जैसी ईंधन कीमतों में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है। इसके साथ ही वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने भारत की मुद्रास्फीति (inflation) पर दबाव बढ़ा दिया है। इन परिस्थितियों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या आने वाले समय में लोन महंगे हो सकते हैं और क्या घर, कार या बिजनेस लोन की EMI पर असर पड़ेगा।
रेटिंग एजेंसी ICRA Limited का अनुमान है कि भारतीय रिजर्व बैंक फिलहाल ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करेगा और रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रख सकता है।
रेपो रेट में तुरंत बदलाव की संभावना कम
ICRA की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर के अनुसार, मौजूदा महंगाई का कारण मुख्य रूप से सप्लाई-साइड शॉक है, न कि मांग में तेज वृद्धि। इसलिए केंद्रीय बैंक तत्काल सख्त नीति अपनाने से बच सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि RBI फिलहाल “वेट एंड वॉच” रणनीति अपनाएगा और तब तक किसी बड़े बदलाव से परहेज करेगा जब तक महंगाई के दूसरे दौर के प्रभाव स्पष्ट रूप से सामने नहीं आ जाते।

कब बढ़ सकते हैं ब्याज दरें?
ICRA के अनुमान के अनुसार, अगर ईंधन कीमतों और महंगाई का दबाव लंबे समय तक बना रहता है, तो ब्याज दरों में बढ़ोतरी केवल साल के अंत (दिसंबर) में संभव हो सकती है। एजेंसी का मानना है कि, अगले दो MPC बैठकों में कोई बदलाव नहीं होगा। अक्टूबर की बैठक में रुख बदल सकता है. जरूरत पड़ने पर दिसंबर में रेपो रेट बढ़ाया जा सकता है. इसका मतलब है कि निकट भविष्य में लोन महंगे होने की संभावना सीमित है, लेकिन साल के अंत तक स्थिति बदल सकती है।
हाल ही में खुदरा ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी के बाद ICRA ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए औसत खुदरा मुद्रास्फीति (CPI) का अनुमान बढ़ाकर 5% कर दिया है। यह RBI के मध्यम अवधि लक्ष्य से थोड़ा अधिक है। इससे संकेत मिलता है कि आने वाले महीनों में महंगाई RBI के लिए एक प्रमुख चिंता का विषय बनी रह सकती है।
पिछली नीति और रेपो रेट की स्थिति
भारतीय रिजर्व बैंक ने आखिरी बार दिसंबर 2025 में रेपो रेट में बदलाव किया था। उस समय रेपो रेट में 0.25% की कटौती की गई थी, जिसके बाद यह घटकर 5.25% पर आ गया। तब से अब तक केंद्रीय बैंक ने दरों को स्थिर रखा है, जिससे संकेत मिलता है कि मौद्रिक नीति फिलहाल संतुलित रुख में है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि RBI वैश्विक आर्थिक स्थिति, कच्चे तेल की कीमतों और घरेलू महंगाई के आंकड़ों पर बारीकी से नजर रखेगा। यदि मुद्रास्फीति नियंत्रण में रहती है, तो ब्याज दरों में स्थिरता बनी रह सकती है।









