संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि निजी स्वार्थ के कारण दुनिया संघर्षों का सामना कर रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसे समय में भारत का अध्यात्म और सनातन से प्रेरित सर्व जन हिताय का मंत्र ही सही रास्ता दिखा सकता है।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने अशोक सिंघल आध्यात्मिक केंद्र के भूमि पूजन समारोह में कहा कि दुनिया आज निजी स्वार्थ और संघर्षों के कारण कठिनाई का सामना कर रही है, ऐसे समय में भारत की आध्यात्मिक चेतना और सनातन पर आधारित हिंदुत्व दर्शन ही सही मार्गदर्शक बन सकता है।
भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि दुनिया यह नहीं समझती कि साथ रहने के लिए त्याग और संतुलन आवश्यक है। पश्चिम के विकास मॉडल में केवल बाहरी और भौतिक लाभ को ही सर्वोच्च माना गया है, जबकि इसका परिणाम पर्यावरणीय विनाश और असमानता के रूप में सामने आता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मॉडल, जो सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के सिद्धांत पर आधारित है, वैश्विक संकटों का समाधान प्रदान कर सकता है।
सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की अवधारणा
भागवत ने कहा कि हजारों साल पहले ऋषि-मुनियों ने जो राष्ट्र की परिकल्पना की थी, वह सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की आध्यात्मिक चेतना पर आधारित थी। उन्होंने बताया कि पश्चिम का विकास मॉडल केवल बाहरी सुख को अंतिम मानता है और इसमें अधिकतम लोगों को खुश करना ही लक्ष्य होता है, जबकि भारत का मॉडल आंतरिक सुख और संतुलन पर आधारित है।
हमारा राष्ट्र जड़, चेतन, चराचर और सृष्टि को एक मानता है। विविधता में एकता हमारी शक्ति है और अलग-अलग पूजा-पद्धतियों और परंपराओं को स्वीकार करते हुए हम विश्व कल्याण की दिशा में काम कर सकते हैं। भागवत ने जोर देकर कहा कि पश्चिम का विकास मॉडल मिथ्या है और पर्यावरणीय नुकसान के अलावा इसमें सभी के लिए जीने की अवधारणा नहीं है। वहीं, भारत की आध्यात्मिक सोच न केवल मानव बल्कि पूरे चराचर जगत के लिए स्थान देती है।
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आध्यात्मिकता और राष्ट्रवाद का संतुलन
संगठन के साथ इस समारोह में उपस्थित शारदा पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी राज राजेश्वराश्रम महाराज ने राष्ट्रवाद और आध्यात्मिकता के संतुलन पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा,
'आध्यात्मिकता के बिना राष्ट्रवाद को अर्थहीन और प्रभावहीन माना जा सकता है। केवल आर्थिक विकास या शक्ति के बल पर राष्ट्र की प्रगति संभव नहीं है। आध्यात्मिकता में पारिवारिक मूल्य, आंतरिक सुख और तर्क की क्षमता होती है।'
शंकराचार्य ने आगे कहा कि देश को आर्थिक प्रगति के साथ-साथ आध्यात्मिक विकास की भी आवश्यकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि केवल भौतिक विकास से राष्ट्र का वास्तविक उत्थान नहीं हो सकता।
भारत का वैश्विक संदेश
भागवत ने इस दौरान कहा कि आने वाला समय हिंदुत्व और सनातन का है। भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित जीवन दृष्टि न केवल भारत को सशक्त बनाएगी, बल्कि दुनिया के लिए भी मार्गदर्शक साबित हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि त्याग, संतुलन और सर्वजन हिताय की नीति ही वैश्विक संकटों का समाधान प्रस्तुत कर सकती है।
अध्यक्ष ने बताया कि भारतीय दृष्टिकोण में सभी जीव-जंतु, निर्जीव और सजीव के लिए स्थान है। यही दृष्टिकोण दुनिया को स्थायी विकास, शांति और समानता की राह दिखा सकता है।








