भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की एक्सपायरी पर सेटलमेंट प्राइस तय करने की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा करने का फैसला किया है। सेबी ने कहा है कि क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) लागू होने के बाद इस व्यवस्था में आए बदलावों का आकलन किया जाएगा।
SEBI Derivatives Settlement Price: भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने डेरिवेटिव मार्केट से जुड़े सेटलमेंट प्राइस नियमों की समीक्षा करने का फैसला किया है। बाजार सहभागियों से मिले फीडबैक और क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) के शुरुआती अनुभव के बाद नियामक डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की एक्सपायरी पर सेटलमेंट प्राइस निर्धारित करने की मौजूदा व्यवस्था में संभावित बदलाव पर विचार कर रहा है।
SEBI के मुताबिक, इस विषय पर लगभग एक सप्ताह के भीतर कंसल्टेशन पेपर जारी किया जाएगा। इसके जरिए बाजार से जुड़े विभिन्न पक्षों से प्रस्तावित बदलावों पर राय मांगी जाएगी। हालांकि, फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि अंतिम तौर पर मौजूदा व्यवस्था में किस तरह का बदलाव किया जाएगा।
CAS लागू होने के बाद शुरू हुई समीक्षा
SEBI ने बताया कि 16 जनवरी 2026 के सर्कुलर के तहत इक्विटी कैश सेगमेंट में क्लोजिंग ऑक्शन सेशन की व्यवस्था 3 अगस्त 2026 से लागू की गई थी। CAS के तहत ट्रेडिंग सेशन के अंत में एक ऑक्शन प्रक्रिया के जरिए शेयरों का क्लोजिंग प्राइस निर्धारित किया जाता है। इसी क्लोजिंग प्राइस को डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की एक्सपायरी के समय सेटलमेंट प्राइस तय करने का आधार बनाया गया था।
अब इस व्यवस्था के शुरुआती अनुभव और बाजार सहभागियों से प्राप्त प्रतिक्रियाओं के आधार पर SEBI ने इसकी समीक्षा करने का फैसला किया है। नियामक का कहना है कि बाजार में मिली प्रतिक्रिया को देखते हुए डेरिवेटिव सेटलमेंट प्राइस की पद्धति में कुछ बदलाव प्रस्तावित किए जा सकते हैं।
हितधारकों से व्यापक चर्चा के बाद लागू हुआ था CAS
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SEBI के अनुसार, CAS का मौजूदा ढांचा अचानक लागू नहीं किया गया था। इसके लिए नियामक ने बाजार के अलग-अलग पक्षों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया था। इस प्रक्रिया के तहत दिसंबर 2024 और अगस्त 2025 में दो चरणों में सार्वजनिक परामर्श आयोजित किए गए थे। इसके अलावा स्टॉक एक्सचेंज, ब्रोकर संगठनों, संस्थागत निवेशकों, अन्य बाजार सहभागियों और संबंधित हितधारकों के साथ भी चर्चा की गई थी।
इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था तैयार करना था, जिससे शेयरों के क्लोजिंग प्राइस को अधिक प्रभावी तरीके से निर्धारित किया जा सके और बाजार में पारदर्शिता तथा बेहतर मूल्य खोज की प्रक्रिया को मजबूत किया जा सके।
लागू होने के बाद लगातार निगरानी
CAS के लागू होने के बाद SEBI ने इसके कामकाज की लगातार निगरानी की। नियामक ने स्टॉक एक्सचेंजों के साथ-साथ ब्रोकर, प्रोपाइटरी ट्रेडर्स, सॉफ्टवेयर विक्रेताओं, म्यूचुअल फंड कंपनियों, उद्योग संगठनों और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) समेत कई पक्षों से संपर्क बनाए रखा। इस दौरान मुख्य फोकस CAS के क्रियान्वयन से जुड़ी परिचालन चुनौतियों को समझने और उनका समाधान खोजने पर रहा। SEBI ने व्यवस्था लागू होने के पहले महीने में इसके कामकाज और बाजार पर पड़ने वाले प्रभाव का भी आकलन किया।
सेटलमेंट प्राइस बना सबसे अहम मुद्दा
CAS लागू होने के बाद बाजार सहभागियों की ओर से अलग-अलग माध्यमों से SEBI तक कई सुझाव और प्रतिक्रियाएं पहुंचीं। इनमें सोशल मीडिया, मीडिया प्लेटफॉर्म और अन्य संचार माध्यमों से प्राप्त फीडबैक भी शामिल था। नियामक के अनुसार, प्राप्त प्रतिक्रियाओं में सबसे प्रमुख मुद्दा डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की एक्सपायरी पर सेटलमेंट प्राइस तय करने की मौजूदा पद्धति को लेकर सामने आया।
बाजार सहभागियों की ओर से यह सवाल उठाया गया कि क्या CAS में तय क्लोजिंग प्राइस को डेरिवेटिव एक्सपायरी के सेटलमेंट प्राइस का आधार बनाए रखना उचित है। इसी फीडबैक को देखते हुए SEBI अब मौजूदा व्यवस्था का पुनर्मूल्यांकन करेगा।
जल्द जारी होगा कंसल्टेशन पेपर
SEBI ने संकेत दिया है कि वह डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के सेटलमेंट प्राइस को निर्धारित करने की पद्धति में संभावित बदलावों पर बाजार से राय लेगा। इसके लिए लगभग एक सप्ताह के भीतर कंसल्टेशन पेपर जारी किए जाने की उम्मीद है। कंसल्टेशन पेपर आने के बाद बाजार सहभागियों को प्रस्तावित बदलावों पर अपनी राय रखने का अवसर मिलेगा। इसके बाद प्राप्त प्रतिक्रियाओं और नियामक के आकलन के आधार पर अंतिम फैसला लिया जा सकता है।








